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मध्य प्रदेश: क्या सरकार अब जंगलों को भी निजी क्षेत्र के हवाले करने वाली है?

मध्य प्रदेश सरकार को वनों के पुनरुद्धार के लिए निजी क्षेत्र को शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया है, लेकिन कार्यकर्ताओं को अंदेशा है कि इससे जंगलों तक स्थानीय लोगों की पहुंच खत्म होगी

खस्ताहाल मध्य प्रदेश का एक खुला वन
अपडेटेड 10 मार्च , 2025

क्या मध्य प्रदेश अपने जंगल निजी निवेशकों को सौंपने की योजना बना रहा है? दरअसल, 'सीएसआर, सीईआर और गैर-सरकारी निधियों का इस्तेमाल कर वन पुनरुद्धार नीति' के मसौदे से वाकई यही संकेत मिलते हैं.

24-25 फरवरी को भोपाल में निवेशक शिखर सम्मेलन से पहले इस मसौदे को लोगों की प्रतिक्रिया के लिए सार्वजनिक किया गया. इसमें निवेशकों को लघु वन उपज को बेचने और कार्बन क्रेडिट अर्जित करने का अधिकार देते हुए 'वन भूमि के पुनरुद्धार' के लिए निजी निवेश की अनुमति देने का सुझाव दिया गया है.

मध्य प्रदेश में करीब 95 लाख हेक्टेयर भूमि वन क्षेत्र के तौर पर वर्गीकृत है, जो किसी भी अन्य राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा है. इसमें करीब 37 लाख हेक्टेयर 'क्षरित' या खराब गुणवत्ता वाली वन भूमि के तौर पर वर्गीकृत है. प्रदेश के वन विभाग का अनुमान है कि क्षरित वन भूमि के पुनरुद्धार की लागत करीब 5-8 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर आएगी और राज्य सरकार के पास इसके लिए पर्याप्त धन नहीं है. इसलिए, नीति को दो हिस्सों में तैयार किया गया है. एक है, वानिकी में निजी निवेश हासिल करना और दूसरा कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) तथा कॉर्पोरेट पर्यावरण उत्तरदायित्व (सीईआर) बजट के जरिए वनों के पुनरुद्धार में कॉर्पोरेट जगत की मदद लेना.

प्रस्तावित नीति के मुताबिक, निजी निवेशक मध्य प्रदेश वन विकास निगम (एमपीएफडीसी) के साथ परामर्श के आधार पर न्यूनतम 25 हेक्टेयर और अधिकतम 1,000 हेक्टेयर वन क्षेत्र की जिम्मेदारी ले सकेंगे. एमपीएफडीसी साल में दो बार ईओआइ (निवेशकों की ओर से दिखाई गई रुचि) आमंत्रित करेगा. वन क्षेत्र का हिस्सा 60 वर्षों की अवधि के लिए दिया जाएगा. वृक्षारोपण सीधे निवेशक की तरफ से या फिर एमपीएफडीसी को पर्यवेक्षण शुल्क प्रदान करके कराया जा सकेगा. वृक्षारोपण कार्य निवेशक सीधे या फिर शुल्क का भुगतान करके एमपीएफडीसी के जरिए कर सकता है. मगर, उसमें भारतीय वन अधिनियम, 1927, वन संरक्षण अधिनियम 1980 या वन अधिकार अधिनियम 2006 का उल्लंघन नहीं होना चाहिए. यह सुनिश्चित करने के लिए ध्यान रखा जाएगा कि गांवों के आसपास पर्याप्त भूमि छोड़ी जाए ताकि स्थानीय समुदाय को पशुओं के लिए चारा या फिर जलावन के लिए लकड़ी जुटाने में कोई दिक्कत न आए.

वन नीति में सामुदायिक अधिकारों की रक्षा के लिए स्थानीय सहमति तैयार करने का दावा किया गया है. मगर सामाजिक कार्यकर्ता चिंतित हैं. विकास संवाद के संस्थापक और सामाजिक कार्यकर्ता सचिन जैन आगाह करते हैं, ''जैसे ही कोई निजी कंपनी इसमें शामिल होगी, वह अपने हितों की रक्षा करेगी. इसका मतलब है कि वह स्थानीय समुदाय को जलावन के लिए लकड़ी एकत्र करने या मवेशियों को चराने के लिए बेरोकटोक आने-जाने नहीं देगी. आदिवासी क्षेत्रों में पारंपरिक वन अधिकार सीधे आस्था से जुड़े हैं, वहां निजी हितों के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है.''

इसमें स्वामित्व में संरचनागत बदलाव तय हैं. निवेशकों को तेंदूपत्ता, महुआ और चिरौंजी सरीखे लघु वन उपज (एमएफपी) का आधा हिस्सा बेचने का अधिकार होगा जबकि 30 फीसद हिस्सा एमपीएफडीसी और 20 फीसद स्थानीय समुदाय के लिए छोड़ा जाएगा. अभी पूरी लघु वन उपज पर वनों और उसके आसपास रहने वाले समुदायों का अधिकार है. एमपीएफडीसी को मिलने वाली एमएफपी को खरीदने का पहला अधिकार निवेशक को होगा. वन संरक्षण संशोधित अधिनियम, 2023 के तहत वनरोपण के लिए निवेशक को ग्रीन क्रेडिट दिया जाएगा.

कागज पर ही सही, वनरोपण के मानदंड तर्कसंगत बनाए गए हैं. वनरोपण में स्थानीय पौधों की प्रजातियों को वरीयता दी जाएगी और विदेशी प्रजातियां लगाने की अनुमति नहीं होगी. तीन साल बाद पौधों के जीवित रहने की दर 75 फीसद सुनिश्चित करनी होगी. अगर यह दर इससे कम होती है तो क्रियान्वयन एजेंसी को अंतर पाटना होगा. यह दर 40 फीसद से नीचे आती है और वृक्षारोपण का कार्य एमपीएफडीसी ने किया है तो उसकी पूरी लागत निवेशक को लौटा दी जाएगी. अहम बात यह कि तीन वर्षों के बाद वृक्षारोपण की सुरक्षा की जिम्मेदारी निवेशक की होगी.

जैन का कहना है कि निजी निवेशकों को लाने के बजाए समुदाय को ही वनों पर अधिक अधिकार देना उनकी सुरक्षा के लिए काफी होता. वे आगाह कहते हैं, ''सरकार को इस मोर्चे पर कोई भी कदम बहुत सोच-समझकर उठाना चाहिए.''

वनों के पुनरुद्धार के लिए निजी क्षेत्र को शामिल करने का मध्य प्रदेश का प्रस्ताव, मगर कार्यकर्ताओं को अंदेशा है कि इससे वनों तक स्थानीय लोगों की पहुंच खत्म होगी