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बिहार चुनाव 2025 : क्या राहुल गांधी की बिहार यात्रा से सुधरेगा कांग्रेस का प्रदर्शन?

डेढ़ साल बाद बिहार कांग्रेस के दफ्तर पहुंचे राहुल गांधी ने अपनी संक्षिप्त यात्रा में संविधान सुरक्षा सम्मेलन को संबोधित किया और लालू यादव परिवार से मुलाकात की

पटना में संविधान सुरक्षा सम्मेलन के मंच पर राहुल गांधी
पटना में संविधान सुरक्षा सम्मेलन के मंच पर राहुल गांधी
अपडेटेड 18 फ़रवरी , 2025

तकरीबन डेढ़ साल बाद 18 जनवरी, 2025 को राहुल गांधी बिहार के कांग्रेस कार्यालय, सदाकत आश्रम पहुंचे. इससे पहले लोकसभा चुनाव से पूर्व जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए पटना में बैठक बुलाई थी, तो राहुल अपनी उस यात्रा के दौरान सदाकत आश्रम गए थे और वहां कार्यालय के पीछे वाले मैदान में आयोजित सभा में उन्होंने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया था.

इस बार भी कांग्रेस की बिहार प्रदेश इकाई ने उसी मैदान में कार्यकर्ताओं की सभा का आयोजन किया था, जिसमें राहुल गांधी को सुनने प्रदेश भर से 7,000-8,000 कार्यकर्ता पहुंचे थे. दोपहर सवा तीन बजे जब वे वहां पहुंचे तो उनका स्वागत करते हुए बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह बोले, "आप जिस तरह साउथ इंडिया और उत्तर प्रदेश को समय देते हैं, उसी तरह आप बिहार को भी समय दीजिए तो हम आपको भरोसा दिलाते हैं कि कांग्रेस को बिहार में ’90 से पहले वाली स्थिति में ला देंगे."

उनका इशारा मंडल पूर्व के दौर से था जब बिहार में अमूमन कांग्रेस ही सत्ता में रहती थी. 1985 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की 324 में से 196 सीटें आई थीं. 1990 में लालू के उदय के साथ कांग्रेस की सीटें घटती चली गईं और फिर वह उनके साथ समझौता करने को मजबूर हो गई. पिछले 35 साल में बिहार में कांग्रेस को कभी सौ से ज्यादा सीटें नहीं आ पाईं. 1990 के चुनाव के बाद तो वह कभी 30 के आंकड़े को भी नहीं छू पाई. ऐसे में हर कांग्रेसी उदास होकर नब्बे के पहले के उस दौर को याद करता है, जो आज एक असंभव-सा सपना है.

इसलिए अखिलेश प्रसाद सिंह ने जब राहुल गांधी के सामने ’90 से पहले के कांग्रेसी दौर का जिक्र किया तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं की भीड़ से तालियों का शोर शुरू हो गया और इस शोर में राहुल ने इस बात को कितना सुना, क्या समझा, यह तो पता नहीं मगर जब उनके संबोधन की बारी आई तो उन्होंने आठ मिनट का संक्षिप्त-सा भाषण दिया. इस भाषण में भी वे अपने बिहारी कार्यकर्ताओं के लिए बमुश्किल 1.40 मिनट ही समय निकाल पाए. बस इतना कहा कि बिहार से ही बदलाव होता है और हमें यहां इंडिया गठबंधन के साथ मिलकर भाजपा और आरएसएस की विचारधारा को हराना है.

इससे ज्यादा चर्चा महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में हुई गड़बड़ियों पर की. उन्होंने औपचारिकतावश भी यह नहीं कहा कि आपके राज्य में चुनाव हो रहा है, हम अब यहां नियमित आएंगे, बार-बार आएंगे. ’90 के पहले के दौर का भी उन्होंने बिल्कुल जिक्र नहीं किया और शाम को दिल्ली जाने से पहले राजद सुप्रीमो लालू यादव के आवास पर जाना नहीं भूले और वहां उन्होंने 22 मिनट का वक्त परिवार के लोगों से मिलने-जुलने में बिताया.

राहुल गांधी राजद के तेजस्वी यादव और लालू यादव के साथ

वैसे तो राहुल गांधी का यह बिहार दौरा देश भर में चल रहे संविधान सुरक्षा सम्मेलन के सिलसिले में था. सामाजिक संगठनों की ओर से अलग-अलग राज्यों में आयोजित इस कार्यक्रम में वे हर बार शिरकत करते हैं और संगठनों की बात सुनते हैं और श्रोताओं में मौजूद दलित-आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के सामाजिक कार्यकर्ताओं से संविधान पर हो रहे हमलों की चर्चा करते हैं. साथ ही संविधान को बचाने की अपील भी करते हैं.

जैसा कि बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह दावा करते हैं कि इस दौरे में भी उन्होंने राहुल से जिद करके कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए वक्त निकाल लिया. मगर अपने सात घंटे के पटना प्रवास में वे कार्यकर्ताओं के लिए बमुश्किल 30-35 मिनट ही निकाल पाए.

अगले दिन सदाकत आश्रम में कांग्रेस के कई सीनियर लीडर अनौपचारिक बातचीत में यह शिकायत करते नजर आए कि उन्हें राहुल गांधी से मिलने और उनके सामने अपनी बात रखने का मौका ही नहीं मिला. कुछ नेताओं ने तो दबे स्वर में यहां तक कहा कि नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव के बाद तीन बार बिहार आ चुके हैं. "बिहार भाजपा वालों के लिए उनसे मिलना आसान है, जबकि हम लोगों के लिए राहुल जी से मिलना और अपनी बात रखना एक दुर्लभ बात हो गई है." हैरत तो यह देखकर हुई कि सदाकत आश्रम में जिस स्टाफ क्वार्टर का उद्घाटन राहुल गांधी को करना था, उसका उद्घाटन अखिलेश प्रसाद सिंह ने अगले दिन किया.

सिंह ने इंडिया टुडे से बातचीत में इस पूरे मसले को यह कहकर टालने की कोशिश की, "सदाकत आश्रम में उन्होंने पूरा समय दिया है. और पटना में रहते हुए उन्होंने चाहे संविधान सुरक्षा सम्मेलन में भागीदारी की, चाहे बीपीएससी छात्रों से मुलाकात की या फिर लालू जी से मिलने गए, सारा कार्यक्रम पीसीसी ने ही तय किया था. यह सब भी कांग्रेस की मजबूती का ही काम है. इससे कांग्रेस बिहार में मजबूत ही होगी."

जब उन्हें उनके ’90 से पहले वाले कांग्रेस के बयान की याद दिलाई गई तो उन्होंने कहा, "आपने एक वाक्य को पकड़ लिया, मैंने यह भी तो कहा था कि आप संगठन पर ध्यान दीजिए. पीसीसी की बॉडी को जल्दी से निकलवा दीजिए, कार्यकर्ताओं का मन छोटा होता है. सम्मान गिरता है. मैंने अपने समय में लोकसभा की सीट को एक से तीन पर पहुंचाया है, हमारे समय में वोट परसेंट बढ़ा है."

सिंह ने जिस पीसीसी कमेटी का जिक्र किया उसका आशय कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी समिति से था, जो लगभग पिछले आठ साल से भंग पड़ी है और दो साल से कमेटी की सिफारिश कांग्रेस आलाकमान के पास पेंडिंग है. कांग्रेस की केंद्रीय इकाई के पास उसे स्वीकृति देने का वक्त नहीं है. इसलिए वे चाहे जिस तरह से मामले की लीपापोती करने की कोशिश करें, यह जाहिर है कि चाहे राहुल गांधी हों या कांग्रेस की केंद्रीय इकाई, बिहार कांग्रेस पर ध्यान देने का वक्त किसी के पास नहीं है.

इससे उन आरोपों को बल मिलता है कि कांग्रेस ने अपनी बिहार इकाई को पूरी तरह लालू-तेजस्वी यादव और राजद के भरोसे छोड़ रखा है. राहुल गांधी की यात्रा से ठीक पहले जद (यू) के वरिष्ठ नेता और बिहार सरकार में मंत्री अशोक चौधरी की इस तीखी टिप्पणी ने सबका ध्यान खींचा.

इसमें उन्होंने कहा था, "कांग्रेस ने बिहार में पड़ोसी के भरोसे अपने आने वाले परिवार को छोड़ दिया है. जब मालिक मर जाएगा तो पड़ोसी के बेटे को कौन पालेगा? राहुल गांधी जब अध्यक्ष बने थे तो लोगों को उक्वमीद थी कि बिहार में कांग्रेस अब अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी. बिहार में कांग्रेस के पास खोने के लिए है ही क्या? मगर जो हालात हैं, उसमें अगले 50 साल तक लालू कांग्रेस को बिहार में पनपने नहीं देंगे."

अशोक चौधरी का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे 2013 से 2018 तक बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं. उनके कार्यकाल में हाल के वर्षों में कांग्रेस को सबसे बेहतर सफलता मिली. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने हिस्से में आई 41 में से 27 सीटें जीती थीं.

जबकि 2010 के विधानसभा चुनाव में अकेले मैदान में उतरी कांग्रेस के हिस्से सिर्फ चार सीटें आई थीं, जो कि बिहार कांग्रेस के इतिहास का सबसे कमजोर प्रदर्शन था. 2020 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस 2015 वाला प्रदर्शन दोहरा नहीं पाई. अपने हिस्से में आई 70 सीटों में से वह सिर्फ 19 सीटें जीत पाई. और उसे महागठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी करार दिया गया. हालांकि कांग्रेसी नेता इस बात को यह कहते हुए खारिज करते हैं कि जानबूझकर उन्हें ऐसी सीटें दी गई थीं, जो मुश्किल थीं.

चौधरी के इस बयान में कुछ सचाई जरूर है कि कांग्रेस हाल के वर्षों में राजद और लालू परिवार से अपनी निर्भरता कम करने की स्थिति में नहीं है. शायद यही वजह रही होगी कि राहुल को अपने दौरे में से 22 मिनट का समय राबड़ी आवास में अनौपचारिक मुलाकात के लिए निकालना पड़ा, जबकि इस दौरे से पहले दोनों के बीच के संबंध बहुत सहज नहीं थे.

तेजस्वी ने कुछ ही दिनों पहले कहा था, "यह पहले से ही तय था, इंडिया गठबंधन सिर्फ लोकसभा चुनाव के लिए है." उनका यह बयान दिल्ली चुनाव के संदर्भ में था. इससे पहले लालू यादव भी कह चुके थे कि इंडिया गठबंधन का नेतृत्व ममता बनर्जी करें. इससे लगने लगा था कि शायद राहुल और लालू परिवार के बीच वह सहज रिश्ता अब नहीं रहा, जो 2023 में राहुल की पटना यात्रा के बाद शुरू हुआ था, जब लालू ने राहुल की शादी का जिक्र छेड़ा था. उसके बाद राहुल गांधी खुद लालू यादव से मिलने दिल्ली में उनके आवास गए थे, जहां राजद प्रमुख ने उन्हें मटन खिलाया था.

प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अवधेश प्रसाद सिंह और श्याम सुंदर सिंह धीरज

राहुल के करीबी बताते हैं कि इस बार की पटना यात्रा में राबड़ी आवास जाने का उनका इरादा नहीं था. मगर चूंकि पटना में जिस होटल में राजद की कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी, वहीं राहुल के ठहरने की व्यवस्था थी, तो उस दौरान चलते-चलते तेजस्वी की राहुल से मुलाकात हो गई और तेजस्वी ने उनसे पांच मिनट के लिए घर आने का अनुरोध किया, जिसे राहुल टाल नहीं पाए. इस मुलाकात के बाद गिले-शिकवे दूर हो गए.

राहुल ने सदाकत आश्रम के कार्यकर्ता सम्मेलन में भी यह कहा कि बिहार में आरएसएस-भाजपा को हटाने की जिम्मेदारी इंडिया गठबंधन की है. जबकि उसी रोज राजद कार्यकारिणी की बैठक में तेजस्वी यादव को पार्टी में लालू के बराबर अधिकार देने के साथ-साथ मुख्यमंत्री का उम्मीदवार भी घोषित किया जा रहा था. इस बारे में इंडिया गठबंधन के साथियों से शायद ही कोई औपचारिक राय ली गई हो.

जानकार बताते हैं कि लालू और तेजस्वी बिहार में इंडिया गठबंधन को इसी तरह चलाते हैं. वे सहयोगी दलों से विचार करने को बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानते. चाहे लोकसभा चुनाव में टिकट वितरण का मामला हो या विधानसभा उपचुनाव का मामला. लोकसभा में पूर्णिया का टिकट उन्होंने कांग्रेस से पूछे बगैर बीमा भारती को दे दिया, जो बुरी तरह पराजित हुईं. मगर इसके बाद उन्होंने उन्हीं बीमा भारती को रुपौली विधानसभा उपचुनाव में उतार दिया, जहां से सीपीआइ ने पहले ही चुनाव लडऩे का ऐलान कर दिया था, मगर बाद में सीपीआइ को अपना फैसला वापस लेना पड़ा.

ऐसे में अगर कांग्रेस बिहार में 1990 से पहले वाली स्थिति को हासिल करना चाहती है तो उसे लालू और राजद पर अपनी निर्भरता कम करनी पड़ेगी, अपने संगठन को मजबूत करना पड़ेगा और कम से कम पार्टी को इस स्थिति में लाना पड़ेगा कि वह सीटों के मामले में ही ठीक से सौदेबाजी कर सके. इन तमाम गतिविधियों के बीच राजनैतिक हलकों में ऐसी खबरें भी हैं कि इस बार राजद कांग्रेस को 70 सीटें देने को तैयार नहीं है. वह पार्टी को 35 से 40 सीटें ही देना चाहता है. पार्टी सौदेबाजी की स्थिति में भी नहीं है.

इस सवाल पर अखिलेश प्रसाद सिंह कुछ यूं स्पष्टीकरण देते हैं, "लोकसभा चुनाव के दौरान भी यह कहा जाता था कि कांग्रेस को चार-पांच से ज्यादा सीटें नहीं दी जाएंगी, मगर हमने नौ सीटों पर चुनाव लड़ा. हमने अपने हिसाब से सीटों की अदला-बदली भी की. मगर लालू जी के साथ हमारा लंबा राजनैतिक संबंध रहा है. वे मेरी बात सुनते भी हैं. वर्तमान नेतृत्व भी हमारी बात सुनेगा. इसलिए कांग्रेस के खाते में जितनी सीटें आनी चाहिए, वे जरूर आएंगी. उनकी संख्या 70 से ज्यादा भी हो सकती है, कम भी."

मतलब जाहिर है, अखिलेश प्रसाद सिंह की पोलिटिकल पूंजी लालू और उनके परिवार के साथ उनके राजनैतिक और व्यन्न्तिगत संबंध हैं, जिसकी चर्चा प्रदेश कांग्रेस के नेता भी करते रहे हैं. 

कांग्रेस के केंद्रीय नेता यह कहते रहे हैं कि राहुल गांधी दरअसल अखिलेश प्रसाद सिंह को बहुत पसंद नहीं करते. लोकसभा चुनाव में वे सीटों के बंटवारे को लेकर राजद और खुद सिंह के व्यवहार को लेकर बहुत खुश नहीं थे. मगर बिहार की राजनैतिक व्यावहारिकता है कि वे अभी लालू के साथ बने रहें और इसलिए अखिलेश भी नापसंदगी के बावजूद बिहार कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज हैं.

इस पूरे मसले पर टिप्पणी करते हुए सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी) के निदेशक प्रो. संजय कुमार कहते हैं, "दरअसल, जिन राज्यों में कांग्रेस पहले-दूसरे नंबर से फिसलकर तीसरे नंबर पर चली गई है, वहां उसकी वापसी लगभग मुश्किल हो जाती है. इसलिए बिहार में मुझे कम से कम अगले 10-15 साल तक ऐसी कोई संभावना नहीं दिखती कि कांग्रेस कभी लीड लेने की कोशिश भी करेगी. बिहार में तो इस स्थिति में उसे पहुंचे लंबा अरसा बीत गया है. अब उसके पास बारगेनिंग पावर भी काफी कम है. अगर दिल्ली से तुलना करें तो वहां भी अगर आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें ऑफर कर दी होतीं तो शायद ही वह अकेले लडऩे का फैसला करती. वैसे दिल्ली में पार्टी की लोकल इकाई भी काफी अग्रेसिव है और आम आदमी पार्टी के बहुत खिलाफ भी, इसलिए वहां के लिए कांग्रेस ने अलग लड़ने का फैसला कर लिया. बिहार में अभी वह स्थिति बनती दिखाई नहीं दे रही. इसलिए अगर राजद थोड़ा भी सम्मानजनक समझौता करे तो कांग्रेस साथ रहने में ही अपनी भलाई समझेगी." यानी प्रदेश कांग्रेस को अभी लंबा संघर्ष करना होगा.

क्यों कमजोर होती गई कांग्रेस?

प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति खराब होने के पीछे 1989 के भागलपुर दंगे में पार्टी की ओर से बेहतर स्टैंड न लिए जाने को मुख्य वजह माना जाता है. बिहार में सुनहरे दौर के कांग्रेसी नेता अवधेश कुमार सिंह जो कई बार विधायक और पूर्व में मंत्री भी रह चुके हैं, कहते हैं, "हमारा बुनियादी वोट बैंक दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक समाज था. मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद हम अपने वोटरों को यह समझा नहीं पाए कि हम इसके खिलाफ नहीं हैं. वहीं भागलपुर का दंगा और बाबरी मस्जिद कांड के वक्त भी हमसे कुछ बुनियादी गलतियां हुईं."

वहीं मंडल आयोग के बाद राजद, जद (यू) और लोजपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियों का उभार हुआ. पिछड़ा और दलित वोट इन पार्टियों के साथ हो गया. लालू प्रसाद यादव ने भी सांप्रदायिकता के मसले पर मजबूत स्टैंड लेकर खासकर रथ यात्रा के दौरान लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर उनकी सहानुभूति जीत ली. ऐसे में अलग-थलग पड़ी कांग्रेस को आखिरकार बिहार में राजद की शरण में आना पड़ा.

राज्य में कांग्रेस के काल को तीन हिस्से में बांट सकते हैं. पहला 1990 से पहले का दौर जिसमें पार्टी हमेशा अकेले लड़ती और सम्मानजनक सीटें लाती रही. दूसरा चरण 1990 से 1998 तक का रहा. 1995 में जब पार्टी को सिर्फ 29 सीटें आईं तो 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राजद के आगे समर्पण कर दिया. फिर भी उसकी सीटें घटती रहीं.

2000 से 2010 के बीच हुए तीन विधानसभा चुनावों में पार्टी को क्रमश: 23, 10 और नौ सीटें मिलीं. 2010 में उकता कर पार्टी ने अकेले सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए मगर तब उसे सिर्फ चार सीटें मिलीं. ऐसे में 2015 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने फिर से राजद से तालमेल कर लिया. 2015 में तो पार्टी ने 41 में से 27 सीटें जीतकर सनसनी फैला दी. पर 2020 में उसका प्रदर्शन फिर नीचे चला गया. 

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