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कश्मीर पर भी मंडराने लगा जलवायु परिवर्तन का साया, जानिए घाटी में क्या बदल सकता है?

पिछले कुछ सालों में पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में सर्दियों में बदलाव आ रहा है. भारतीय मौसम विभाग के अनुसार इस जनवरी-फरवरी में बर्फबारी और बारिश 75 प्रतिशत तक घट गई

कश्मीर के सोपोर में 5 फरवरी की इस तस्वीर में झेलम की धार काफी सिकुड़ी दिख रही
कश्मीर के सोपोर में 5 फरवरी की इस तस्वीर में झेलम की धार काफी सिकुड़ी दिख रही
अपडेटेड 19 मार्च , 2025

कश्मीर के लोग इसे चमत्कार मानते हैं—हर साल फरवरी में वासक नाग धारा कुलगाम के कुंड गांव में उस समय प्रकट होती है जब सूफी संत सैयद नूर शाह वली बगदादी का उर्स भरता है. हर साल अप्रैल से बहने वाली यह धारा सितंबर में गायब हो जाती है—इसके प्रकट होने को अच्छे वर्ष के शुभ शकुन के रूप में माना जाता है. इस फरवरी में वासक नाग स्रोत जो 13 गांवों की पेयजल और सिंचाई की जरूरतों को पूरा करता है, दिखाई नहीं दिया तो जल संकट का अंदेशा गहरा गया.

इस तरह के अंदेशों से मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी चिंतित हैं. उन्होंने कहा, "आने वाली गर्मियों के लिए हमें खुद को तैयार करने की जरूरत है. हमें पानी के इस्तेमाल में बदलाव लाने की जरूरत है." हालांकि चिंतित स्थानीय लोगों ने बारिश के लिए पूरे कश्मीर में खुले आसमान के नीचे खास इबादत की. आखिरकार, फरवरी के अंत में जम्मू-कश्मीर की ऊपरी चोटियों पर बर्फबारी और मैदानी इलाकों में बारिश हुई.

झेलम नदी की सहायक नदियों समेत झरने और जलधाराएं सूख रही थीं. पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में सर्दियों में बदलाव आ रहा है. भारतीय मौसम विभाग के अनुसार इस जनवरी-फरवरी में बर्फबारी और बारिश 75 प्रतिशत तक घट गई.

जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था कृषि और बागवानी पर निर्भर है. आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार केंद्र शासित प्रदेश की 42,241 वर्ग किलोमीटर जमीन में से 53 प्रतिशत पर कृषि भूमि और बागान हैं. 2023-24 में इस क्षेत्र ने केंद्र शासित प्रदेश के 2.41 लाख करोड़ रुपए के कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में 14.85 प्रतिशत का योगदान दिया. सेब और धान जैसी अहम फसलों के लिए यह क्षेत्र नहरी सिंचाई पर बहुत ज्यादा निर्भर है.

जम्मू-कश्मीर जल संसाधन विनियामक प्राधिकरण के अध्यक्ष इफ्तिखार काकरू कहते हैं, "हम आकस्मिक योजना तैयार कर रहे हैं और भूजल दोहन और वर्षा जल संग्रहण सहित कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं. पानी की अधिक खपत वाली धान की खेती पर रोक लगानी पड़ सकती है."

पानी की कमी ने पनबिजली उत्पादन पर भी असर डाला है. हालात इसलिए भी बदतर बन जाते हैं क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि के तहत जलाशयों के निर्माण पर रोक है और पनबिजली उत्पादन के लिए केवल नदी के बहते पानी के उपयोग की ही इजाजत है.

2008 में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना की शुरुआत के बाद जम्मू-कश्मीर में पहली जलवायु कार्य योजना 2014 में शुरू हुई जिसके लिए 6,000 करोड़ रुपए का परिव्यय रखा गया. लेकिन धन की कमी के कारण कई काम कथित तौर पर पूरे नहीं हो पाए. जलवायु परिवर्तन के लिए नई कार्य योजना शुरू की गई है. बहुत कुछ इस योजना और उमर सरकार के बजट में पर्यावरण के लिए आवंटन पर निर्भर करता है.

कैफियत सूखे की

> फरवरी अंत में बारिश ने आकर बचा लिया वर्ना जम्मू-कश्मीर जल संकट की दहलीज पर खड़ा था; बर्फ और बारिश में 75 फीसदी कम पड़ी; नदियां सूखी थीं.

> जम्मू-कश्मीर की 70 फीसदी आबादी कृषि और बागवानी पर निर्भर है. ऐसे में कम बारिश ने सभी को डरा दिया था.

> मॉनसून में कम बारिश और पश्चिमी गड़बड़ी ग्लोबल क्लाइमेट चेंज का ही नतीजा है.

> कम बारिश के चलते जलस्तर घटने से पनबिजली संयंत्रों से भी बिजली का उत्पादन प्रभावित हुआ. नए ऐक्शन प्लान ने उम्मीद बंधाई है.

- कलीम गीलानी

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