फरवरी की 13 तारीख की शाम को मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगा और चार दिन पहले मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने वाले एन. बीरेन सिंह ने करीब-करीब इसी समय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक लंबी पोस्ट लिखी. अपने 'मूल निवासी' दोस्तों को संबोधित इस पोस्ट में उन्होंने अपनी 2022 की उस पोस्ट का हवाला दिया था जिसमें एक म्यांमारी नागरिक को फर्जी आधार कार्ड के साथ गिरफ्तार किया गया था. इसके साथ उन्होंने मणिपुर से अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और उन्हें राज्य से वापस भेजने के प्रयासों में तेजी लाने की गुहार लगाई. अवैध आव्रजन को उन्होंने एक संकट बताते हुए कहा कि कैसे वे इन अवैध प्रवासियों के पीछे पड़े रहे जब तक कि 3 मई 2023 को हिंसा भड़क गई. बीरेन सिंह ने चेतावनी दी कि मणिपुर की म्यांमार के साथ लगती 398 किमी की सीमा और फ्री मूवमेंट रिजीम (एफएमआर)—म्यांमार के साथ सीमा के आरपार निश्चित दूरी तक बिना वीजा आवाजाही—राज्य की जनसांख्यिकी को तेजी से बदल रहा है.
इसे स्थानीय आबादी के लिए अस्तित्व का खतरा बताते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कसम खाई कि इसके खिलाफ 'वे जो भी कर सकते हैं, उस तरीके से' अपनी लड़ाई जारी रखेंगे. बीरेन सिंह की यह पोस्ट उस वजह का इशारा देती है कि क्यों भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार नेतृत्व बदलने में 21 महीने तक हिचकिचाहट दिखा रही थी. जबकि इस राज्य में जातीय हिंसा ने 250 से ज्यादा जिंदगियां लील लीं, 60,000 से ज्यादा लोगों को विस्थापित कर दिया और जातीय आधार पर मणिपुर के भूगोल की नई लकीरें खींच दीं. इस संकट के केंद्र में मैतेई समुदाय का यह डर है कि म्यांमार से कथित अवैध तरीके से आने वाले कुकी-जो-हमार लोगों की वजह से जनसांख्यिकीय बदलाव आ जाएंगे. हालांकि इनकी संख्या पर दावे विवादित हैं लेकिन इस मामले को जोरशोर से बीरेन सिंह की सरकार ने उठाया था और लोगों को लामबंद किया था. कुकी आबादी के लिए इसका सीमा सुरक्षा से कम जबकि एक मैतेई दबदबे वाले राज्य में उनके जातीय उत्पीड़न से ज्यादा लेनादेना था.
कथित ड्रग्स कारोबार और जंगलों के अतिक्रमण के खिलाफ बीरेन सिंह की आक्रामक कार्रवाई को व्यापक रूप से कुकी दबदबे वाले क्षेत्रों को निशाना बनाने के तौर पर देखा गया, जिसने जातीय विभाजन की खाई को और चौड़ा ही किया. हालांकि इस आरोप से बीरेन सिंह इनकार करते हैं लेकिन इस रवैए ने उन्हें कुकी लोगों के लिए दुश्मन-सा बना दिया. दूसरी तरफ मैतेई मतदाताओं के बीच उनका असर और बढ़ा जो 60 सदस्यों वाली विधानसभा में घाटी की 40 सीटों पर दबदबा रखते हैं.
भाजपा की दुविधा साफ जाहिर थी: बीरेन सिंह को हटाने का मतलब मैतेई लोगों को दूर करना जो राज्य की आधी से ज्यादा आबादी हैं. उन्हें पद पर रखना यानी कुकी समुदाय को और अलग-थलग करना. इनमें खुद भाजपा के कुकी विधायक शामिल हैं जो हिंसा के लिए बीरेन सिंह को जिम्मेदार मानते थे.
हालांकि बीरेन सिंह की विदाई अपने कामों की नैतिक जिम्मेदारी लेने की वजह से नहीं हुई. भाजपा उस वक्त जाकर यह कदम उठाने को मजबूर हुई जब पार्टी का आंतरिक असंतोष चरम पर पहुंच गया, खासकर जब विधानसभा अध्यक्ष थोकचोम सत्यब्रत सिंह, भाजपा के एक अंदरूनी सूत्र के शब्दों में, "अप्रत्याशित बर्ताव करने" लगे. बीरेन का विरोध कर रहे पार्टी विधायकों ने मौका ताड़कर कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने की धमकी दे डाली. जब बीरेन को एहसास हो गया कि 60 सदस्यों के सदन में उनके पास एनडीए के 52 में से महज करीब 20 विधायकों का समर्थन रह गया है, तब आलाकमान ने उनकी विदाई का इंतजाम किया.
केंद्रीय नेतृत्व के सिर पर एक और चिंता सवार थी-यह पक्का करना कि 10 फरवरी से शुरू होने वाला मणिपुर विधानसभा का सत्र कहीं राजनैतिक अपमान का मंच न बन जाए. इस खतरे को बेअसर करने के लिए पीएम मोदी के विश्वासपात्र करीबी माने जाने वाले राज्यपाल अजय कुमार भल्ला ने सत्र रद्द कर दिया. इससे विपक्ष की फौरी चुनौती ढंग से टल गई और भाजपा का नियंत्रण बना रहा, भले ही वह फिलहाल नेता विहीन हो गई हो.
लीक होकर सामने आए एक ऑडियो टेप की फॉरेंसिक जांच भी बीरेन की विदाई का सबब बनी, जिसका आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था. इस टेप में उन्हें कथित तौर पर हिंसा भड़काने की बात कुबूल करते सुना गया. 3 फरवरी को जब यह खुलासा हुआ कि उस रिकॉर्डिंग में दर्ज आवाज बीरेन की आवाज से 93 फीसद मेल खाती है तो पार्टी में हड़कंप मच गया. पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के भीतर चिंता बढ़ गई क्योंकि इसके संभावित कानूनी नतीजों की वजह से उनका मुख्यमंत्री के पद पर बने रहना अब और मुमकिन नहीं रह गया था. बीरेन का इस्तीफा उस कानूनी और राजनैतिक संकट को पहले ही रोक देने का रणनीतिक कदम मालूम देता है जो पार्टी को और ज्यादा शर्मिंदगी में डाल सकता था. 60 सदस्यों की विधानसभा में स्पष्ट बहुमत होते हुए भी भाजपा किसी दूसरे नाम पर आम सहमति बनाने की जद्दोजहद कर रही थी ऐसे में राष्ट्रपति शासन अपरिहार्य हो गया.
अलबत्ता राष्ट्रपति शासन की अपनी जटिलताएं होंगी. इसका मतलब होगा केंद्र सरकार नियंत्रण सीधे अपने हाथ में ले लेगी. इस कदम से मैतेई और कुकी-जो दोनों धड़ों को अलग-थलग करने का जोखिम जुड़ा है. जातीय विभाजन मणिपुर को दो अलग क्षेत्रों में बांटता है—मैतेई नियंत्रित इंफाल घाटी और कुकी दबदबे वाले पहाड़ी जिले. वह अलगाव वैसा ही बना हुआ है. कुकी-जो समुदाय यह दलील देते हुए कि जातीय विभाजन पाटा नहीं जा सकता, अलग प्रशासन की मांग जारी रखे हुए हैं. इसके उलट बीरेन को अपना तारणहार मानने वाले मैतेई कट्टरपंथी उनके हटाए जाने को अपने राजनैतिक प्रभाव के कमजोर पड़ने के रूप में देख सकते हैं.
मणिपुर में कानून और प्रशासन की निगरानी सीधे केंद्र कर रहा था. ऐसे में बीरेन सिंह एक आसान बलि का बकरा थे. राज्य में हथियारबंद धड़े और यहां तक कि नागरिक-मैतेई और कुकी दोनों-राज्य के आधिकारिक सुरक्षा तंत्र से बेपरवाह अपनी-अपनी ताकत भांजते रहते हैं. कइयों के पास अब सरकार के शस्त्रागार से लूटे गए हथियार हैं. निर्णायक कार्रवाई के बिना कोई भी राजनैतिक समाधान दिखावटी ही होगा. बड़े पैमाने पर समुदायों के विस्थापन से और गहरा अविश्वास पैदा हुआ है. राज्य की अर्थव्यवस्था गोते लगा रही है और रोजमर्रा की जिंदगी अस्त-व्यस्त है. फिर से भरोसा पैदा करने के लिए कुछ जमीनी काम करने होंगे, आर्थिक पुनर्वास पैकेज से लेकर प्रशासन में दोनों समुदायों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने तक काम करना होगा.
इस संकट के राजनीतिक नतीजे कहीं दूरगामी होंगे. भाजपा की विश्वसनीयता यहां गहरे संकट में है. निकट भविष्य में कोई राजनीतिक समाधान नहीं दिखता, यानी राज्य को लंबे समय तक केंद्र के शासन में रहना होगा. अब यह भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की राजनीतिक चतुरई पर निर्भर करेगा कि पार्टी अपनी हालत सुधार सकती है और दोबारा सरकार बना सकती है या फिर चुनाव अपरिहार्य हैं. फिलहाल मणिपुर अधर में झूलता राज्य है, जो राजनैतिक शतरंज की बिसात के लंबे और निर्मम खेल की अगली चाल का इंतजार कर रहा है.
मुश्किलें मणिपुर की
> विधानसभा सत्र बुलाने में विलंब को लेकर राज्यपाल के अधिकार पर कानूनी अस्पष्टता ने शायद केंद्र को राष्ट्रपति शासन लगाने पर मजबूर किया.
> इस खबर से पार्टी सकते में आ गई कि उस ऑडियो टेप से बीरेन सिंह की आवाज 93 फीसद मिलती है जिसमें उन्हें हिंसा भड़काने की बात कुबूल करते सुना गया.
> बीरेन का इस्तीफा उस कानूनी और राजनैतिक संकट को पहले ही रोक देने का रणनीतिक कदम दिखता है जो पार्टी को शर्मिंदगी में डाल सकता था.
> राष्ट्रपति शासन के दौरान 21 महीनों में मिले जख्म शायद और बदतर ही होंगे. जातीय विभाजन पहले की तरह गंभीर बना हुआ है.