
प्रयागराज में झूंसी की तरफ महाकुंभ नगर के सेक्टर 16 में संगम लोअर मार्ग पर मौजूद किन्नर अखाड़े के शिविर में 24 जनवरी की सुबह सरगर्मियां बढ़ गई थीं. यहां 1990 के दशक में बोल्ड और ग्लैमरस भूमिकाओं के लिए मशहूर बॉलीवुड अभिनेत्री ममता कुलकर्णी नई आध्यात्मिक भूमिका निभाने को पहुंचीं थीं. कुलकर्णी ने संगम तट पर विधि, विधान से पिंडदान किया.
उसके बाद किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, जूना अखाड़े के जगद्गुरु गर्गाचार्य मुचकुंद पीठाधीश्वर स्वामी महेंद्रानंद गिरि महाराज और महामंडलेश्वर स्वामी जय अंबानंद गिरि महाराज ने पट्टाभिषेक कर ममता कुलकर्णी को किन्नर अखाड़े का महामंडलेश्वर नियुक्त किया. उन्हें श्री यमाई ममतानंद गिरि नाम दिया गया.
महामंडलेश्वर बनने के बाद कुलकर्णी ने मौजूद लोगों से कहा, ''मैंने 23 वर्ष पहले अपने गुरु श्री चैतन्य गगन गिरि से कुपोली आश्रम में दीक्षा ली थी. 25 वर्ष तक मैं ध्यान और तप में थी. अब संन्यासिनी के रूप में नए जीवन में प्रवेश कर रही हूं.''
बीस अप्रैल 1972 को मुंबई में जन्मीं ममता कुलकर्णी ने 1992 में फिल्म तिरंगा से अभिनय की शुरुआत की. उन्हें फिल्म आशिक आवारा के लिए 1993 का फिल्मफेयर अवार्ड मिला था. सबसे बड़ा खिलाड़ी, करन अर्जुन, वक्त हमारा है और बाजी जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने प्रसिद्धि बटोरी थी. 2002 में कुलकर्णी ने बॉलीवुड से नाता तोड़ लिया. वर्ष 2016 में वे तब चर्चा में आईं जब पुलिस ने उनका नाम ड्रग्स के अवैध कारोबार में शामिल बताया. वे पिछले लंबे वक्त से विदेश में रह रही थीं और उन्होंने दिसंबर 2024 में सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर भारत लौटने की जानकारी दी थी.
कुलकर्णी के किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर बनने के कुछ घंटे बाद ही विवाद शुरू हो गया. पहली आपत्ति प्रथम किन्नर कथावाचक जगद्गुरु हिमांगी सखी ने उठाई. उनका कहना था, ''किन्नर अखाड़ा तो किन्नर समाज के लिए बना था. अगर आपको किन्नरों के अलावा महिलाओं को महामंडलेश्वर बनाना है तो उसका नाम बदलकर दूसरा रख देना चाहिए. बिना शिक्षा दिए, दीक्षा दे दी...मुंडन नहीं कराया, चोटी काटकर महामंडलेश्वर बना दिया, यह अनुचित है.''
हालांकि जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद गिरि ने ममता कुलकर्णी को किन्नर अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाए जाने का स्वागत किया. अपने फैसले को सही ठहराती हुईं किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर डॉ. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी कहती हैं, ''ममता कुलकर्णी मुझसे 2022 से संपर्क में हैं. वे भक्तिमार्ग पर चल रही थीं. जीवन और कर्म संयमित था, इसलिए किन्नर अखाड़े ने उन्हें पूरी परंपरा का पालन कर महामंडलेश्वर बनाया है.''
कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाए जाने को लेकर संतों के बीच तकरार तब और बढ़ गई जब किन्नर अखाड़े के संस्थापक सदस्य होने का दावा करने वाले ऋषि अजय दास ने 30 जनवरी को आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को पद से हटाने की घोषणा कर दी. दास का दावा है कि उन्होंने 2016 में उज्जैन कुंभ के दौरान किन्नर अखाड़े की स्थापना की थी. कंप्यूटर बाबा के रूप में भी मशहूर दास उस उज्जैन कुंभ में किन्नर अखाड़े के समन्वयक थे और उन्होंने कई नामचीन हस्तियों को आमंत्रित किया था.
उज्जैन के हासमपुरा में एक आश्रम के प्रमुख दास ने सोशल मीडिया पर एक पत्र पोस्ट किया, जिसमें कहा गया कि कुलकर्णी को किन्नर अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाने की वजह से त्रिपाठी के खिलाफ कार्रवाई की गई. उन्होंने यह भी कहा, ''जिस धर्म प्रचार-प्रसार और धार्मिक कर्मकांड के साथ ही किन्नर समाज के उत्थान इत्यादि की आवश्यकता से लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की नियुक्ति की गई थी, ये उस पथ से सर्वथा भटक गए हैं, इन्होंने मेरी बिना सहमति के जूना अखाड़े के साथ एक लिखित अनुबंध 2019 के प्रयागराज कुंभ में किया जो कि अनैतिक ही नहीं अपितु एक प्रकार की 'चार सौ बीसी' है. बिना संस्थापक की सहमति एवं हस्ताक्षर के जूना अखाड़ा एवं किन्नर अखाड़ा के बीच का अनुबंध विधि अनुकूल नहीं है.''
किन्नर अखाड़े को अलग अखाड़े की मान्यता न मिलने और इसके जूना अखाड़े के साथ जाने पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं. अजय दास कहते हैं, ''जूना अखाड़े के साथ मिलकर किन्नर अखाड़े के सभी प्रतीक चिह्नों को क्षत-विक्षत किया गया है. ये न तो जूना अखाड़े के सिद्धांतों के अनुसार चल रहे हैं, न किन्नर अखाड़े के. किन्नर अखाड़े के गठन के साथ ही इसके संन्यासियों को वैजन्ती माला गले में धारण कराई गई थी, जो कि शृंगार की प्रतीक है, पर अब लोगों ने वैजन्ती माला त्याग कर रुद्राक्ष की माला धारण कर ली. यह संन्यास का प्रतीक है. संन्यास बिना मुंडन संस्कार के मान्य नहीं होता. इस प्रकार यह सनातन धर्म और समाज के साथ एक प्रकार का छलावा कर रहे हैं.''
वहीं, लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी पलटवार कर कहती हैं, ''अजय दास को पहले ही संगठन से बाहर कर दिया गया था. दास अपने परिवार और बच्चों के साथ रहते हैं. ऐसी जीवनशैली किन्नर अखाड़े के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है, इसलिए अब उनके आदेश के कोई मायने नहीं हैं.'' त्रिपाठी ने दास के पत्र को 'कचरे का एक टुकड़ा' करार दिया. महाकुंभ के दौरान ममता कुलकर्णी विवाद ने किन्नर अखाड़े के भीतर बंटवारे की नींव तैयार कर दी है. दास ने घोषणा की है कि महाकुंभ के बाद किन्नर अखाड़े में नए आचार्य महामंडलेश्वर का चुनाव किया जाएगा. अब किन्नर अखाड़े में किन्नर के अलावा किसी अन्य को जगह नहीं दी जाएगी.
यह पहला मौका नहीं है जब अखाड़ों में महामंडलेश्वर के पद को लेकर विवाद हुआ हो. महामंडलेश्वर गरिमा का पद होता है. कुंभ या महाकुंभ में छत्र-चंवर से सज्जित चांदी के सिंहासन पर आसीन महामंडलेश्वर की सवारी निकलती है तो हर कोई आकर्षित हो जाता है. महामंडलेश्वर बनाए जाने के बाद अखाड़े में उनकी वरिष्ठता तय हो जाती है. वे अखाड़ों के कामकाज में भी हस्तक्षेप कर सकते हैं.
अखाड़ों में संन्यासियों के इसी वैभव ने महामंडलेश्वर के पद की महत्ता को बढ़ाया है तो अयोग्य लोगों ने विवादों को भी जन्म दिया है. प्रयाग में पिछले कुंभ के दौरान निरंजनी अखाड़े ने गाजियाबाद के शराब कारोबारी रहे सचिन दत्ता को सच्चिदानंद बनाकर महामंडलेश्वर की पदवी दी थी. इस निर्णय पर संतों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी.
चौतरफा विरोध होने पर सच्चिदानंद को महामंडलेश्वर पद से इस्तीफा देना पड़ा था. जूना अखाड़ा भी अक्सर विवादों में रहने वाली मुंबई की चर्चित धर्मगुरु राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर को महामंडलेश्वर बनाने पर विवादों में घिरा था. इस पर जूना अखाड़े ने न केवल राधे मां की महामंडलेश्वर की पदवी वापस ले ली थी बल्कि उन्हें अखाड़े से बाहर कर दिया था.
वर्ष 2018 में प्रयागराज में कुंभ से पहले भक्तों की गोद में बैठकर अश्लील डांस करने के मामले में राधे मां ने लिखित माफी मांगी और भविष्य में दोबारा इस तरह की हरकत न करने की बात कही थी. इसी आधार पर जूना अखाड़े में उनका दोबारा प्रवेश हुआ था. महानिर्वाणी अखाड़े ने भी प्रयाग में 2013 के कुंभ के दौरान अश्लील सीडी को लेकर विवादों में आए संत नित्यानंद को महामंडलेश्वर बनाया था. उस वक्त नित्यानंद कुंभ स्नान के लिए प्रयाग आए लेकिन संतों के विरोध के चलते एक स्नान के बाद वापस लौट गए थे.
इस बार भी प्रयागराज के महाकुंभ में सभी 13 अखाड़ों में महामंडलेश्वर की पदवी पाने के लिए 100 से ज्यादा लोगों ने अर्जी लगाई थी जबकि 2019 के कुंभ में यह आंकड़ा 100 से काफी नीचे था. सबसे ज्यादा मांग जूना अखाड़े और निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर पद की है. अखाड़ों की अपनी त्रिस्तरीय जांच में दो-तिहाई से ज्यादा महामंडलेश्वर की पदवी के योग्य नहीं पाए गए.
जूना अखाड़े से जुड़े एक पदाधिकारी बताते हैं, ''महामंडलेश्वर पद के लिए अयोग्य घोषित हुए उम्मीदवारों ने अपने संन्यास और शैक्षिक योग्यता से जुड़ी भ्रामक जानकारियां दी हैं. इसके अलावा कइयों पर तो आपराधिक मामला भी दर्ज है.''
इस बार महाकुंभ में 20 से ज्यादा संतों को महामंडलेश्वर की पदवी प्रदान की जा चुकी है. अखाड़ों में महामंडलेश्वर की बढ़ती संख्या ने आपसी विवाद को भी जन्म दिया है जिनसे निबटना अब एक और बड़ी चुनौती है.
आसान नहीं महामंडलेश्वर बनना
> कोई व्यक्ति जब किसी अखाड़े से महामंडलेश्वर की उपाधि के लिए संपर्क करता है तो उसे व्यक्तिगत जानकारी जैसे अपना नाम, पता, शैक्षिक योग्यता, सगे-संबंधियों और नौकरी-व्यवसाय का ब्यौरा देना पड़ता है.
> अखाड़े के थानापति इन जानकारियों की पड़ताल करते हैं. थानापति की रिपोर्ट मिलने पर अखाड़े के सचिव और पंच अलग-अलग जांच करते हैं. स्थानीय पुलिस थाने से संबंधित व्यक्ति का आपराधिक इतिहास पता किया जाता है.
> महामंडलेश्वर पद के लिए आवेदक व्यक्ति का शास्त्री, आचार्य होना जरूरी है, जिसने वेद-पुराण की शिक्षा हासिल कर रखी हो. अगर ऐसी डिग्री न हो तो व्यक्ति कथावाचक हो और खुद का आश्रम या मठ संचालित करता हो.
> मठ में जनकल्याण के लिए सुविधाओं का अवलोकन किया जाता है. देखा जाता है कि वहां पर सनातन धर्मावलंबियों के लिए विद्यालय, मंदिर, गोशाला आदि का संचालन हो रहा है या नहीं. कोई विवाद तो नहीं है!
> महामंडलेश्वर बनने वाले व्यक्ति का न्यूनतम पांच वर्ष संन्यासी जीवन होना चाहिए. अखाड़े की ओर से उन्हें विधि-विधान से संन्यास दिलाया जाता है. उन्हें स्वयं का पिंडदान और मुंडन कर शिखा धारण करनी पड़ती है.
> संन्यास के बाद दीक्षा दी जाती है. उत्कृष्ट योगदान देने पर कुंभ अथवा महाकुंभ में महामंडलेश्वर पद पर पट्टाभिषेक किया जाता है. दूध, घी, शहद, दही, शक्कर से बने पंचामृत से पट्टाभिषेक किया जाता है.
> कई स्तरीय जांच और ज्ञान वैराग्य की परीक्षा में खरा उतरने के बाद ही महामंडलेश्वर की पदवी मिलती है. उसके बाद तमाम प्रतिबंध से आजीवन बंधकर रहना पड़ता है. नियम तोड़ने पर अखाड़े से निष्कासित कर दिया जाता है.
> किसी भी अखाड़े में आदेश का नेतृत्व आचार्य महामंडलेश्वर करते हैं. उसके बाद महामंडलेश्वर, मंडलेश्वर, महंत, करबारी, थानापति, सचिव, पुजारी, कोतवाल और कोठारी होते हैं.
क्या है किन्नर अखाड़ा

किन्नर अखाड़े को वर्ष 2015 में अखाड़े का दर्जा मिला था. 2016 में उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में पहली बार किन्नर अखाड़े ने शिरकत की थी. हालांकि तब उसे अन्य अखाड़ों के साथ स्नान करने का मौका नहीं दिया गया था. बाद में श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े में शामिल होने के बाद 2019 के कुंभ में किन्नर अखाड़े ने शाही स्नान किया था. प्रयागराज के महाकुंभ नगर में 14 जनवरी को द्वादशवर्षीय कुंभ में किन्नर अखाड़े ने पहली बार अमृत स्नान किया था.
किन्नर अखाड़े को हालांकि अभी तक अखाड़ा परिषद ने अलग अखाड़े के रूप में मान्यता नहीं दी है. किन्नर अखाड़ा इकलौता ऐसा अखाड़ा है जो तीनों लिंगों के लोगों को प्रतिनिधित्व देता है. यह भले ही संन्यासी संप्रदाय के सबसे बड़े जूना अखाड़े से जुड़ा है लेकिन संन्यास लेने के लिए यह किसी पर दबाव नहीं डालता. किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नरायण त्रिपाठी हैं. इस अखाड़े से जुड़े सभी लोगों के लिए आचार्य महामंडलेश्वर की खातिर केवल 'मां' संबोधन ही है.