scorecardresearch

जेरेमी कॉर्बिन : यूके का निर्दलीय सांसद पश्चिम में वामपंथी राजनीति का सबसे चर्चित चेहरा कैसे बना?

फ्रांस के चुनाव के बाद यूके के निर्दलीय सांसद और कभी लेबर पार्टी के प्रमुख रहे जेरेमी कॉर्बिन सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में हैं और कश्मीर पर अपने रुख के चलते एक तबका उन्हें भारत विरोधी भी कहता है

जेरेमी कॉर्बिन
जेरेमी कॉर्बिन
अपडेटेड 10 जुलाई , 2024

जुलाई की आठ तारीख को जैसे ही फ्रांस के चुनाव में वामपंथी पार्टियों के सबसे आगे रहने की घोषणा हुई, अचानक ही जेरेमी कॉर्बिन का नाम सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा. इस ट्रेंड के साथ चर्चा शुरू हुई कि फ्रांस और यूके, दोनों जगह मार्क्सवादी विचारधारा ने फासीवादी ताकतों को धूल चटा दी है.

जेरेमी कॉर्बिन यूके के चुनाव के ठीक पहले भी ट्रेंड कर रहे थे. अगर आप सोशल मीडिया पर तफरीह करने के आदी हैं तो आपने भी ये नाम सुना ही होगा. लेकिन जेरेमी कॉर्बिन असल में हैं कौन? और क्यों पश्चिम के दो बड़े देशों के चुनाव में दक्षिणपंथी पार्टियों की हार के बाद लोग उनकी चर्चा करने लगे?

ब्रिटिश सांसद कॉर्बिन अपनी वेबसाइट पर खुद के बारे में कुछ ऐसे बताते हैं, "मैं अपना बहुत सारा समय और ऊर्जा नस्लवाद-विरोध, साम्राज्यवाद-विरोध, LGBT+ के अधिकारों, परिवहन, पर्यावरण, परमाणु हथियारों और सैन्य हस्तक्षेप का विरोध, ट्रेड यूनियन नीतियों, न्याय की विफलताओं पर केंद्रित करता हूं. मेरे अंतर्राष्ट्रीय हितों में मानवाधिकार, शांति और न्याय विशेष तौर पर सम्मिलित हैं."

जेरेमी कॉर्बिन आगे अपनी यात्राओं के बारे में बताते हुए पश्चिमी सहारा, चागोस द्वीप समूह, मध्य पूर्व, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, आयरलैंड, पश्चिमी पापुआ, दलित समुदाय, रोहिंग्या सहित अनसुलझे संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों और समुदायों के समर्थन की बात करते हैं. और इसी समर्थन की वजह से शायद एक समय यूके की लेबर पार्टी के मुखिया रहे कॉर्बिन को अपनी ही पार्टी छोड़कर निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा.

पांच जुलाई को जब यूके चुनावों के नतीजे आए तो जेरेमी कॉर्बिन ने पार्टी से निष्कासित होने के बावजूद एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी इस्लिंगटन नॉर्थ की सीट बरकरार रखी. कॉर्बिन ने इस्लिंगटन निर्वाचन क्षेत्र में 24,120 वोटों के साथ जीत हासिल की, जो लेबर पार्टी के भारतीय मूल के उम्मीदवार प्रफुल नरगुंड से 7,247 वोट ज्यादा थे. 75 साल के पूर्व लेबर नेता 1983 से इसी सीट से 10 बार चुनाव जीत चुके हैं.

कॉर्बिन ने 2019 के आम चुनाव के बाद पार्टी नेता के रूप में अपना पद छोड़ दिया था क्योंकि 1935 के बाद से यह लेबर पार्टी की सबसे खराब चुनावी हार थी. यह पद छोड़ने के बाद भी कॉर्बिन एक सदस्य और कार्यकर्ता के रूप में लेबर पार्टी के लिए लगातार काम कर रहे थे. इसी बीच अक्टूबर 2020 में उनपर राजनीतिक वजहों से अपनी पार्टी में यहूदी विरोधी भावना को नाटकीय रूप से बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगा और इसी वजह से उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया.

हालांकि 19 दिनों के बाद, उन्हें पार्टी में फिर से शामिल कर लिया गया, लेकिन स्टारमर (तब पार्टी व्हिप और यूके के प्रधानमंत्री) के भीतर काम करने का मतलब था कि अगले आम चुनाव की घोषणा होने तक उन्हें एक निर्दलीय सांसद के रूप में ही रहना पड़ता. वे हमेशा पार्टी व्हिप के कहने पर नहीं बल्कि अपने मुताबिक संसद में वोट देते थे. ऐसा करने की वजह से ही उन्हें लेबर पार्टी का सबसे विद्रोही सांसद कहा जाने लगा, जिन्होंने 500 से अधिक बार पार्टी के लाइन की अवहेलना की.

मार्च 2023 में कीर स्टारमर ने कॉर्बिन को लेबर उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने से रोक दिया था. लेकिन चुनाव की घोषणा के तुरंत बाद कॉर्बिन ने ऐलान किया कि वे एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ेंगे, जिसके कारण उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया.

जेरेमी कॉर्बिन की राजनीति उनके राजनीतिक रूप से सक्रिय माता-पिता, नाओमी और डेविड से वामपंथी बहसों से ही शुरू हुई. राजनीति में उनकी भागीदारी कम उम्र में ही शुरू हो गई थी, स्कूल के दौरान वे व्रेकिन लेबर पार्टी और यंग सोशलिस्ट में शामिल हो गए. बाद में वे ट्रेड यूनियन एक्टिविज्म में उतरे मगर उनका मन लेबर पार्टी की राजनीति में ही लगा था.

कॉर्बिन 1974 में हैरिंगे डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के लिए चुने गए और 1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक की शुरुआत में लेबर पार्टी के आंतरिक संघर्षों के दौरान खुद को वामपंथी धारा के साथ जोड़ लिया. उन्होंने टोनी बेन (पूर्व ब्रिटिश सांसद) के लोकतांत्रिक समाजवाद के साथ निकटता से पहचान बनाई और इकॉनॉमिक प्लानिंग के साथ ही परमाणु निरस्त्रीकरण और एकीकृत आयरलैंड की वकालत की.

जेरेमी कॉर्बिन ने रंगभेद विरोधी आंदोलन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में काम किया और 1984 में साउथ अफ्रीका हाउस के बाहर विरोध प्रदर्शन करने के लिए गिरफ्तार किए गए. कॉर्बिन फिलिस्तीन सॉलिडेरिटी कैंपेन के सदस्य भी हैं और अक्सर गजा में संघर्ष के खिलाफ अभियान चलाते हैं. उन्होंने इराक युद्ध के दौरान 'युद्ध रोको गठबंधन' की अध्यक्षता की. 1983 में, कॉर्बिन ने "नो सोशलिज्म विदाउट गे लिबरेशन" (समलैंगिकों की आजादी के बिना कोई समाजवाद नहीं) की वकालत की और LGBTQ+ अधिकारों के लिए लगातार अभियान चलाया. 

कॉर्बिन के राजनैतिक करियर में कई विभाजनकारी मुद्दे उनके नाम आए. वे पहली बार 1983 में ग्रेटर लंदन क्षेत्र के इस्लिंगटन नॉर्थ से हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए चुने गए थे, लेकिन अगले तीन दशक उन्होंने बैकबेंचर के रूप में बिताए. इसका एक बड़ा कारण यह था कि उनका राजनीतिक रुख शायद ही कभी उनकी पार्टी के नेतृत्व के साथ मेल खाता था.

2015 में लेबर पार्टी की लीडरशिप रेस में उनकी असंभव जीत के बाद, जिसने उन्हें पहली बार फ्रंट बेंच पर पहुंचा दिया, उन्हें सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी के हमलों और उनके विचारों के लिए ब्रिटिश मीडिया के सवालों का भी सामना करना पड़ा था. 2016 में, कॉर्बिन ने लेबर पार्टी में यहूदी विरोधी भावना उकसाने के आरोपों की जांच कर रहे सांसदों से कहा था कि उन्हें हमास और हिजबुल्लाह के सदस्यों को अपना 'दोस्त' कहने का पछतावा है. उन्होंने संसदीय समिति को बताया था कि उन्होंने 2009 में संसद में एक बैठक के दौरान उग्रवादी समूहों के बारे में बताने के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया था.

कॉर्बिन के युद्ध-विरोधी रुख को उनके प्रतिद्वंद्वियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया. उन्होंने लगातार विदेशों में युद्ध अभियानों में यूके के सैन्य बलों के इस्तेमाल के खिलाफ मतदान किया, ना तो अफगानिस्तान में युद्ध का समर्थन किया और ना ही इराक युद्ध में यूके की भागीदारी के लिए हामी भरी.

भारत को लेकर जेरेमी कॉर्बिन के विचारों की बात करें तो उनके ही नेतृत्व में, लेबर पार्टी ने 2019 में एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें 'कश्मीर में अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप और संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में जनमत संग्रह के आह्वान' का समर्थन किया गया था. यह भारत की तरफ से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद आया, जिसने जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा दिया था. कॉर्बिन के इस कदम को पाकिस्तान के रुख के समर्थन और भारत विरोधी नजरिए के रूप में देखा गया.

100 से अधिक भारतीय समूहों ने इसके विरोध में कॉर्बिन को पत्र लिखा और ब्रिटिश-भारतीय मतदाताओं ने लेबर नेतृत्व के खिलाफ कंजर्वेटिव पार्टी को वोट दिया. माना जाता है कि तब लेबर पार्टी की हार में इसका भी योगदान था. इसके बाद लेबर पार्टी के अध्यक्ष इयान लैवरी ने स्वीकार किया कि कश्मीर प्रस्ताव ने भारत और ब्रिटिश भारतीयों को नाराज़ किया था.

द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, अपने पत्र में लैवरी ने वादा किया कि "लेबर पार्टी कश्मीर पर भारत समर्थक या पाकिस्तान समर्थक रुख नहीं अपनाएगी." इसी चुनावी हार की वजह से ही कोर्बिन को लेबर पार्टी के नेता के पद से इस्तीफा देना पड़ा.

अब कॉर्बिन के निर्दलीय चुनाव जीतने के बाद लोग कह रहे हैं कि 'उग्र कॉर्बिन' अभी भी ब्रिटिश संसद में मौजूद है. फ्रांस के चुनाव में वामपंथी पार्टियों के प्रदर्शन के बाद दक्षिणपंथ को धूल चटाने वालों में जेरेमी कॉर्बिन को भी सोशल मीडिया के वाम पक्ष ने नायकों में शुमार कर दिया है.

Advertisement
Advertisement