कश्मीर के बडगाम में गणतंत्र दिवस पर जिला विकास परिषद (डीडीसी) के अध्यक्ष नजीर अहमद खान के तिरंगा फहराने के दौरान एक नामौजूदगी साफ नजर आई. जिले के चारों विधायक उस समारोह से नदारद रहे. उसे लेकर खान ने नाराजगी जताई और स्थानीय लोगों से अपने प्रतिनिधियों से सवाल करने का आग्रह किया. चारों विधायक सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के सदस्य हैं. पहले पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ रहे, मगर अब निर्दलीय खान ने कहा, "न्यौते के बावजूद उन्हें कोई परवाह नहीं थी." एनसी में भी तनाव बढ़ रहा है. बांदीपोरा में पार्टी के डीडीसी अध्यक्ष अब्दुल गनी भट को असहज हाल में छोड़ दिया गया क्योंकि एनसी के दोनों विधायक समारोह में शामिल नहीं हुए.
श्रीनगर, बारामूला और अनंतनाग में स्थिति अलग थी. वहां एनसी मंत्रियों ने समारोहों की अध्यक्षता की और सभी विधायक मौजूद रहे. ऐसे में पारंपरिक रूप से ताकतवर विधायकों और नवगठित डीडीसी सदस्यों के बीच अलगाव उजागर हो गया. इसके बीज 2018 में गवर्नर शासन के लागू होने और 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के साथ बोए गए, जिसके तहत पुराने राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटा गया. फिर अक्तूबर 2020 में जम्मू-कश्मीर पंचायत राज अधिनियम, 1989 में संशोधन किया गया. उसमें 2018 से निर्वाचित विधानसभा की गैरमौजूदगी के बीच जिला स्तर पर विकास कार्यों की निगरानी के लिए डीडीसी का गठन हुआ. दिसंबर 2020 में पहले डीडीसी चुनावों के जरिए 20 जिलों में से हरेक में 14 सीटें भरी गईं, और इस तरह ये पंचायती राज संस्थाएं (पीआरआई) प्रमुख सियासी और वित्तीय केंद्र बन गईं. मगर अक्टूबर 2024 में उमर अब्दुल्ला सरकार बनने के साथ नई जंग शुरू हो गई.
निर्वाचित 90 विधायक खुद को दरकिनार महसूस कर रहे हैं. दरअसल, 2019 के अधिनियम के जरिए निर्वाचन क्षेत्र विकास फंड (सीडीएफ) को खत्म कर दिया गया. उससे विधायकों के पास स्थानीय परियोजनाओं के लिए संसाधनों की कमी हो गई. इस दौरान डीडीसी फले-फूले और उनमें से हरेक के पास 10 करोड़ रुपए का सालाना खजाना है. शोपियां में डीडीसी अध्यक्ष बिलकीस जान कहती हैं, "इससे पहले, हमारे (पीआरआइ के) पास कोई शक्ति या वित्तीय आजादी नहीं थी. अब हम क्षेत्र के विकास में अहम साझेदार हैं." बारामूला की डीडीसी अध्यक्ष सफीना बेग ने विधायकों पर ऐतिहासिक रूप से पीआरआइ के सशक्तीकरण का विरोध करने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह बदलाव 'काफी वक्त से लंबित' था.
कांग्रेस विधायक निजामुद्दीन भट डीडीसी और विधायकों के बीच तुलना को गलत मानते हैं. वे कहते हैं, "विधायक संविधान की देन हैं, जबकि डीडीसी को कानून के जरिए बनाया गया. विधायकों के पास व्यापक भूमिका और जनादेश है." इस बीच विधायकों को उम्मीद है कि उमर सरकार के पहले बजट से सीडीएफ आवंटन फिर शुरू किया जाएगा. वहीं प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम फिर से चालू होने के साथ डीडीसी को और ज्यादा ऊर्जा मिल गई है.
इस दिसंबर में डीडीसी का कार्यकाल खत्म होने वाला है. सूत्रों का कहना है कि मई-जून 2025 में पंचायत और नगरपालिका चुनावों के साथ डीडीसी के नए चुनावों पर भी विचार किया जा रहा है. ऐसे वक्त में जब राज्य के दर्जे की बहाली को लेकर उमर सरकार खुद नई दिल्ली के साथ लड़ाई में उलझी है, जमीनी प्राधिकरणों और पारंपरिक सत्ता केंद्रों के बीच की यह जंग जम्मू-कश्मीर के लोकतांत्रिक विकास के बेहद निर्णायक पल को उजागर करती है.
बढ़ती खाई
> कुछ जिलों में गणतंत्र दिवस समारोह में विधायकों की अनुपस्थिति ने जिला विकास परिषद (डीडीसी) सदस्यों के साथ उनके बढ़ते तनाव को उजागर कर दिया.
> निर्वाचन क्षेत्र विकास फंड के बगैर नवनिर्वाचित विधायक जूझ रहे हैं, वहीं 2020 में गठित डीडीसी को वित्तीय शक्ति हासिल है. ऐसे में सत्ता-संघर्ष तेज हो गया है.
- कलीम गीलानी