प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 फरवरी को जब भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे तो उनका उत्साह हमेशा के मुकाबले एक अलग ही मुकाम पर था. आखिरकार 27 साल बाद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भाजपा की सत्ता में वापसी हुई थी. पार्टी ने 70 सदस्यीय विधानसभा में 48 सीटें जीतीं और 45.6 फीसद वोट हासिल किए. अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली आम आदमी पार्टी (आप) को करारी हार का सामना करना पड़ा.
यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री खुद भी भाजपा उम्मीदवार प्रवेश वर्मा से हार गए. पार्टी का कहना है कि वह एक नई तरह की चुनावी रणनीति का खाका तैयार करने में जुटी है, जिसने हरियाणा, महाराष्ट्र और अब दिल्ली में सफलता दिलाई. अब भाजपा बिहार के साथ कुछ और विधानसभा चुनावों में दिल्ली अभियान की रणनीति को ही आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी. इस रणनीति के मुख्य पहलू:
> ब्रांड मोदी का रणनीतिक इस्तेमाल: प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषणों में दिल्ली सरकार और आप नेतृत्व की तीखी आलोचना की, जिसमें उन्होंने 'आप-दा' और शीशमहल जैसे शब्दों का तो इस्तेमाल किया लेकिन केजरीवाल का नाम लेने से परहेज किया. उन्होंने विभाजनकारी एजेंडे से भी दूरी बनाए रखी और इसे स्थानीय नेताओं पर छोड़ दिया.
> नैरेटिव साधा: पार्टी ने 'ग्रिड सिस्टम' जैसा तरीका अपनाया, सारा संवाद स्थानीय मुद्दों और वादों पर अमल न होने पर केंद्रित रखा और मुफ्त रेवड़ियों या केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमलों में घसीटने की आप की कोशिशों में नहीं फंसी.
> केजरीवाल को घेरा: यह महसूस करते हुए कि केजरीवाल के खिलाफ सत्ता विरोधी भावना प्रबल है, भाजपा ने अपने सबसे दमदार उम्मीदवार और दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा को उनके खिलाफ मैदान में उतारा. आक्रामक हमला जारी रखते हुए दिखाया गया कि कैसे 2012 के एक्टिविस्ट और बदलाव के अगुआ रहे केजरीवाल अब अपनी नीतियों से भटक चुके हैं.
> आरएसएस फैक्टर: आरएसएस ने अपने उत्तर भारत प्रभारी जतिन कुमार को अगस्त 2024 में राष्ट्रीय राजधानी में भाजपा की जमीन मजबूत करने का जिम्मा सौंपा. आरएसएस से जुड़े प्रमुख संगठनों ने 70 सीटों पर लगभग 61,000 बैठकें कीं.
> नरम हिंदुत्व: दिल्ली के लिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने 'बंटेंगे तो कटेंगे' वाले नैरेटिव से काफी हद तक दूरी बनाए रखी. हालांकि, योगी आदित्यनाथ ने अपनी रैली के दौरान इस मुद्दे को उठाया. यह पार्टी के लिए मुसलमानों के बीच ध्रुवीकरण कम करने में मददगार रहा. भाजपा ने उन सीटों पर कुछ बढ़त भी हासिल की जहां मुसलमान निर्णायक फैक्टर (30 फीसद से ज्यादा) थे. ऐसी 10 सीटों में से तीन मुस्तफाबाद, रिठाला और शाहदरा में भाजपा ने जीत हासिल की.
> डेटा आइक्यू: भाजपा ने अभियान की शुरुआत इस डेटा पर अच्छी तरह गौर करने के साथ की कि पिछले हर लोकसभा चुनाव (2014, 2019 और 2024) में रहता आया उसका 50 फीसद वोट शेयर हर विधानसभा चुनाव के साथ घट रहा था. पिछले वर्ष आम चुनाव में दिल्ली के मध्य वर्ग के 50 फीसद लोगों ने भाजपा का समर्थन किया जबकि 32 फीसद ने आप को वोट दिया.
भाजपा थिंक टैंक ने 16 फीसद 'फ्लोटिंग वोट' की पहचान की और कुल 13,900 बूथों में से 3,900 पर ध्यान केंद्रित किया. बूथ कार्यकर्ताओं को लगभग 3,00,000 लोगों की पहचान करने के लिए तैनात किया गया, जिन्हें 'फ्लोटिंग वोट' माना गया था. उन्हें साधने पर ध्यान दिया गया. पार्टी के एक रणनीतिकार कहते हैं, "इनमें से तमाम मतदाताओं ने भाजपा को वोट देने का मन नहीं बनाया था लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे अपील की. हमारा अनुमान है कि उनमें से आधे बाहर निकले और हमारे पक्ष में मतदान किया."