अजमेर जिले के देलवाड़ा गांव के सरकारी सीनियर सेकंडरी स्कूल में 285 छात्राएं पढ़ती हैं. 17 जनवरी की सुबह जब वे स्कूल पहुंचीं तो पता चला कि उनके 45 साल पुराने स्कूल को बंद कर छात्रों के स्कूल में समायोजित किया जा रहा है. इन छात्राओं को अब डर है कि उन्हें पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ेगी क्योंकि उनके अभिभावक लड़कों के साथ पढ़ाई करवाने के लिए राजी न होंगे.
ग्रामीणों को सूचना मिली तो उन्होंने दोनों स्कूलों के गेट पर ताला जड़ दिया. ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार ने बिना छानबीन किए इस स्कूल को बंद करने का फैसला कर लिया. देलवाड़ा की सरपंच जसोदा कहती हैं, "एक तरफ 4.5 करोड़ रुपए खर्च कर हमारे गांव में लड़कियों के लिए स्कूल बनाया जा रहा है और दूसरी तरफ 45 साल से चल रहा स्कूल बंद कर दिया."
दरअसल, देलवाड़ा के इस बालिका सीनियर सेकंडरी स्कूल का नाम उन 249 स्कूलों की सूची में है जिन्हें 16 जनवरी को बंद करके नजदीकी स्कूलों में समायोजित कर दिया गया. पिछले एक माह में राजस्थान में 439 सरकारी स्कूलों को बंद करने और दूसरे स्कूलों में समायोजित करने के आदेश जारी किए गए हैं. इसकी शुरुआत 7 जनवरी को प्रारंभिक शिक्षा विभाग की ओर से जारी उन आदेशों के साथ हुई जिसमें 190 सरकारी स्कूलों को बंद और समायोजित करने का फैसला किया गया. यह सारी कवायद जिला शिक्षा अधिकारियों के उन प्रस्तावों पर की गई है जिसमें उन्होंने शून्य नामांकन वाले स्कूलों को बंद किए जाने की सिफारिश की थी.
जिला शिक्षा अधिकारियों ने इस दौरान यह भी प्रस्ताव भिजवाया कि कई जगह एक ही परिसर में अलग-अलग दो स्कूल चल रहे हैं, इसलिए ऐसे स्कूलों को समायोजित कर दिया जाए. शिक्षा निदेशालय ने सरकार से अनुमति मिलते ही शून्य नामांकन वाले स्कूलों को बंद करने और स्कूलों को समायोजित करने के आदेश जारी किए गए. बंद किए गए 439 स्कूलों का अब कोई प्रशासनिक अस्तित्व नहीं रहेगा. इन स्कूलों में कार्यरत शिक्षक अन्य स्कूलों में खाली पदों पर काम करेंगे.
बालिका और भाषायी स्कूलों को बंद करने और नजदीकी विद्यालयों में समायोजित किए जाने के खिलाफ तीखा आक्रोश दिखाई पड़ा है. जोधपुर, बीकानेर, अजमेर, पाली, उदयपुर और जयपुर समेत कई जिलों से ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं जिसमें स्कूल बंद किए जाने के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर पड़े.
बीकानेर के जस्सूसर गेट स्थित राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय को दूसरे स्कूल में समायोजित किए जाने के खिलाफ छात्राओं ने भूख हड़ताल शुरू कर दी है. स्थानीय भाजपा विधायक जेठानंद व्यास ने भी शिक्षा मंत्री मदन दिलावर को पत्र लिखकर इस स्कूल को फिर से चालू किए जाने की मांग की है. इस स्कूल में 300 से ज्यादा छात्राएं पढ़ती हैं. कुछ ऐसा ही हाल बीकानेर की पाबू पाठशाला का है जहां दिव्यांग बालक-बालिकाओं को स्कूल बंद किए जाने के खिलाफ सड़क पर उतरना पड़ा.
अजमेर में राजकीय बालिक उच्च माध्यमिक विद्यालय बढ़बाव (उर्दू माध्यम) को राजकीय माध्यमिक विद्यालय बढ़बाव (हिंदी माध्यम) में समायोजित किया गया. 1941 से संचालित इस स्कूल में 12वीं तक उर्दू में तालीम दी जाती है और 300 से ज्यादा छात्राएं यहां पढ़ रही हैं. अजमेर में आठ उर्दू स्कूलों को हिंदी माध्यम स्कूलों में समायोजित किया गया है. जमात-ए-इस्लामी हिंद ने उर्दू स्कूलों को हिंदी माध्यम स्कूलों में समायोजित किए जाने का विरोध किया है. संगठन के प्रदेश अध्यक्ष मुहम्मद नाजिमुद्दीन कहते हैं, "कम संख्या बताकर स्कूलों को बंद करना आरटीई ऐक्ट का उल्लंघन है. एक तरफ सरकार नई शिक्षा नीति के जरिए प्राथमिक स्तर से शिक्षा स्थानीय भाषा में दिए जाने की तैयारी कर रही है दूसरी तरफ उर्दू और स्थानीय भाषा के स्कूलों पर ताला लगाया जा रहा है."
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है, "पूर्व में वसुंधराराजे के कार्यकाल में समन्वय के नाम पर 22,204 सरकारी स्कूलों को बंद किया गया और अब 450 स्कूलों पर ताला लगा दिया. भजनलाल सरकार कांग्रेस के कार्यकाल में खोले गए 3,700 से ज्यादा महात्मा गांधी स्कूलों को भी बंद करने की तैयारी में है." राजस्थान विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली का कहना है, "भाजपा सरकार शिक्षा को निजी हाथों में सौंपना चाहती है." हालांकि, राज्य के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर का स्पष्टीकरण है कि "हमारी सरकार ने एक भी स्कूल बंद नहीं किया है बल्कि शिक्षा को सुदृढ़ करने के लिए स्कूलों को समन्वित किया है."
भाजपा ने भी सुर में सुर मिलाया है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का कहना है, "हम स्कूल बंद नहीं कर रहे बल्कि जहां छात्रों की संख्या कम है, उन्हें दूसरे स्कूलों में समायोजित कर न्यायसंगत काम कर रहे हैं."
आरोपों और जवाबों के बीच छात्रों की शिक्षा का असल सवाल अब भी अधर में झूल रहा है. फैसले के नतीजे सूबे के सरकारी शैक्षणिक ढांचे पर क्या और कितना असर डालते हैं? सामने खड़े इस सवाल का भी जवाब तमाम दावों और वादों से इतर आने वाले कल के इंतजार में है.
राज्य सरकार के इन आदेशों के अनुसार बालिका स्कूल ही नहीं बल्कि कुछ उर्दू और सिंधी माध्यम स्कूलों को भी हिंदी माध्यम स्कूलों में समायोजित किया गया है.