दरअसल, केरल का एझावा समुदाय खासा नाराज है. सियासी तौर पर सक्रिय यह ओबीसी समुदाय कुल आबादी का 23 फीसद है, मगर इसके लोग राज्य में खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं और इसको लेकर आक्रोशित हैं. एझावा पारंपरिक रूप से कम्युनिस्ट मतदाता आधार का हिस्सा रहे हैं. लेकिन उनके सामाजिक संगठन श्री नारायण धर्म परिपालन (एसएनडीपी) योगम ने साल 2015 में भारत धर्म जन सेना (बीडीजेएस) नामक राजनैतिक संगठन का गठन किया और राज्य में भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ अपनी सियासी किस्मत को जोड़ लिया. ऐसे में एझावा समुदाय में फूट पड़ गई. बीडीजेएस के गठन और भाजपा के साथ गठजोड़ का समुदाय को अपेक्षित लाभ नहीं मिला और इसके वोट बिखर कर अब राज्य के तीन सियासी मोर्चों—वाम, कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ)—में बंट गए हैं.
इस समुदाय में व्याप्त असंतोष जनवरी के आखिर में अपने चरम पर पहुंच गया जब बीडीजेएस ने "वैकल्पिक राजनैतिक साझेदारियों" की तलाश के लिए एक प्रस्ताव पारित किया. उसके बाद 1 फरवरी को उनके मुखपत्र योगनदम में लंबे वक्त से एसएनडीपी प्रमुख वेल्लापल्ली नतेसन का एक हस्ताक्षरित संपादकीय प्रकाशित हुआ. उसमें केरल का विकास सुनिश्चित करने के लिए मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की तारीफ की गई तथा एझावा के प्रति कांग्रेस और भाजपा के 'निराशाजनक' बर्ताव की आलोचना की गई. हालांकि उसके तुरंत बाद ही उनके बेटे और बीडीजेएस प्रमुख तुषार वेल्लापल्ली ने साफ किया कि पार्टी एनडीए के साथ संबंध नहीं तोड़ रही है. तुषार ने इंडिया टुडे से कहा, "यह सब मीडिया की अटकलें हैं, उन्होंने पार्टी फोरम के भीतर की चर्चा को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया है. हम केरल में एनडीए का अभिन्न हिस्सा हैं."
तो असल में माजरा क्या है? पार्टी विश्लेषकों का कहना है कि बीडीजेएस 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले सबसे फायदेमंद स्थिति हासिल करने की जुगत में है. इसने 2021 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में बहुत खराब प्रदर्शन किया और यह केरल की राजनीति में प्रासंगिक बने रहने का इसका आखिरी मौका हो सकता है.
एझावा नेता और वरिष्ठ वकील सी.के. विद्यासागर कहते हैं, "हम एक-रूप समुदाय नहीं हैं. कोई भी एझावा नेता सम्मान का हकदार नहीं है क्योंकि उनमें से अधिकतर अपने लाभ के लिए काम करते हैं. अगर बीडीजेएस भाजपा के साथ गठजोड़ तोड़ रही है तो यह वेल्लापल्ली परिवार के फायदे के लिए किया जा रहा, न कि समुदाय को बचाने के लिए." उन्होंने यह भी जोड़ा, "समुदाय में चीजें बदल रही हैं, युवा वोट बैंक की सियासत का हिस्सा बनने के लिए तैयार नहीं हैं."
दरअसल, सूत्रों का कहना है कि 2026 के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं ''अंदरखाने सियासी हलचलें'' तेज हो रही हैं. पिनाराई सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर एक बड़ा कारक है, इसलिए इसी समुदाय से आने वाले मुख्यमंत्री को हर तरह की मदद की जरूरत है. ऐसे में बीडीजेएस से किसी भी तरह का समर्थन उनके लिए काफी अहम होगा.