तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने 4 फरवरी को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया, जिसमें एक प्रस्ताव पारित करके केंद्र सरकार से आग्रह किया गया कि राज्य के महत्वाकांक्षी जाति सर्वेक्षण की तर्ज पर पूरे देश में जाति गणना कराई जाए. हालांकि, गोपनीयता संबंधी चिंताएं जाहिर करते हुए विस्तृत रिपोर्ट पेश किए बिना ही प्रस्ताव को पारित कर दिया गया.
आधिकारिक तौर पर 'सामाजिक-आर्थिक, शैक्षिक, रोजगार, राजनैतिक और जाति सर्वेक्षण' कही जाने वाली जाति गणना 50 दिनों में कराई गई और इसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि राज्य की आबादी में पिछड़े वर्ग (बीसी) की हिस्सेदारी 56.33 फीसद है. इसमें पिछड़े मुस्लिम 10.08 फीसद हैं. ये आंकड़े काफी महत्वपूर्ण हैं, खासकर इसलिए क्योंकि 1931 के बाद से कोई राष्ट्रव्यापी जाति जनगणना नहीं हुई है.
उस समय अनुमानित तौर पर ओबीसी आबादी 52 फीसद थी. मंडल आयोग ने बाद में इसी आंकड़े का इस्तेमाल किया लेकिन समाजशास्त्रियों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है. जैसा, 2023 में बिहार के सर्वेक्षण से पता चला है, जिसमें पाया गया कि राज्य की आबादी में 63.1 फीसद ओबीसी हैं.
कांग्रेस सरकार का जाति सर्वेक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करने में आनाकानी करना कोई नई बात नहीं है. 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने भी 'समग्र कुटुंब सर्वेक्षण' के नाम पर कुछ ऐसी ही कवायद की थी और उसकी रिपोर्ट को भी गोपनीय रखा गया था. रिपोर्ट जारी न करने को लेकर रेवंत रेड्डी ने केसीआर की आलोचना की थी लेकिन अब उनकी अपनी सरकार भी उसी नक्शेकदम पर है.
बहरहाल, वे खुद को सामाजिक न्याय के अगुआ के तौर पर स्थापित कर रहे हैं और केसीआर की भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मात देने की कोशिश में जुटे हैं. दरअसल, कांग्रेस नेता राहुल गांधी राष्ट्रव्यापी जाति गणना की पुरजोर वकालत करते रहे हैं और उन्होंने इस तरह की कवायद के लिए तेलंगाना के सर्वेक्षण का हवाला भी दिया है. 3 फरवरी को लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान नेता विपक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि संसाधनों के न्यायसंगत वितरण के लिए इस तरह का आंकड़ा जरूरी है.
जाति सर्वेक्षण को डेटा-संचालित शासन की दिशा में एक सराहनीय कदम भले ही माना जा रहा हो लेकिन इस पर अमल करना खासा चुनौतियों भरा है. आबादी में पिछड़ी जातियों की हिस्सेदारी 56.33 फीसद होने का खुलासा होने पर आरक्षण बढ़ाने की मांग, खासकर स्थानीय निकायों में, पहले ही तेज हो चुकी है. पिछड़ी जातियों के नेता मौजूदा 34 फीसद से बढ़ाकर 42 फीसद आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं और उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर मांगें पूरी न की गईं तो बड़े पैमाने पर आंदोलन करेंगे. (शिक्षा और रोजगार मामले में पिछड़ी जातियों को पांच समूहों में बांटकर कुल मिलाकर 29 फीसद आरक्षण दिया जा रहा है. लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों में उन्हें एक ही समूह माना जाता है.)
अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण जाति सर्वेक्षण की जटिलता को थोड़ा और बढ़ाता है. सरकार ने जस्टिस शमीम अख्तर आयोग की सिफारिशें स्वीकार कर ली हैं, जिसमें 59 एससी उप-जातियों को तीन समूहों में बांटने करने और 1+9+5 के आधार पर 15 फीसद आरक्षण देने का प्रस्ताव रखा गया था. हालांकि, सरकार ने क्रीमीलेयर यानी एससी वर्ग के संपन्न लोगों को आरक्षण से बाहर रखने की आयोग की सिफारिश को खारिज कर दिया है.
जाति सर्वेक्षण के खासे राजनैतिक निहितार्थ भी हैं. बीआरएस और भाजपा दोनों ने आंकड़े में विसंगतियों का आरोप लगाते हुए इस सर्वेक्षण की आलोचना की है. बीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष के.टी. रामराव ने कहा कि 2014 के सर्वेक्षण की तुलना में पिछड़ा वर्ग की आबादी पांच फीसद घट गई, जबकि ओबीसी आबादी 21 फीसद से घटकर 15 फीसद हो गई है. लेकिन कांग्रेस सरकार में मंत्री एन. उत्तम कुमार रेड्डी ने नवीनतम सर्वेक्षण का बचाव करते हुए दावा किया कि बीआरएस सरकार के समय कराए गए सर्वेक्षण की कोई कानूनी वैधता नहीं है और वास्तव में पिछले एक दशक में पिछड़ों की आबादी 51 फीसद से बढ़कर 56 फीसद (पिछड़े वर्ग के मुसलमानों सहित) हो गई है.
बहरहाल, जाति सर्वेक्षण के आधार पर कोटा प्रणाली लागू करने में कानूनी स्तर पर कई चुनौतियां हैं. आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की 50 फीसद की सीमा एक बड़ी बाधा है, जिसके तहत राज्य विधानमंडल से पारित किसी भी कानून को संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान की अनुसूची 9 में समाहित करना अनिवार्य है. यही नहीं, बीसी (ई) श्रेणी के तहत चार फीसद मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा भी अभी अनसुलझा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. ऐसी तमाम बाधाओं के बावजूद रेवंत रेड्डी ने स्थानीय निकाय चुनावों के लिए पार्टी के नामांकन में पिछड़ा वर्ग के लिए 42 फीसद आरक्षण के अलावा शिक्षा और रोजगार में भी आरक्षण बढ़ाने का वादा किया है.
सर्वेक्षण की सफलता जटिल सामाजिक, राजनैतिक और कानूनी चुनौतियों से निबटने की सरकार की क्षमता पर निर्भर करती है. जैसा, हैदराबाद स्थित नालसर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हरथि वागीशन कहते हैं, ''केवल चुनावी फायदे के लिए इन आंकड़ों का इस्तेमाल करना कांग्रेस के लिए मददगार साबित नहीं होगा. अगर वह इसका उपयोग मानव विकास की दिशा में करती है तो पार्टी को इससे दीर्घकालिक फायदा हो सकता है.''
जाति सर्वेक्षण की असली परीक्षा यही होगी कि सरकार इन आंकड़ों को सार्थक कदम उठाने की दिशा में कैसे इस्तेमाल करती है. इससे ही यह पक्का होगा कि कांग्रेस सही मायने में समान विकास के लिए प्रतिबद्ध है और जाति-समुदाय के समूहों की जरूरतों को पूरा करने के प्रति गंभीर है.