इंडिया टुडे आर्काइव: वो कहानी जब सुशील मोदी बिहार में बीजेपी को स्थापित कर रहे थे
तारीख़ 13 मई, 2024. वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रोड शो चल रहा था. इसी वक्त बिहार से एक ख़बर आई कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी का निधन हो गया. वे बीते 6 महीने से कैंसर से पीड़ित थे, जिसकी जानकारी उन्होंने खुद 3 अप्रैल को एक्स पर दी थी. लोग उनके फेसबुक पेज पर ख़बर की पुष्टि के लिए दौड़े. इस उम्मीद में कि शायद किसी परिजन ने पोस्ट लिखी होगी. और दिखा ये कि पेज से पीएम मोदी के वाराणसी दौरे का लाइव प्रसारण चल रहा है. बिहार में बीजेपी के लिए सुशील मोदी का किरदार कुछ ऐसा ही था. कैसी भी परिस्थिति हो पार्टी के लिए 100 फीसदी समर्पण.
सुशील मोदी को अब हर कोई अपने तरीके से याद कर रहा है. किसी के लिए वो एक ऐसे नेता थे जिसका कोई न कोई बयान पटना के अख़बारों में हर रोज़ छपा करता था. संघ के विचारक रहे केएन गोविंदाचार्य की मेंटरशिप में बड़े नेता बने सुशील मोदी की सियासत में कई पन्ने हैं. किसी पन्ने पर दर्ज है कि उन्होंने इमरजेंसी के दौरान 19 महीने जेल में बिताए और पहली जीत सिर्फ 3 हज़ार वोटों से हुई. किसी पन्ने पर लिखा है कि लालू प्रसाद यादव को जेल भेजने में सबसे अहम किरदार वही रहे. कहीं लिखा मिलता है कि 2002 के बाद बिहार के चुनावों से नरेंद्र मोदी दूर रखने का समर्थन इन्हीं सुशील मोदी ने किया था. तो कभी वो खुद किस्सा सुना गए कि कैसे मुंबई जाते वक़्त ट्रेन में एक लड़की से मिले, 1986 में उससे शादी कर ली. ब्याह में अटल बिहारी वाजपेयी आए और पॉलिटिक्स में न आने का मन बना रहे सुशील मोदी को एक्टिव पॉलिटिक्स में ले आए.
सुशील मोदी की बिसात के कुछ किस्से इंडिया टुडे मैगज़ीन के 11 मई, 2011 के अंक में भी मिलते हैं. बिहार की राजनीति में इस वक्त बीजेपी के लिए कोई सबसे बड़ा चेहरा था, तो वे सुशील मोदी ही थे, लेकिन उनके लिए राजनीति कभी भी फूलों का सेज नहीं रही. चुनौतियां बाहर वालों से तो मिली ही लेकिन अंदर वालों ने भी कोई कसर नहीं थी. अमिताभ श्रीवास्तव ने 2011 में अपनी रिपोर्ट में उस समय गुजरात के सीएम रहे नरेंद्र मोदी और सुशील कुमार मोदी में कॉमन मोदी सरनेम पर लिखा कि
“अगर गूगल पर “Politician Modi” लिखकर सर्च करेंगे, तो 3.45 लाख रिज्ल्ट गुजरात के CM नरेंद्र मोदी पर आते हैं, जबकि 1 लाख 42 हजार रिजल्ट्स सुशील मोदी के नाम पर. दोनों मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक ही विचारधारा के अनुयायी हैं. लेकिन दोनों के अपने-अपने परिवेशों में अंतर ने इतनी ज्यादा असमानताएं पैदा कर दी हैं, कि दोनों का एक सरनेम होना महज एक संयोग है”.
असमानताओं पर थोड़ा और स्ट्रेस करते हुए अमिताभ ने उस समय लिखा कि पहले मोदी यानी नरेंद्र मोदी भाजपा में राष्ट्रीय राजनीति की अगली कतार में हैं, जबकि लालू- राबड़ी राज में आठ साल तक विपक्ष के नेता रहे सुशील मोदी -बस नंबर दो की हैसियत में एक योग्य व्यक्ति थे, मददगार थे, लेकिन कभी एक अलग शख्सियत नहीं थे.
लेकिन जैसा कहा जाता है कि किसी नजरिये की उम्र सीमित होती है. नवंबर 2005 में NDA की शुरुआत के दौरान सुशील मोदी ने वित्त मंत्रालय अपने पास रखा. सुशील मोदी राज्य में बीजेपी के प्रतिनिधि चेहरे के तौर पर उभरे. उनकी निगाह अपनी धार तेज करने पर थी, दूसरी तरफ विरोधियों को उन्हें शांत करना था और अपने भविष्य की रक्षा करनी थी. पार्टी का एक शक्तिशाली धड़ा उनके हाथों में नेतृत्व सौंपे जाने के खिलाफ था. उस समय भाजपा अध्यक्ष सी.पी. ठाकुर ने टिकट बंटवारे को लेकर चुनाव अभियान के बीच ही घर बैठ जाने की धमकी दी थी, लेकिन सुशील मोदी ने भाजपा के सरपट जीतने का बंदोबस्त कर लिया था.
इसी नंबर दो यानी सुशील मोदी ने नवंबर 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में करिश्मा कर दिखाया. बीजेपी जिन 102 सीटों से चुनाव लड़ी, उनमें से 91 पर जीत मिल गई. चुनाव नतीजों ने इस तरह की हर बहस पर पूर्णविराम लगा दिया कि भाजपा समाज के हर वर्ग के वोट नहीं ले पाती.
इस दौरान मुस्लिम वोट भी बीजेपी को ही मिले और बीजेपी धर्मनिरपेक्षता का वो भरोसा फिर पाने में सफल रही, जो उसने 2002 के बाद खो दिया था. जिस NDA ने गुजरात की घटना के बाद दिल्ली में सरकार खो दी थी, वो बिहार के नतीजों के बाद एक और सरकार बनाने की - हसरतें पालने लगा. इस कामयाबी की अपनी कीमत भी थी. अमिताभ लिखते हैं कि उन्हें ऐसे नेता के तौर पर देखा गया, जिसने बीजेपी के कट्टर चेहरे नरेंद्र मोदी को चुनावों में बिहार से दूर रखने का पक्ष लिया था. ये उनके लिए निजी जीत थी. कमान हमेशा उनके हाथों में ही रही. भाजपा की सफलता की उनकी रची कहानी कई निशानियां छोड़ती गई.
1973 में छात्र संघ के महासचिव होने के बावजूद, पटना यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन के एग्जाम से ठीक पहले, उन्होंने सारी सामाजिक-राजनैतिक एक्टीविटीज छोड़ दीं. कई लोगों को लगता था कि वे परीक्षा में फेल हो जाएंगे, क्योंकि Botany मुश्किल Subject होता है और क्लास में उनकी Attendance न के बराबर रही थी. लेकिन वे पूरी यूनिवर्सिटी में दूसरे नंबर पर रहे. ये भी इत्तेफाक है कि यूनिवर्सिटी में नंबर दो पर रहने वाले सुशील मोदी राजनीति में भी नंबर दो पर ही रहे, कभी सीएम नहीं बन पाए.
हालांकि सुशील मोदी ने अपनी छोटी शुरुआत से कामयाबी की बड़ी छलांग लगाई, लेकिन शुरुआत में वे राजनीति में न आने के पक्ष में थे. 1977 में, जब जेपी आंदोलन से जुड़े 55 युवा कार्यकर्ता बिहार में विधायक चुने गए थे, तब सुशील मोदी ने राजनीति में न जाने का रास्ता अपनाया और Political Career से परे, ABVP में बने रहे. जिंदगी में बदलाव आया 13 अप्रैल, 1986 को जेसी जॉर्ज के साथ शादी के बाद जेसी से वे मुंबई जाते समय ट्रेन में मिले थे. शादी के लिए उन्होंने बीजेपी के पितृपुरुष अटलबिहारी वाजपेयी को औपचारिक निमंत्रण भेजा था. शादी में शामिल होने खुद वाजपेयी पटना आए, वहीं उन्होंने सुशील मोदी से सक्रिय राजनीति में आने को कहा.
इसके बाद 1990 में जब बीजेपी ने उन्हें कांग्रेस के गढ़ पटना सेंट्रल से चुनाव मैदान में उतारा, तो उन्होंने कांग्रेस के मौजूदा विधायक अकील हैदर को हरा दिया. राजनीति उनके लिए कितनी पेचीदा रही ये 2008 की घटना से भी साफ जाहिर होता है. भाजपा के कुछ नेताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया. राज्य इकाई के विधायक उन्हें उपमुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग कर रहे थे. सुषमा स्वराज और वैंकैया नायडू ने दखल दिया, जिसके बाद सीक्रेट वोट के जरिए तय करने का फैसला लिया गया कि वे डिप्टी सीएम बने रहेंगे या नहीं. सीक्रेट वोटिंग में कुल MLA और MLC के 67 वोटों में से मोदी को 35 वोट मिले और तय हुआ कि वे डिप्टी सीएम बने रहेंगे.
सुशील मोदी के बारे में कहा गया कि उनका जन्म ही डिप्टी सीएम बनने के लिए हुआ है. अगर बिहार में आज स्थिति ये है कि नीतीश कुमार खुद बीजेपी के लिए वोट मांगने पर महबूर हैं, तो इसकी बीजेपी को इतना बड़ा बनाने की नींव सुशील मोदी ने ही रखी.