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मणिपुर : कैसे अरामबाई तेंगगोल समूह इस राज्य में उग्रवाद का नया नाम बन गया?

अरामबाई तेंगगोल की करतूतों से संकेत मिलता है कि मणिपुर के प्रशासन ने पूरी तरह से हथियार डाल दिए हैं

इंफाल के कांगला फोर्ट में मैतेई सतर्कता समूह अरामबाई तेंगगोल के सदस्य
इंफाल के कांगला फोर्ट में मैतेई सतर्कता समूह अरामबाई तेंगगोल के सदस्य
अपडेटेड 13 फ़रवरी , 2024

मणिपुर आज जब जातीय आधार पर दो संघर्षरत समुदायों मैतेई और कुकी के बीच बंटा हुआ है, तो वास्तविक तथ्य कोरी-कल्पनाओं से अधिक अविश्वसनीय होते जा रहे हैं. 24 जनवरी को खुद को अरामबाई तेंगगोल (यह शब्द भाले लेकर जंग लड़ने वाली पारंपरिक घुड़सवार सेना के लिए इस्तेमाल होता है) कहने वाले एक मैतेई सतर्कता समूह ने मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह सहित 37 मैतेई विधायकों और दो सांसदों को कांगला फोर्ट बुलाया, जो प्राचीनकाल में मैतेई साम्राज्य की सत्ता का केंद्र होता था.

अपने करीब 60,000 स्वयंसेवक होने का दावा करने वाला यह समूह चाहता था कि पार्टी लाइन से इतर जाकर ये सभी निर्वाचित प्रतिनिधि मणिपुर और मैतेई हितों के प्रति अपनी वचनबद्धता जताएं. बीरेन सिंह ने तो इस पर कोई जवाब नहीं दिया लेकिन दो सांसदों और भाजपा के 25 विधायकों के अलावा कांग्रेस के पांच, नेशनल पीपल्स पार्टी के चार, जद (यू) के दो और एक निर्दलीय विधायक कांगला फोर्ट पहुंचे.

किले के गेट पर कोई सुरक्षाकर्मी नहीं बल्कि अरामबाई तेंगगोल के सशस्त्र सदस्य तैनात थे. इससे पूर्व सुबह ही सैन्य पोशाकधारी और हथियार लहराते कुछ युवा खुली छत वाली जिप्सियों में सवार होकर किले में दाखिल हो चुके थे. अरामबाई तेंगगोल सदस्यों ने किले में प्रवेश से पहले विधायकों के सुरक्षा कर्मचारियों को साथ आने से रोक दिया.

उन विधायकों ने एक वचनपत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसमें अरामबाई तेंगगोल की मांगें लिखी थीं. इनमें कुकी विद्रोहियों के साथ सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (एसओओ) समझौता रद्द करना, म्यांमार के शरणार्थियों को मिजोरम निर्वासित करना, 1951 की स्थिति को आधार बनाकर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लागू करना, म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाना और कुकी प्रवासियों को अनुसूचित जनजाति सूची से हटाना शामिल था. बाद में बीरेन सिंह ने भी इस पर हस्ताक्षर किए.

लगता है कि किले के अंदर कुछ और भी भयावह घटित हुआ, जैसा कांग्रेस के संचार प्रमुख जयराम रमेश ने खुलासा किया कि अरामबाई तेंगगोल के सदस्यों ने मणिपुर कांग्रेस अध्यक्ष के. मेघचंद्र पर हमला किया. अन्य स्रोतों में भी ऐसा दावा किया गया कि कुकी के खिलाफ कार्रवाई में राज्य सरकार का समर्थन न करने की वजह से कांग्रेस के दो अन्य विधायकों के साथ भी दुर्व्यवहार किया गया.

अरामबाई तेंगगोल कुछ समय से अपना दायरा और प्रभाव बढ़ाता नजर आ रहा है, खासकर मैतेई-कुकी के संघर्ष तेज होने के बीच. सरकार के हथियार डाल देने के कारण संगठन का मनोबल इस कदर बढ़ जाने से पूरा देश स्तब्ध है. कांगला फोर्ट की बैठक से एक दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय की तीन सदस्यीय टीम इस समूह के साथ बातचीत के लिए इंफाल रवाना हुई थी, जिसने एक तरह से इस समूह की वैधता पर मुहर ही लगाई. 24 जनवरी को अरामबाई तेंगगोल के सदस्य जब अपने घरों को रवाना हुए तो पूरे इंफाल में भीड़ ने उनका उत्साह बढ़ाया.

अरामबाई तेंगगोल म्यांमार के अवैध कुकी प्रवासियों और कुकी उग्रवादी समूहों को लेकर मैतेई समुदाय के बीच असुरक्षा की भावना भड़का रहा है, और यही बात राज्य में पिछले नौ महीने से जारी जातीय संघर्ष के लिए मुख्यत: जिम्मेदार भी है. उधर, कुकी नागरिक समाज संगठन आरोप लगा रहे हैं कि राज्य सरकार समर्थित सशस्त्र संगठन अरामबाई तेंगगोल उनके समुदाय के खिलाफ हिंसा में सबसे आगे है.

हालांकि, दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के ठोस सबूत सामने रखने में नाकाम रहे हैं. मैतई समुदाय के बीच अरामबाई तेंगगोल के बढ़ते प्रभाव को अगर कोई चुनौती दे रहा है तो वह महिला सतर्कता समूह मीरा पैबी है. यह समूह पूर्व में पुलिस और सशस्त्र बलों के अत्याचारों के अलावा नशीली दवाओं और शराब के खिलाफ अभियान चला चुका है. सशस्त्र बलों का आरोप है कि मौजूदा संघर्ष के बीच मीरा पैबी समूह उनके सुरक्षा अभियानों को बाधित करता है. यहां तक, एक बार उन्हें 12 उग्रवादियों को रिहा करने पर भी मजबूर होना पड़ा था.

अपने-अपने समुदाय में बढ़ती एकजुटता को देखकर मणिपुर में दोनों पक्षों के भूमिगत उग्रवादी समूह फिर से संगठित होने लगे हैं. हालिया वर्षों में मणिपुर में सामान्य स्थिति बहाल होने के साथ ही उन्होंने जनता के बीच समर्थन गंवा दिया था. अब, अपने समुदाय के लिए लड़ने के नाम पर उन्होंने खुद को फिर संगठित कर लिया है, और प्रतिद्वंद्वी समुदाय के साथ-साथ सुरक्षा बलों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है. वे बड़े पैमाने पर जबरन वसूली जैसी गतिविधियां भी चला रहे हैं. सुरक्षा सूत्रों का आरोप है कि म्यांमार के जंगलों में छिपे उग्रवादी समूह अपने समुदाय के लिए लड़ने के लिए लौट आए हैं और नागरिकों को प्रशिक्षण भी दे रहे हैं.

राज्य प्रशासन के एकदम नदारद होने जैसी स्थिति ने राज्य को उग्रवाद की उर्वर भूमि बना दिया है. मणिपुर यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर सवाल करते हैं, "नागरिकों की सुरक्षा के लिए यहां कौन है? कुकी क्षेत्रों में मणिपुर पुलिस नदारद है और केंद्रीय सशस्त्र बल मैतेई बहुल क्षेत्रों में निसहाय हैं. इसलिए, लोग सतर्कता समूहों और उग्रवादी गुटों की ओर रुख कर रहे हैं." हथियारों की उपलब्धता समस्या को और बढ़ा रही है.

मई के बाद से भीड़ तकरीबन 5,682 हथियार और 6,50,000 गोले-गोलियां लूट चुकी है, जिसमें से 15 जनवरी तक केवल 1,647 हथियार और करीब 23,000 गोले-गोलियां ही बरामद किए जा सके हैं. उग्रवादी गुट ग्राम रक्षा सेवकों (वीडीवी) के भेष में नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों पर हमले कर रहे हैं, जबकि वीडीवी नागरिकों के ऐसे सशस्त्र समूह हैं जिन्हें जातीय संघर्ष के दौरान गांव की सीमाओं पर बैरकों की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था.

यह बात तब सामने आई जब जनवरी में मोरेह में सुरक्षा बलों को निशाना बनाकर रॉकेट चालित ग्रेनेड दागे गए. 19 जनवरी को मणिपुर के सुरक्षा सलाहकार कुलदीप सिंह ने कहा कि म्यांमार के कुकी उग्रवादी 30 दिसंबर को मणिपुर कमांडो पर हमलों में शामिल हो सकते हैं, जब मोरेह में दो अधिकारियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी और उग्रवादियों तथा वीडीवी के लक्षित हमलों में दो दर्जन से अधिक सुरक्षाकर्मी घायल हो गए थे. इसी तरह, घाटी में सक्रिय उग्रवादियों ने इंफाल और थौबल में असम राइफल्स के जवानों को निशाना बनाया.

मैतेई नागरिक समाज समूहों ने आरोप लगाया है कि 10 जनवरी को मैतेई-बहुल बिष्णुपुर और कुकी-बहुल वाले चुराचांदपुर की सीमा पर चार लकड़हारों की हत्या के पीछे कुकी उग्रवादियों का हाथ था. सुरक्षा सूत्र भी उनके दावे की पुष्टि करते हैं. असम राइफल्स के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, "उनके सिर में एकदम सटाकर गोली मारी गई थी. यह किसी आम नागरिक का काम नहीं हो सकता." इस घटना के बाद ही हरकत में आए अरामबाई तेंगगोल ने निर्वाचित प्रतिनिधियों को बैठक के लिए कांगला फोर्ट बुलाया था. 

कुकी विद्रोहियों के साथ एसओओ समझौता रद्द करने की मांग तेज होने के पीछे भी यही एक बड़ी वजह है. उस समझौते में आत्मसमर्पण करने वाले उग्रवादियों को चिह्नित शिविरों तक ही सीमित रहने का आदेश दिया गया था. मैतेई समूहों का दावा है कि नियमित तौर पर इस प्रावधान का उल्लंघन किया जा रहा है. मसलन, एसओओ समझौते का हिस्सा रहे कुकी रिवोल्यूशनरी आर्मी (यूनाइटेड) के दो सदस्यों में से एक को नवंबर में दो मैतेई लड़कों के अपहरण और हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

मणिपुर में सतर्कता समूहों का उभरना, उनका प्रभावशाली होना और उग्रवाद का फिर से सिर उठाना कानून-व्यवस्था पर काबू पाने में केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों की नाकामी का नतीजा है. दरअसल, प्रशासन ने राज्य में जातीय तनाव का समाधान खोजने के बजाय पूरा नियंत्रण सामुदायिक समूहों और विद्रोहियों के हाथों में सौंप दिया है. यह एक अलग ही तरह की अराजकता का प्रतीक है. अब, जब सभी अपने-अपने हितों को साधने की सोच तक ही सीमित हैं तो मेल-मिलाप और संवाद की गुंजाइश दिन-ब-दिन कम होती जा रही है.

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