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लोकसभा चुनाव 2024 : भाजपा ने दिल्ली में नए चेहरों पर क्यों लगाया दांव?

भाजपा ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की पहली सूची में दिल्ली की सात सीटों में से पांच पर उम्मीदवारों की घोषणा की है और इनमें से चार पर उसने मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए हैं

भाजपा ने नई दिल्ली सीट से मौजूदा सांसद मीनाक्षी लेखी का टिकट काटकर बांसुरी स्वराज को उम्मीदवार बनाया है
भाजपा ने नई दिल्ली सीट से मौजूदा सांसद मीनाक्षी लेखी का टिकट काटकर बांसुरी स्वराज को उम्मीदवार बनाया है
अपडेटेड 7 मार्च , 2024

बीते हफ्ते 2 फरवरी को  भाजपा ने 195 उम्मीदवारों की जो पहली सूची जारी की है, उसमें दिल्ली और छत्तीसगढ़ को छोड़कर बाकी राज्यों में मौजूदा सांसदों को ही ज्यादातर टिकट दिए गए हैं. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में तो अभी घोषित 51 सीटों में से 44 पर मौजूदा सांसदों को ही उम्मीदवार बनाया है.

लेकिन दिल्ली में तस्वीर बिल्कुल उलटी है. दिल्ली की सात सीटों में से पांच के उम्मीदवारों की घोषणा भाजपा ने की है और इनमें से चार पर नए उम्मीदवारों पर दांव खेला है. इन चार में सिर्फ उत्तर-पूर्वी दिल्ली की लोकसभा सीट ऐसी है, जहां से पार्टी ने दो बार के सांसद मनोज तिवारी को एक बार फिर से उम्मीदवार बनाया है. 

बची दो सीटों में से एक पूर्वी दिल्ली के सांसद गौतम गंभीर ने पहले ही सार्वजनिक तौर पर कह दिया है कि वे चुनाव नहीं लड़ना चाहते और वापस क्रिकेट की दुनिया में और अधिक सक्रिय होना चाहते हैं. यानी पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट पर भी नया उम्मीदवार पक्का है. बची हंसराज हंस की उत्तर पश्चिमी लोकसभा सीट तो उनके बारे में चर्चा है कि पार्टी उन्हें पंजाब की किसी सीट से उम्मीदवार बना सकती है.

भाजपा ने दिल्ली में जिन तीन सांसदों का टिकट काटा है, उनमें मोदी सरकार में 2021 तक मंत्री रहे हर्षवर्धन भी शामिल हैं. वहीं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा का भी टिकट भाजपा ने काट दिया है. साथ ही दिल्ली के स्थानीय नेता की तौर पर पहचान रखने वाले रमेश विधूड़ी को भी इस बार भाजपा ने टिकट नहीं दिया. पार्टी के अन्य सांसदों के मुकाबले ये तीनों दिल्ली प्रदेश भाजपा की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं. इसके बावजूद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इन्हें टिकट नहीं देने का निर्णय लिया.

ऐसे समय में जब 2024 में 370 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल करने के लक्ष्य के साथ भाजपा अधिकांश राज्यों में अपने मौजूदा उम्मीदवारों को ही इस बार भी उतार रही है तो आखिर दिल्ली में इतने बड़े पैमाने पर उम्मीदवार क्यों बदले गए? वह भी तब जब 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने लगातार सात की सातों लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी. 

अन्य राज्यों में मौजूदा सांसदों को फिर से टिकट देने के उलट दिल्ली में नए चेहरों पर दांव लगाने की रणनीति के बारे में दिल्ली प्रदेश भाजपा के एक पदाधिकारी कहते हैं, ''इस बार के चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के गठबंधन की वजह से भी भाजपा को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ा है. हालांकि, 2019 में दिल्ली की सभी सीटों पर कांग्रेस और आप को मिले कुल वोटों को जोड़ लें तो भी भाजपा इनसे काफी आगे थी लेकिन फिर भी हर लिहाज से आपको तैयारी करनी होती है.''

वे आगे यह भी कहते हैं, ''अब तक जिन चार सांसदों का टिकट काटा गया है, वो पिछले दस साल से सांसद थे. कई बार स्थानीय स्तर पर भी मौजूदा सांसद को लेकर लोगों में नाराजगी का एक माहौल बन जाता है. इसलिए भी पार्टी को लगा कि नया प्रयोग करते हैं.''

यह पूछे जाने पर कि इस तर्क के आधार पर तो मनोज तिवारी का टिकट भी कटना चाहिए था, क्योंकि वे भी दो कार्यकाल से उत्तरी-पूर्वी दिल्ली के सांसद हैं, भाजपा पदाधिकारी का कहना था, ''उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सीट पर पूर्वांचल के लोगों की अच्छी—खासी संख्या है. फिर अघोषित तौर पर यह भी हो गया है कि दिल्ली की सात सीटों में से एक सीट पूर्वांचल के किसी उम्मीदवार को जाएगी. इस नजरिये से उत्तर प्रदेश की सीमा से सटी हुई उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सीट सबसे अनुकूल है.'' वैसे आसनसोल से भाजपा का टिकट मिलने के बाद चुनाव लड़ने से इनकार करने वाले भोजपुरी गायक और अभिनेता पवन सिंह की नजर भी इस सीट पर थी लेकिन भाजपा ने एक बार फिर मनोज तिवारी पर ही दांव लगाया.

दिल्ली प्रदेश भाजपा के नेताओं से बातचीत करने पर सबसे रोचक कहानी नई दिल्ली सीट की सामने आती है. इस सीट से 2014 और 2019 में चुनाव जीतने वाली मीनाक्षी लेखी मोदी सरकार में मंत्री हैं और उनसे जुड़ा कोई विवाद भी नहीं रहा है. फिर भी उनका टिकट काटकर भाजपा की दिग्गज नेता रहीं सुषमा स्वराज की बेटी बांसुरी स्वराज को टिकट दे दिया गया.

तकरीबन साल भर पहले भाजपा ने जिन 160 मुश्किल लोकसभा सीटों की पहचान की थी, उनमें से हर मंत्री को दो—तीन सीटों की जिम्मेदारी दी गई थी. हर मंत्री को अपने जिम्मे की सीटों पर कई बार जाना था और वहां भाजपा की संभावनाओं को मजबूत करने के लिए काम करना था. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं  कि मीनाक्षी लेखी ने इस जिम्मेदारी को गंभीरता से नहीं लिया और एक मंत्री के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों का हवाला देकर अपने जिम्मे की सीटों पर उतनी सक्रिय नहीं रहीं, जितनी पार्टी को अपेक्षा थी. यह बात भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक भी पहुंची.

दूसरी तरफ बांसुरी स्वराज भी लगातार अपनी दावेदारी कर रही थीं. पार्टी के कई लोग बांसुरी स्वराज में उनकी मां और दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं सुषमा स्वराज की झलक देखते हैं. पार्टी में एक सोच यह थी कि सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने वाली बांसुरी स्वराज अच्छा बोलती हैं, युवा हैं और महिला हैं तो इस नाते दिल्ली भाजपा में भविष्य की नेता के तौर पर उन्हें तैयार किया जा सकता है. 

प्रदेश भाजपा के एक नेता ने तो यहां तक दावा किया कि बांसुरी स्वराज को तकरीबन छह—आठ महीने पहले शीर्ष नेतृत्व की तरफ से कहा दिया गया था कि आप अधिक से अधिक रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन में जाकर काम कीजिए. इस निर्देश के बाद बांसुरी स्वराज जमीनी स्तर पर बेहद सक्रिय हो गईं और पार्टी ने उन्हें इसका ईनाम देते हुए नई दिल्ली सीट से लोकसभा उम्मीदवार बना दिया.

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