
कामा घाट रेलवे स्टेशन उत्तर बिहार को गंगा के दक्षिणी हिस्से से जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण कनेक्शन था. 1893 में वहां मेरी नियुक्ति ट्रांस-शिपमेंट इंस्पेक्टर के रूप में हुई थी. जब मैं वहां पहुंचा तो सैकड़ों मीटर लंबे रेलवे शेड में छत तक माल अटा पड़ा था. इसके बाहर मीटर और ब्रॉड गेज रेलवे के 400-400 वैगन भी सामान से भरे थे.
इनमें लगभग 15,000 टन माल था. गंगा के दूसरी तरफ वाले सिमरिया घाट स्टेशन पर भी माल लदे एक हजार वैगन खड़े थे. दोनों तरफ के माल को जहाज के जरिए, एक तरफ से दूसरी तरफ भेजना था. मगर न पर्याप्त मजदूर थे और न ही खाली वैगन. इसलिए माल की आवाजाही पिछड़े एक पखवाड़े से बंद थी.’’
यह विवरण मशहूर शिकारी और प्रकृतिविद् जिम कॉर्बेट ने अपनी किताब माइ इंडिया में लिखा है. उन्होंने 1893 से 1913 तक मोकामा घाट रेलवे स्टेशन में नौकरी करते हुए ब्रिटिश इंडियन रेलवे के इस सबसे बड़े यार्ड में माल की आवाजाही की व्यवस्था सुदृढ़ की. वहां उन्होंने एक स्कूल भी खोला, जिसमें यार्ड में काम करने वाले लगभग 200 बच्चे पढ़ते थे. आज भी वह स्कूल मौजूद है और जिम कॉर्बेट का वह बंगला भी, जहां वे रहते थे. बस मोकामा घाट रेलवे स्टेशन की वह रौनक गायब है, जिसका जिक्र उन्होंने अपनी किताब में किया है.
अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण मोकामा शहर उस जमाने में अंतर्देशीय नौवहन और रेलवे का बड़ा केंद्र हुआ करता था. कॉर्बेट के मुताबिक, उस वक्त पूरे साल वहां से दस लाख टन माल की आवाजाही होती थी और लाखों लोग स्टीमर से गंगा पार करते थे. इसी खासियत की वजह से आजादी के बाद मोकामा में कई बड़ी फैक्ट्रियां लगीं और एक बड़ी थोक मंडी विकसित हुई, जहां आसपास के जिलों से लोग खरीदारी के लिए आते थे.
मगर धीरे-धीरे कारखाने बंद हुए, मंडी उजड़ गई और बीते तीन दशक से मोकामा की एक ही पहचान रह गई है. वह है अपराध की राजधानी. वहां अक्सर गोलियां चलती हैं और गैंगवार होते हैं. इस साल भी 22 जनवरी को मोकामा के नौरंगा-जलालपुर गांव में मोकामा के पूर्व विधायक अनंत सिंह और एक नए उभरते अपराधी सोनू-मोनू के बीच जबरदस्त गोलीबारी हुई.
स्थानीय लोगों के मुताबिक, कम से कम 60-70 राउंड गोलियां चलीं. वैसे, पुलिस 15-20 राउंड गोलियां चलने की बात बता रही है. पुलिस ने अनंत सिंह और सोनू को गिरफ्तार कर लिया लेकिन मोनू अब भी फरार है.

अनंत सिंह को मोकामा में 'छोटे सरकार’ कहा जाता है. वे आपराधिक मामलों में अक्सर जेल जाते रहते हैं. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में दाखिल एफिडेविट के मुताबिक, उन पर 38 मामले दर्ज हैं. फिलहाल उनकी पत्नी नीलम देवी मोकामा की विधायक हैं. इससे पहले 2005 से 2020 तक अनंत लगातार मोकामा के विधायक रहे. अनंत से पहले मोकामा विधानसभा का प्रतिनिधित्व उनके भाई दिलीप सिंह और एक अन्य बाहुबली सूरजभान करते रहे हैं.
मोकामा घाट पर गंगा नदी के किनारे आज भी रेलवे के उस पुराने गोदाम की जर्जर निशानियां मौजूद हैं. इसके कुछ हिस्से पर सीआरपीएफ कैंप है. इसी कैंप में जिम कॉर्बेट का बंगला है जहां उन्होंने 21 साल गुजारे थे. कैंप से बाहर निकलकर बाजार से होते हुए मोकामा टाल की ओर जाने पर इसी तरह के कई जर्जर कैंपस दिखते हैं. इनमें एक भारत वैगन का कैंपस है जिसके जंग खाये दरवाजे के बीच से झांकने पर अंदर एक बियाबान-सा दिखता है. कोई सोच भी नहीं सकता कि सात-आठ साल पहले इस विशाल परिसर में मशीनें धड़कती थीं और हर रोज एक मालगाड़ी के बराबर रेल के डिब्बे तैयार होते थे.
इसी इलाके में नेशनल टेक्सटाइल कॉर्पोरेशन की एक बड़ी फैक्ट्री थी. उसमें सूती धागे तैयार होते थे. मोकामा से थोड़ी दूर हाथीदह के पास बाटा की बंद पड़ी टैनरी और मैकडॉवेल शराब का कारखाना दिखता है. दोनों के दरवाजों पर ताले जड़े हैं. बीते बीस साल में इन चार बड़े कारखानों के बंद होने से हजारों मजदूर बेरोजगार हुए और इन बड़े कारखानों के लिए सामान तैयार करने वाली छोटी कंपनियां बदहाल हो गईं. इनमें कूट की फैक्ट्री, सिंदूर और रंग की फैक्ट्री और प्लास्टिक धागे तथा ढक्कन की फैक्ट्रियां शामिल थीं.
बीते दौर की याद दिलाने पर मोकामा के समाजसेवी 71 वर्षीय कृष्णदेव सिंह उर्फ बबन सिंह कहते हैं, ''वह मोकामा का सुनहरा दौर था. पहले यहां मिरचाई गोला था, कलकत्ता के व्यापारी आकर माल ले जाते थे. रेलवे गोदाम होने के कारण रैक से सामान आता और हर दिन करोड़ों रुपयों का कारोबार होता था. इसी वजह से यहां और इससे सटे बरौनी के इलाके में इंडस्ट्रियल कॉरिडोर विकसित हुआ. यहां इलाके का सबसे बड़ा अस्पताल नाजरेथ हॉस्पिटल खुला. पर अपराध की परछाइयों ने सब तबाह कर दिया.’’

बाटा लेदर फैक्ट्री में परचेज मैनेजर रहे कमलेश सिंह कहते हैं, ''यह एशिया की सबसे बड़ी टैनरी थी. जगह-जगह से कच्चा माल आता और यहां फिनिश लेदर बनाया जाता था. एक जमाने में यहां 700 लोग काम करते थे. अंत में 350 रह गए. 2010 के आसपास ऑर्डर नहीं मिलने के कारण फैक्ट्री बंद हो गईं.’’
इसी तरह भारत वैगन ऐंड इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड 2017 में बंद हो गई. विजय माल्या के पिता विट्ठल माल्या की ओर से स्थापित यूनाइटेड स्पिरिट फैक्ट्री तो 2016 में शराबबंदी लागू होते ही बंद करा दी गई. इस कारखाने से सटे औंटा गांव में अविनाश कुमार मिलते हैं, जो यूनाइटेड स्पिरिट में काम करते थे.
वे कहते हैं, ''कंपनी के बंद होते ही 200 परमानेंट और 1,200 से ज्यादा मजदूर एक झटके में बेरोजगार हो गए. हमारे साथ काम करने वाले दर्जनों लोग भीषण कर्ज के तले दब गए क्योंकि उनका परिवार एक झटके में लाइफ स्टाइल बदलने के लिए तैयार नहीं था. अब उनमें से कई लोग कर्ज न चुका पाने के कारण मोकामा छोड़कर कहीं बाहर चले गए हैं, और गुमनाम जीवन जी रहे हैं.’’
औंटा गांव में एक कार्टन फैक्ट्री है, जो मैकडॉवेल शराब की बोतलों के लिए कार्टन के डब्बे तैयार करती थी. उस कंपनी के मालिक सुबोध बताते हैं, ''हमारी निर्भरता यूनाइटेड स्पिरिट पर थी. ऐसे में अब कारोबार एक-चौथाई रह गया है.’’
मोकामा के पूर्व विधायक और बिहार सरकार में पूर्व मंत्री श्यामसुंदर सिंह धीरज कहते हैं, ''सिर्फ फैक्ट्रियां बंद नहीं हुईं. कारोबार भी प्रभावित हुआ. एक ओर लोगों के बेरोजगार होने के कारण बिक्री घटी, दूसरी ओर रंगदारी के डर से बिजनेसमैन मोकामा छोड़कर जाने लगे. शहर वीरान होने लगा.’’ मोकामा में अपराध के उदय की कहानी बताते हुए बबन सिंह कहते हैं, ''अस्सी के दशक में मोकामा कॉलेज में खेलकूद के फंड पर कब्जे को लेकर छात्रों के दो ग्रुप बने थे.
उन्हीं दोनों ने आगे चलकर आपराधिक गैंग का रूप ले लिया. वे व्यापारियों से रंगदारी मांगने लगे.’’ इससे पहले इमरजेंसी के दौरान बिहार में छात्र आंदोलन हुआ. संजय गांधी के करीबी और यूथ कांग्रेस के नेता रहे श्यामसुंदर धीरज इमरजेंसी विरोधी नेता के रूप में उभरे. वे खुद बताते हैं कि उन्होंने जेपी का खुलेआम विरोध किया था. 1977 के चुनाव में मोकामा में पहली बार अपराधियों की मदद ली गई. ऐसे में जब पूरे बिहार में कांग्रेस हार रही थी, यहां से कृष्णा शाही जीत गईं.
अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह को राजनीति में लाने का इलजाम कांग्रेस नेता धीरज पर लगाया जाता है. कहा जाता है कि 1980 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दिलीप सिंह की मदद से चुनाव जीता. मगर वे इससे इनकार करते हैं. उन्हीं के शब्दों में, ''तब मेरे खिलाफ सीपीआइ नेता शिवशंकर शर्मा मैदान में थे और दिलीप सिंह उस वक्त सीपीआइ में थे. तब सीपीआइ के मुनीलाल और दिलीप सिंह ने शिवशंकर की मदद की. उस वक्त सीपीआइ को टाल में कई बूथों पर 90 फीसद से ज्यादा वोट मिले. तब मैंने इसकी काट ढूंढ़ने के चक्कर में दिलीप सिंह को अपने पाले में कर लिया.’’

वहीं, सीपीआइ नेता विश्वजीत अलग कहानी बयान करते हैं, ''दिलीप सिंह तब जरूर नौजवान सभा में थे. उन्होंने शिवशंकर शर्मा के स्वागत के लिए अपने इलाके में पूरी तैयारी की थी. मगर शिवशंकर को जब दिलीप के आपराधिक इतिहास का पता चला तो वे वहां नहीं गए. इसे अपना अपमान समझ कर दिलीप सिंह पाला बदलकर धीरज की ओर चले गए.’’ कहा जाता है कि दिलीप की मदद लेने के बाद धीरज उनसे सार्वजनिक मुलाकात में हिचकते थे. इन्हीं वजहों से दिलीप उनसे अलग हो गए और 1985 के चुनाव में धीरज के खिलाफ मोकामा से खड़े हो गए. दिलीप जीत नहीं पाए. मगर फिर 1990 में जनता दल के टिकट पर मैदान में उतरे दिलीप ने धीरज को हरा दिया.
धीरज सिंह कहते हैं, ''1990 के चुनाव से पहले बिहार के सबसे बड़े नेताओं में से एक ने मुझसे कहा था, मैंने आपके लिए ढूंढ़ लिया है. मैंने पूछा, किसे ढूंढ़ा, पुराने वाले को या कोई नया है? तो उन्होंने कहा, वही पुराना वाला. लंबे अरसे से दिलीप और उसके भाई अनंत सिंह उन्हीं के साथ हैं. ऐसे में सिर्फ मेरे ऊपर अपराधियों को राजनीति में लाने का आरोप क्यों? हां, मेरा कसूर है. हम अपना संबंध स्वीकार करते हैं. मगर जिन्होंने बिहार को बर्बाद कर दिया, जनतंत्र को कमजोर कर दिया, वे नकाब के पीछे आज भी छिपे हैं. उन्हें कोई कुछ नहीं कहता.’’
जब 1990 में बिहार में लालू राज की शुरुआत हुई तब दिलीप सिंह की राजनीति में एंट्री हो चुकी थी. वे 1995 में भी मोकामा से जीते और लोग बताते हैं कि उस दौरान मोकामा के अपराध की राजधानी बनने की शुरुआत हो गई. कारोबारियों का पलायन तेज हो गया. लोग बढ़ते अपराध से परेशान थे. बबन सिंह कहते हैं, ''इन्हीं परिस्थितियों में 'लोहा लोहे को काटता है’ के फॉर्मूले पर मोकामा के लोगों ने जेल में बंद सूरजभान से मदद मांगी.
जेल में ही योजना बनी. मोकामा से रोज गाड़ियों में भर कर लोग सूरजभान से मिलने जाते. संजय सिंह और दिलीप सिंह के करीबी नाटू सिंह से सूरजभान का समझौता हो गया. 2000 के चुनाव में सूरजभान निर्दलीय मैदान में उतरे और भारी मतों से चुनाव जीते. उसके बाद कुछ दिनों के लिए माहौल शांत हुआ, मगर तब तक मोकामा का बाजार उजड़ चुका था.’’
वहीं, चुनाव जीतने से पहले आपराधिक गतिविधियों में शामिल और पूरे बिहार के अपराधियों की मदद करने वाले सूरजभान की उस जीत के बाद जिंदगी ही बदल गई. उन्होंने खुद को राजनीति और कारोबार में झोंक दिया. अगला चुनाव उन्होंने बलिया लोकसभा सीट से लड़ा. इसी बीच चुनाव में हारे दिलीप सिंह 2003 में एमएलसी बन गए. ऐसे में 2005 के विधानसभा चुनाव में मोकामा की सीट फिर से खाली थी और इस खाली जगह को दिलीप सिंह के छोटे भाई अनंत सिंह ने भरा.

स्थानीय लोग बताते हैं कि सूरजभान की जीत और लालू से टकराव की वजह से अनंत सिंह जनता दल (यूनाइटेड) के करीब आए. नीतीश कुमार बाढ़ संसदीय सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं, इसलिए भी उनकी नीतीश से नजदीकी रही. दबंग छवि, मजबूत सियासी विरोधी की कमी, जातिगत समीकरण और सत्ता के सहयोग के कारण 2005 से 2020 तक मोकामा सीट पर अनंत का कब्जा रहा. इस बीच नीतीश से मतभेद होने पर उन्होंने 2015 का चुनाव निर्दलीय जीतकर दिखाया. 2020 में एक मामले में दोषी सिद्ध होने पर वे चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराए गए तो 2022 के उपचुनाव में उनकी पत्नी नीलम देवी को राजद ने टिकट दिया और वे जीत गईं. फिलहाल नीलम जद (यू) के पाले में हैं.
स्थानीय लोगों का मानना है कि मोकामा अपराध से कम, अपनी आपराधिक छवि से ज्यादा परेशान है. स्थानीय पत्रकार और बंद फैक्ट्रियों को लेकर मुखर सुंदरम कहते हैं, ''गोलियां पूरे बिहार में चलती हैं. पर मोकामा की खबरों को हाइप दिया जाता है. इसी मोकामा से इस साल एक दर्जन से ज्यादा छात्रों ने बीपीएससी पास किया, यूपीएससी इंजीनियरिंग सर्विसेज की परीक्षा का ऑल इंडिया टॉपर राजन इसी शहर का है, मगर इसकी कहीं चर्चा नहीं होती.
यहां गोली चलती है और खबरें बनने लगती हैं. बड़े सरकार, छोटे सरकार, दादा वाले किस्से चलने लगते हैं.’’ वे मानते हैं कि इन वजहों से मोकामा की छवि काफी खराब हुई और इसका नुक्सान आम लोगों को होता है. वे कहते हैं, ''खुद को मोकामा का बताने पर यहां के छात्रों को पटना में किराये पर कमरा नहीं मिलता.’’
ऐसे में लोगों में सियासी प्रतिनिधियों को लेकर क्षोभ भी है. मोकामा कॉलेज के छात्र अभिषेक राज कहते हैं, ''बीते 15-20 साल से मुझे याद नहीं कभी विधानसभा में सवाल पूछा गया हो कि मोकामा में फैक्ट्रियां क्यों बंद हो गईं. प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे पर कभी सड़क पर उतरकर धरना नहीं दिया. जब तक शिक्षित और मोकामा के लिए संघर्ष करने वाला व्यक्ति चुनकर नहीं आता, मोकामा नहीं बदलेगा.’’ जाहिर है, इस शहर में अपनी खराब छवि से छुटकारा पाने की गहरी छटपटाहट है.
एक लाइब्रेरी जिसने 'राइफल की जगह कलम’ की मुहिम शुरू की
मोकामा शहर के शंकरवा टोला के आखिर में गंगा किनारे एक छोटा-सा भवन है, जिस पर लिखा है 'विद्यार्थी हिंदी पुस्तकालय’, स्थापना 1924, भवन निर्माण 1994-95. इस पुस्तकालय भवन में कई छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते नजर आते हैं. मोकामा के युवा इसे नौकरी की फैक्ट्री कह कर बुलाते हैं. पुस्तकालय के संचालक चंदन कुमार कहते हैं, ''पिछले साल हमने इसके शताब्दी वर्ष कार्यक्रम में 500 से ज्यादा ऐसे लोगों को सम्मानित किया जिन्हें यहां पढ़ने की वजह से अच्छी नौकरी मिली. इनमें आइएएस-आइपीएस अफसर, साइंटिस्ट, डॉक्टर से लेकर सीआरपीएफ के जवान तक थे. अब यह पुस्तकालय इन्हीं पूर्व छात्रों के सहयोग से चलता है.’’
यह पुस्तकालय मोकामा को एक अलग पहचान देता है. इसके भवन का निर्माण उस दौर में हुआ जब यहां अपराध चरम पर था और इसके बड़े चेहरे इसी मोहल्ले के वासी थे. मगर शहर के बुद्धिजीवियों ने तय किया कि वे नई पीढ़ी को बंदूक के चक्कर में नहीं पड़ने देंगे.

इस पुस्तकालय से लंबे अरसे से जुड़े रहे बबन सिंह कहते हैं, ''भुवनेश्वर बाबू नाम के सज्जन ने 1992 में इस अभियान को शुरू किया. मैं और अजय उन्हें सहयोग कर रहे थे. तब शरीफ घरों के बच्चे घर से बाहर नहीं निकलते थे. हम फिक्रमंद थे कि उनका भविष्य क्या होगा. भुवनेश्वर बाबू ने इस पुस्तकालय को जिंदा करने की ठानी. वे हर दरवाजे पर जाते.
लोगों से सहयोग की अपील करते. पढ़े-लिखे लोग भी कहते, यहां राइफल-बंदूक चलता है और ये लोग पुस्तकालय बनाएंगे.’’ बबन कहते हैं कि फिर उन लोगों ने 1993 में छात्रों के लिए अलग-अलग तरह की प्रतियोगिताएं शुरू कीं. उसमें एक डिबेट भी थी, जिसका विषय रखा गया था 'कलम या तलवार’. मौजूं विषय था. आयोजन में पूरे मोकामा के बच्चे उमड़ पड़े.
एक अधिकारी इतने खुश हुए कि इस लाइब्रेरी के भवन के लिए डेढ़ लाख रुपए देने की घोषणा की. फिर दूसरे लोगों ने भी मदद की और यह पुस्तकाल भवन बना. फिर बच्चे पढ़ाई के लिए इस पुस्तकालय में आने लगे. उन्हें नौकरियां मिलने लगीं. इस पुस्तकालय से प्रभावित होकर मोकामा शहर में ऐसे सात पुस्तकालय खुले.
बबन कहते हैं, ''हमारे मन में यह डर जरूर था कि शंकरवा टोले में पुस्तकालय चल रहा है, कहीं अपराधी बच्चों को परेशान न करें. मगर जब भी ये अपराधी दिखते, वे हाथ जोड़ लेते और कहते कि आप लोग अच्छा काम कर रहे हैं, हमारी किसी मदद की जरूरत हो तो कहिएगा. मैं उनसे कहता कि आप बस शांति बनाए रखिए, यही सबसे बड़ी मदद होगी.’’