मार्च की 31 तारीख यानी भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ लगाए जाने से 2 दिन पहले अमेरिका में राष्ट्रपति के आधिकारिक निवास ‘व्हाइट हाउस’ के बाहर भारी संख्या में पत्रकार जुटे थे. इन्हें ट्रंप सरकार की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट संबोधित कर रही थीं.
पत्रकारों से इसी बातचीत में कैरोलिन लेविट ने कहा, "भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों पर 100 फीसदी टैक्स वसूलता है. इतना ज्यादा टैक्स लेने की वजह से भारतीय बाजार में अमेरिकी सामान महंगे हो जाते हैं. इससे अमेरिका के सामानों का निर्यात लगभग असंभव हो जाता है.”
इसके आगे कैरौलिन का यह भी कहना था, “सिर्फ भारत नहीं बल्कि जापान, कनाडा और यूरोपीय संघ भी अमेरिकी निर्यात पर इसी तरह के टैक्स वसूलते हैं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार दूसरे देशों द्वारा लगाए गए ज्यादा टैरिफ की आलोचना की है. उन्होंने पारस्परिक टैरिफ (रेसिप्रोकल टैरिफ) लगाने के लिए 2 अप्रैल की तारीख तय की है, जिसके बारे में उनका कहना है कि यह अमेरिका के लिए 'मुक्ति दिवस' होगा.”
आज 2 अप्रैल है और आज से ही आधिकारिक रूप से अमेरिका के टैरिफ भारत पर लागू हो जाएंगे. अमेरिका किस सामान पर कितना टैरिफ लगाएगा, इसका ऐलान होना बाकी है. लेकिन, भारत पर अमेरिका के इस फैसले का क्या और कितना असर होने वाला है, भारत सरकार ने इसके लिए क्या तैयारी की है?
ट्रंप ने जिस पारस्परिक टैरिफ की धमकी दी है, वो क्या है?
13 फरवरी 2025 को ट्रंप ने एक नोटिफिकेशन जारी कर अमेरिकी वाणिज्य सचिव को निर्देश दिया था कि वे पारस्परिक टैरिफ की समीक्षा करें और इसी साल 2 अप्रैल तक इसे लागू करने की तैयारी करें.
रेसिप्रोकल टैरिफ वे टैक्स हैं, जिन्हें अमेरिका उसके साथ व्यापार करने वाले दूसरे देशों के सामानों पर लगाने की योजना बना रहा है. अमेरिका का कहना है कि ये टैक्स विदेशी मुल्क द्वारा अमेरिकी वस्तुओं पर लगाए गए मौजूदा टैरिफ के बराबर होंगे.
मतलब ये हुआ कि अगर अमेरिका के अनाज पर भारत 100 फीसदी टैक्स लेता है तो अमेरिकी बाजार में बिकने वाले भारतीय अनाज पर भी अमेरिका इतना ही टैक्स ले सकता है. लेकिन, किसी देश में किसी चीज की मांग कम और कहीं ज्यादा होती है. ऐसे में रेसिप्रोकल टैरिफ लगाते वक्त अलग-अलग देशों पर अलग-अलग टैक्स लगाया जाता है.
भारत के किन सामानों पर अमेरिका कितना टैरिफ लगा सकता है?
2 अप्रैल से दो दिन पहले 31 मार्च को व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने टैरिफ के मुद्दे पर बात की. लेविट ने इस बारे में कुछ नहीं बताया कि अमेरिका भारत के किन सामानों पर और कितना टैरिफ लगाएगा. प्रेस सचिव लेविट ने ये भी बताने से इनकार कर दिया कि अमेरिका सबसे ज्यादा टैरिफ किन देशों के सामानों पर लगाने वाला है.
दुनियाभर के व्यापार पर रिसर्च करने वाली संस्था 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' यानी GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, अमेरिका दो तरह से भारत पर टैरिफ लगा सकता है-
पहला- कुछ भारतीय सामानों को सेलेक्ट कर उन पर अलग-अलग टैक्स लगाए. दूसरा- सभी भारतीय सामानों पर एक ही टैरिफ यानी औसत टैरिफ लगाए.
इस वक्त भारत में बिकने वाले सभी अमेरिकी सामान पर केंद्र सरकार 7.7 फीसद औसत टैरिफ वसूलती है, जबकि अमेरिका अपने यहां बिकने वाले सभी भारतीय सामानों पर औसतन 2.8 फीसद टैरिफ लेता है. ऐसे में अगर अमेरिका, भारत के सभी सामानों पर एक ही टैरिफ लगाए तो ये इसमें करीब 4.9 फीसद की वृद्धि हो सकती है. इससे दोनों देश एक-दूसरे के सभी सामानों पर औसतन 7.7 फीसद टैक्स वसूलने लगेंगे.
अगर अमेरिका अलग-अलग टैरिफ लगाने का फैसला करता है तो भारत के कृषि उत्पादों पर 32.4 फीसद ज्यादा टैरिफ लगाया जा सकता है. इसकी वजह यह है कि भारत में बिकने वाले अमेरिकी कृषि उत्पाद पर औसतन 37.7 फीसद टैक्स लिया जाता है. वहीं, अमेरिका अपने यहां बिकने वाले भारतीय कृषि उत्पादों पर औसतन 5.3 फीसद टैक्स लेता है. यानी अमेरिका कृषि उत्पादों पर फिलहाल भारत से औसतन 32.4 फीसद कम टैक्स लेता है. इस तरह वो बराबर टैक्स लगाने के लिए कृषि उत्पादों पर 32.4 फीसद टैक्स बढ़ा सकता है.
इसी तरह भारत से अमेरिका निर्यात होने वाली दवाओं यानी फार्मास्यूटिकल्स पर 8.6 फीसदी, प्लास्टिक पर 5.6 फीसदी, कपड़े पर 1.4 फीसदी, हीरा-सोना और आभूषणों पर 13.3 फीसदी, लोहा व इस्पात पर 2.5 फीसदी, मशीनरी और कंप्यूटर पर 5.3 फीसदी, इलेक्ट्रॉनिक्स पर 7.2 फीसदी और ऑटोमोबाइल 23.1 फीसदी टैरिफ लगाने की संभावना है.
अमेरिकी टैरिफ से भारत का सालाना घाटा कितना हो सकता है?
अमेरिकी टैरिफ से भारत का सालाना घाटा कितना होगा, इसको लेकर अलग-अलग एक्सपर्ट्स की अलग-अलग राय है.
‘सिटी रिसर्च': मार्केट एनालिसिस करने वील इस संस्था के मुताबिक, अमेरिका के इस फैसले से भारत के वो बिजनेसमैन जो अपने सामानों को अमेरिका भेजते हैं, उनके लिए अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो सकती है. अमेरिकी टैरिफ से भारत को सालाना करीब 7 बिलियन डॉलर यानी 60 हजार करोड़ रुपए नुकसान हो सकता है. मेटल, केमिकल और ज्वैलरी सेक्टर में सबसे ज्यादा जोखिम नजर आ रहा है. इसके बाद फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल और फूड इंडस्ट्री पर भी ट्रंप के फैसले का असर पड़ सकता है.
भारतीय स्टेट बैंक: इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर और एडिटर राज चेंगप्पा अपने एक आर्टिकल में लिखते हैं कि अगर अमेरिका भारत पर सीधे 20 फीसदी टैरिफ बढ़ाता है तो इससे GDP के 50 बीपीएस (आधार अंकों) का नुकसान होगा. यह करीब 19.4 अरब डॉलर यानी 1.68 लाख करोड़ रुपए होगा. इसमें गुड्स और सर्विस दोनों ही सेक्टर के ट्रेड शामिल हैं.
एमके रिसर्च: बाजार और कमोडिटी से जुड़ी संस्था एमके ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि अगर अमेरिका में बिकने वाले भारतीय सामानों पर ट्रंप सरकार औसतन 10 फीसदी टैरिफ लगाती है, तो भारत को अमेरिकी निर्यात पर सालाना लगभग 6 बिलियन डॉलर यानी 51.33 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है. अगर अमेरिका भारतीय सामानों पर औसतन टैरिफ 25 फीसदी लगाता है, तो इससे सालाना भारत को अमेरिकी निर्यात से करीब 31 बिलियन डॉलर यानी 2.65 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है.
हालांकि, यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका भारत पर कितना टैरिफ लगाता है. भारत सरकार कोशिश कर रही है कि अमेरिका भारतीय सामानों पर कम से कम टैरिफ लगाए, ताकी इसका हमारे बाजार पर कम से कम असर देखने को मिले.
भारत अमेरिकी टैरिफ के असर से बचने के लिए क्या-क्या तैयारी कर रहा है?
भारत अमेरिकी टैरिफ की वजह से होने वाले नुकसान से बचने के लिए दो मोर्चे पर तैयारी कर रहा है. एक तरफ भारत अमेरिका से बातचीत उसे कम से कम टैरिफ लगाने के लिए मना रहा है. वहीं, दूसरी तरफ भारतीय बाजार अमेरिकी टैरिफ के बाद होने वाले असर को भी कैलकुलेट कर रहा है.
टैरिफ लगाने की घोषणा के तुरंत भारत भारत सरकार की ओर से वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल अमेरिका पहुंचे. उन्होंने टैरिफ को लेकर अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड ल्यूटनिक और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर से मुलाकात की. इसके बाद टैरिफ लगाने से पहले एक अमेरिकी टीम बातचीत के लिए भारत भी आई.
चीन, कनाडा और यूरोपीय संघ ने अमेरिका के टैरिफ का जवाब टैरिफ लगाकर दिया है. वहीं, भारत ने इससे अलग अमेरिका से बातचीत की नीति अपनाकर टैरिफ कम कराने की कोशिश की है.
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ब्रेंडन लिंच के साथ नई दिल्ली में भारत सरकार के अधिकारियों की 5 दिन तक बैठक चली. इसके बाद भारत ने बर्बन व्हिस्की और बादाम, अखरोट, क्रैनबेरी, पिस्ता और दाल जैसे कृषि उत्पादों पर शुल्क में कटौती करने पर सहमति व्यक्त की.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ट्रंप प्रशासन को खुश करने की कोशिश कर रहा है और 23 बिलियन डॉलर यानी 1.96 लाख करोड़ रुपए मूल्य के आधे से अधिक अमेरिकी आयातों पर टैरिफ में कटौती करने के लिए तैयार है. इतना ही नहीं भारत ने ऑनलाइन विज्ञापनों पर 6 फीसदी ‘गूगल टैक्स’ भी हटा दिया है. यह अमेरिका को मनाने के लिए भारत के द्वारा लिया गया, काफी बड़ा और अहम फैसला है.
वहीं, दवा पर टैरिफ लगाने की बात पर फार्मास्यूटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के पूर्व महानिदेशक रवि उदय भास्कर ने कहा है, “भारत को टैरिफ की धमकियों के आगे नहीं झुकना चाहिए और इसके बजाय घरेलू उत्पादन को मजबूत करने, वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने और सस्ती दवा निर्यात में दुनिया में खुद को आगे रखने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.”
रवि उदय भास्कर का मानना है कि पारस्परिक शुल्क लगाए जाने के बाद भी अमेरिका को भारतीय दवाइयों के निर्यात पर कोई असर नहीं पड़ेगा. यह देखते हुए कि अमेरिका में 90 फीसद डॉक्टर जेनेरिक दवा इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं. ऐसे में अमेरिका के टैरिफ का बोझ भारतीय निर्यातकों की तुलना में अमेरिकी मरीजों पर अधिक पड़ सकता है.