मुहम्मद यूनुस से पहले भी ये नोबेल पुरस्कार विजेता रह चुके हैं सत्ता के शीर्ष पर, देखें तस्वीरें

अगस्त की 8 तारीख को रात करीब 8 बजे नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया के तौर पर शपथ ली. पिछले कुछ महीनों से भारत के इस पड़ोसी देश में चल रही राजनीतिक अशांति और विरोध प्रदर्शनों के बीच 4 अगस्त को प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्तीफा देने के साथ-साथ देश छोड़ कर भागना पड़ा था. इसके बाद अंतरिम सरकार का गठन हुआ.
इसका नेतृत्व करने के लिए बांग्लादेश में आरक्षण के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों की अगुआई कर रहे छात्र नेताओं ने मुहम्मद यूनुस को यह जिम्मेदारी सौंपी. इसके लिए खास तौर पर बांग्लादेश की एक अदालत ने 8 अगस्त को श्रम कानून उल्लंघन मामले में यूनुस की पिछली सजा को भी पलट दिया. बहरहाल, यूनुस पहले ऐसे नोबेल पुरस्कार विजेता नहीं हैं जिन्हें देश का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी मिली.
आइए जानते हैं उन नेताओं के बारे में, जिन्होंने पहले अपने शानदार कामों की वजह से नोबेल पुरस्कार जीता, बाद उसके उन्हें अपने देश की अगुआई का मौका भी मिला. (तस्वीर में (बाएं) मुहम्मद यूनुस और (दाएं) आंग सान सू की)

1. लेस्टर बी पियर्सन (1897-1972), पूर्व कनाडाई प्रधानमंत्री
साल 1963 में लेस्टर बी पियर्सन अपने 66वें जन्मदिन से एक दिन पहले कनाडा के प्रधानमंत्री बने थे. उनके बारे में माना जाता है कि वे स्वभाव से जरा सनकी लेकिन काफी बुद्धिमान और महत्वाकांक्षी थे. उन्होंने लिबरल पार्टी की अगुआई करते हुए 1968 तक कनाडा के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली. इस दौरान उनकी सरकार अल्पमत में रही थी, लेकिन उन्होंने कनाडाई आम लोगों के लिए काफी कुछ किया. उन्होंने एक राष्ट्रीय पेंशन योजना के साथ-साथ एक परिवार सहायता कार्यक्रम शुरू किया, वृद्ध लोगों के सुरक्षा लाभों को व्यापक बनाया और देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया.
प्रधानमंत्री बनने से पहले पियर्सन एक राजनयिक रहे थे, जिन्होंने साल 1956 में स्वेज नहर संकट को हल करने में अहम भूमिका निभाई थी. पियर्सन को इस काम के लिए 1957 में शांति का नोबेल पुरस्कार मिला. दरअसल, 26 जुलाई 1956 को मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. उस समय तक ये नहर फ्रांसीसी और ब्रिटिश स्वामित्व वाली कंपनियों के अधीन थी, और इसका यूरोप और एशिया के बीच संपर्क साधन के रूप में एक बड़ा रणनीतिक महत्व था. नासिर के इस फैसले ने एक अंतरराष्ट्रीय तनाव को जन्म दिया, जिसकी वजह से ब्रिटेन, फ्रांस और इजरायल ने अंततः नहर को सुरक्षित करने के लिए सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी.
पियर्सन तब कनाडा के विदेश मंत्री थे और इस संकट के समय संयुक्त राष्ट्र में देश के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे थे. पियर्सन ने पहले कूटनीति के जरिए इस संकट का समाधान तलाशने की कोशिश की. लेकिन जब इससे बात नहीं बनी तो उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासचिव डैग हैमरस्कॉइल और कुछ अन्य अमेरिकियों की मदद से अक्तूबर के अंत तक एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें शांति सेना (पीस कीपिंग फोर्स) के निर्माण और ब्रिटेन-फ्रांस-इजरायली हमलावर बलों की वापसी का आह्वान किया गया. नवंबर में उनका यह प्रयास रंग लाया और अमेरिकी दबाव के चलते सैन्य कार्रवाई पर विराम लगा. पियर्सन को उनके इन प्रयासों के लिए अक्टूबर 1957 में शांति का नोबेल पुरस्कार मिला.

2. आंग सान सू की (जन्म 1945), म्यांमार की पूर्व स्टेट काउंसलर
19 जून, 1945 को जन्मी आंग सान सू की, बर्मा (अब म्यांमार) की आजादी के नायक आंग सान की बेटी हैं. उनके पिता आंग सान की हत्या तब कर दी गई थी जब वह सिर्फ दो वर्ष की थीं. सू की की शिक्षा-दीक्षा म्यांमार, भारत और यूनाइटेड किंगडम में हुई. 1988 में जब वे अपनी मरती हुई मां की देखभाल करने वतन वापस लौटीं, तो इसके बाद वे जल्द ही देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए चल रहे राष्ट्रव्यापी आंदोलन में शामिल हो गईं.
सैन्य शासन ने इस आंदोलन को काफी क्रूरता से हैंडल किया, और 8 अगस्त 1988 को 5,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को मार डाला. लेकिन इस विद्रोह के दौरान आंग सान सू की काफी प्रमुखता से उभरीं. उन्होंने 24 सितंबर 1988 को एक नई लोकतंत्र समर्थक पार्टी 'नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी' एनएलडी का गठन किया. बढ़ते घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते सैन्य तानाशाही जुंटा को 1990 में आम चुनाव कराने के लिए बाध्य होना पड़ा.
इन चुनावों में एनएलडी ने संसद में 81 फीसद सीटें जीतीं लेकिन जुंटा ने सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया. इससे म्यांमार के हालात के बारे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाराजगी फैली. इधर चुनाव से पहले ही सू की को हिरासत में ले लिया गया था. बहरहाल, म्यांमार में "लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए अपने अहिंसक संघर्ष के लिए" साल 1991 में उन्हें शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
इसके आगे की कहानी यूं है कि 2010 में तीसरी बार रिहा होने से पहले उन्होंने करीब 15 साल से अधिक का समय नजरबंदी में बिताया. इस दशक में सू की ने म्यांमार में सैन्य शासन से आंशिक लोकतंत्र में परिवर्तन का नेतृत्व किया, और 2016 में देश की स्टेट काउंसलर बनीं. काउंसलर की यह पदवी किसी देश के प्रधानमंत्री के बराबर ही होती है जो सरकार का मुखिया होता है.
बहरहाल, सत्ता में आने के बाद म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या लोगों के उत्पीड़न और जातीय सफाए को उनके मौन समर्थन के लिए आंग सान सू की की विश्वव्यापी निंदा हुई. 2021 में एक बार फिर देश में सैन्य शासन बहाल हुआ. सू की को गिरफ्तार कर लिया गया. फिलहाल वे भ्रष्टाचार के आरोपों में 27 साल की जेल की सजा काट रही हैं.

3. लेक वाल्सा (जन्म 1943), पोलैंड के पूर्व राष्ट्रपति
लेक वाल्सा का जन्म पोपोवो, पोलैंड में हुआ था. दूसरे विश्व युद्ध के कुछ समय बाद ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी, उन्हें उनकी मां और चाचा, चाची ने पाला. युद्ध के बाद सोवियत संघ (यूएसएसआर) ने पोलैंड पर कब्जा कर लिया था, और यूएसएसआर द्वारा थोपी गई साम्यवादी सरकार देश में कैथोलिक चर्च को छोड़कर जीवन के करीब हर पहलू को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी.
वाल्सा ने एक इलेक्ट्रीशियन और मैकेनिक के रूप में ट्रेनिंग ली और युवावस्था में ग्दान्स्क में लेनिन शिपयार्ड में काम करने चले गए. वे शिपयार्ड प्रबंधन और साम्यवादी शासन के मुखर आलोचक थे. वे 1970 की शिपयार्ड हड़ताल में शामिल हुए और अगले एक दशक में शिपयार्ड विरोध प्रदर्शनों को संगठित करने में उनकी अहम भूमिका रही. उन्होंने सॉलिडैरिटी ट्रेड यूनियन की स्थापना की और उसका नेतृत्व किया. 1976 में उन्हें उनकी राजनीतिक गतिविधियों के चलते नौकरी से निकाल दिया गया. अगले चार सालों तक उन्हें सिर्फ छिटपुट नौकरियां ही मिलती रहीं, लेकिन इस बीच वे अपने संगठन में लगे रहे.
1980 में शिपयार्ड के कर्मचारियों ने एक बार फिर हड़ताल की, और इस दौरान वाल्सा पूर्वी ब्लॉक में पहले स्वतंत्र ट्रेड यूनियन सॉलिडैरिटी के एक प्रमुख प्रवक्ता के रूप में उभरे. इसका असर यह हुआ कि पूरे देश में हड़तालों की एक शृंखला फैल गई, और तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार को सॉलिडैरिटी को मान्यता देने पर मजबूर होना पड़ा. लेकिन यह जीत अल्पकालिक थी. जब सॉलिडैरिटी ने स्वतंत्र चुनावों का आह्वान किया, तो सरकार ने इस यूनियन को गैरकानूनी घोषित कर दिया.
इसके बाद रूसी सैन्य हस्तक्षेप के डर से पोलैंड की कठपुतली सरकार ने दिसंबर 1981 में मार्शल लॉ घोषित कर दिया. वाल्सा गिरफ्तार कर लिए गए और बिना किसी मुकदमे के महीनों तक जेल में रहे. आखिरकार सितंबर 1982 में उन्हें रिहा किया गया, लेकिन इस बीच वे सरकारी निगरानी में रहे. बाद में चलकर इसी सॉलिडैरिटी ट्रेड यूनियन ने 1989 में पोलैंड में कम्युनिस्ट शासन का खात्मा किया. वाल्सा को 1983 में "पोलैंड में मुक्त ट्रेड यूनियनों और मानवाधिकारों के लिए अहिंसक संघर्ष" के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार मिला. बाद में वे पोलैंड के राष्ट्रपति (1990-95) बने. वे 1926 के बाद लोकतांत्रिक रूप से चुने जाने वाले पहले राष्ट्रपति थे. वे कहा करते थे, "जब मैंने यह कहना जारी रखा कि हम शांतिपूर्ण तरीकों से साम्यवाद के खिलाफ जीत हासिल करेंगे, तो लोगों ने मुझे पागलों की तरह देखा."

4. नेल्सन मंडेला (1918-2013), दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति
मंडेला ने 1994 से 1999 तक दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति के तौर पर देश की सेवा की. वे देश के पहले ब्लैक राष्ट्रपति थे. साल 1993 में उन्हें "रंगभेद शासन के शांतिपूर्ण खात्मे के लिए उनके काम के लिए, और एक नए लोकतांत्रिक दक्षिण अफ्रीका की नींव रखने के लिए" तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रेडरिक विलेम डी क्लार्क के साथ संयुक्त रूप से शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
मंडेला 1943 में अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए थे, और इसके बाद उन्होंने देश में व्याप्त नस्लीय अलगाव की नीति के खिलाफ लड़ाई लड़ने में सक्रिय भूमिका निभाई. उन्हें बार-बार देशद्रोही गतिविधियों के लिए गिरफ्तार किया गया और 1956 में राजद्रोह के आरोप में एक असफल मुकदमा चलाया गया.
आखिरकार उन्हें सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश रचने के आरोप में 1962 में गिरफ्तार कर लिया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. उन्होंने अगले 27 साल जेल में रहकर बिताए. लेकिन इस दौरान वे रंगभेद विरोधी आंदोलन के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके थे.
जैसे-जैसे रंगभेद को समाप्त करने के लिए दक्षिण अफ्रीका पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता गया और देश में नस्लीय गृहयुद्ध की आशंकाएं बढ़ती गईं, डी क्लार्क (तत्कालीन राष्ट्रपति) ने 1990 में मंडेला को रिहा कर दिया. इसके बाद अगले चार सालों के दौरान, इन दोनों नेताओं ने रंगभेद को शांतिपूर्ण तरीके से खत्म करने के लिए बातचीत की.

5. जोस रामोस-होर्ता (जन्म 1949), ईस्ट तिमोर
जोस रामोस-होर्ता 2022 से पूर्वी तिमोर के राष्ट्रपति हैं. इससे पहले उन्होंने 2007 से 2012 तक इस पद पर और 2006 से 2007 तक प्रधानमंत्री का पद संभाला था. उन्होंने 1996 में कार्लोस फिलिप जिमेनेस बेलो के साथ "पूर्वी तिमोर में संघर्ष के न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में" काम करने के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार जीता. रामोस-होर्ता का महत्व क्या है, आइए समझते हैं.
दरअसल, ऑस्ट्रेलिया के ठीक उत्तर में और इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप के दक्षिण-पूर्व में स्थित ईस्ट तिमोर एक छोटा-सा द्वीप है. औपनिवेशिक काल के दौरान डच (हॉलैंडवासियों) और पुर्तगालियों ने इस द्वीप को दो हिस्सों में बांट दिया था. 1949 में जब डचों ने इंडोनेशिया की आजादी को औपचारिक रूप से मान्यता दी, तो द्वीप का पश्चिमी भाग इंडोनेशिया के पास चला गया. वहीं पुर्तगालियों ने 1975 तक पूर्वी तिमोर पर शासन कब्जाए रखा.
जब पुर्तगाली शासन का अंत हुआ, तो इंडोनेशिया ने पूरे द्वीप पर कब्जा कर लिया. इस प्रकार ईस्ट तिमोर को आजाद कराने के लिए एक प्रतिरोध आंदोलन शुरू हुआ. यह संघर्ष अगले 20 सालों तक चलता रहा. इस दौरान जोस रामोस-होर्ता इस प्रतिरोध आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक के रूप में उभरे. वे ईस्ट तिमोर की आजादी की मांग लिए दुनिया भर में गए. साल 1992 में उन्होंने एक शांति योजना प्रस्तुत की जिसने आखिरकार ईस्ट तिमोर से इंडोनेशियाई लोगों की वापसी और स्थानीय लोगों के आत्म निर्णय की नींव रखी कि वे आखिर कहां जाना चाहते हैं.
साल 2002 में ईस्ट तिमोर, जिसे तिमोर-लेस्ते के नाम से भी जाना जाता है, 21वीं सदी का एक पहला नया संप्रभु राज्य बन गया.
बहरहाल, यहां बात उन नेताओं की हो रही थी, जिन्होंने पहले नोबेल पुरस्कार जीता, और बाद में अपने देश के राष्ट्राध्यक्ष बने. इन नेताओं में एक साझापन देखा जा सकता है कि इन सभी को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला. अगर उन सभी राष्ट्राध्यक्षों की बात की जाए, जिन्हें सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के बाद में या पहले नोबेल पुरस्कार मिला तो उनकी कुल संख्या 30 है. इनमें से 29 लोगों को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला, जबकि विंस्टन चर्चिल (ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री) ऐसे नेता रहे हैं जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था.