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रुपए को लेकर नई रार

बीते 30 साल में पहली बार नेपाल में भारतीय रुपए की कीमत अचानक 5-7 फीसद तक गिर गई है, जिसने सीमा के दोनों तरफ रहने वाले लोगों की मुसीबतें बढ़ा दी हैं. लेकिन ऐसा हुआ क्यों?

साझेदारी पर सवाल भारत-नेपाल सीमा
साझेदारी पर सवाल भारत-नेपाल सीमा
अपडेटेड 4 अगस्त , 2023

बिहार के रक्सौल शहर के पास नेपाल सीमा पर एक बहुत खूबसूरत और भव्य द्वार है. इसका नाम है श्री शंकराचार्य प्रवेश नेपाल द्वार. इसके सामने अक्सर दोनों देशों के सैलानी और नागरिक तस्वीरें खिंचाते हैं. दो माह पहले इस द्वार के सामने आपस में मिलते दो विशाल हाथों का एक शिल्प लगाया गया है. इसमें से एक भारत का हाथ है, तो दूसरा नेपाल का. यह दोनों मुल्कों के बीच उस दोस्ती का प्रतीक है, जिसकी वजह से आज तक दोनों देशों के बीच खुली सीमा है. दोनों तरफ के लोग बिना पासपोर्ट-वीजा या परमिट के जब चाहें एक दूसरे के मुल्क आ-जा सकते हैं. सीमावर्ती इलाकों में लोगों को अपनी जरूरत भर का सामान खरीदने की भी छूट रही है. एक जैसी संस्कृति होने की वजह से दोनों देशों के बीच वैवाहिक रिश्ते भी भरपूर संख्या में होते हैं.

मगर कुछ कदम दूर जैसे ही हम नेपाल के वीरगंज के भंसार (नेपाली भाषा में कस्टम को भंसार कहते हैं) कार्यालय पहुंचते हैं, यह दोस्ती कठिनाई में फंसती नजर आती है. भंसार कार्यालय के सामने बड़ी संख्या में साइकिल सवार अपने कैरियर में चावल, आलू और प्याज की छोटी-छोटी बोरियां फंसाए खड़े दिखते हैं. ये नेपाल के नागरिक हैं, जो भारतीय इलाके से छोटा-मोटा सामान लेकर नेपाल लौट रहे हैं. मगर भंसार कार्यालय के गार्ड इन्हें तब तक नेपाल में प्रवेश देने के लिए तैयार नहीं हैं, जब तक वे इन चीजों का भंसार न कटा लें, यानी सीमा शुल्क न चुका दें. दरअसल, नेपाल सरकार ने इस साल के अपने बजट में यह प्रावधान किया है कि कोई भी व्यक्ति सौ रुपए से ज्यादा का सामान बिना भंसार ड्यूटी चुकाए दूसरे देश से नहीं ला सकता.

भंसार कार्यालय के ठीक पहले अपनी साइकिल के साथ खड़े सुशील कुमार कहते हैं, ''पहले हम लोग आराम से भारत जाकर अपनी जरूरत का सामान ले आते थे, मगर पिछले चार-पांच दिनों से या तो भंसार कटाना पड़ता है, या फिर रिश्वत देनी पड़ती है. अब बताइए, दस किलो आलू लेकर जा रहे हैं, वहां से दो सौ रुपए भारू (भारतीय रुपये) में खरीदे हैं. इस पर तीस-चालीस रुपए भंसार देना पड़ेगा.'' सुशील की ही बगल में खड़े सदानंद एक दूसरी तरकीब लगा रहे हैं. उन्होंने 20 किलो आलू के बोरे के चार छोटे टुकड़े बना लिए हैं और अपने तीन लोगों को बुला लिया है. अब चारों लोग पांच-पांच किलो आलू लेकर चले जाएंगे. भंसार नहीं लगेगा.

मगर यह सुविधा 20 साल के आकाश को नहीं है, जो एक ठेले पर केला लाद कर ले जा रहा है. वह रोज भारत आकर ठेले भर केले अपने देश ले जाता है और दिन भर में बेच लेता है तो ठीक-ठाक कमाई हो जाती है. मगर अब उसे भंसार चुकाना है. वह कहता है, ''भंसार चुका देंगे तो कमाई क्या होगी?''

यह हालत सिर्फ वीरगंज बॉर्डर पर नहीं है. 1,750 किमी की लंबाई में फैली भारत-नेपाल सीमा के हर ट्रेड पॉइंट और भंसार कार्यालय में इन दिनों ऐसी ही हालत दिख रही है. इसमें लगभग 726 किमी की सीमा बिहार राज्य से लगती है. इस बीच में तीन आधिकारिक ट्रेड पॉइंट हैं, रक्सौल-वीरगंज, जोगबनी-विराटनगर और भित्ता मोड़-जनकपुर. इसके अलावा दस ऐसे पॉइंट हैं, जहां से भंसार की रसीद बनवाकर वाहनों को एक से दूसरे देश में जाने-आने की इजाजत है. बाकी खुली सीमा होने की वजह से दोनों मुल्कों के बीच सैकड़ों रास्ते हैं, आने-जाने के. इनमें से कुछ रास्तों पर सीमा सुरक्षा बल की निगरानी रहती है, कुछ पर नहीं. सीमा से सटे रक्सौल, घोड़ासहन, बैरगनिया, जयनगर, भीमनगर और जोगबनी जैसे कस्बाई बाजार तो नेपाली ग्राहकों की वजह से ही विकसित हुए हैं. रक्सौल के एक बड़े कारोबारी महेशचंद्र अग्रवाल बताते हैं, ''इन सीमावर्ती कस्बों में नेपाल की वजह से रोजाना सौ से सवा सौ करोड़ रुपए का व्यापार होता रहा है और इसके जरिए रोज भारत में इतनी ही नेपाली करेंसी भी आती है.''

मगर इन दिनों ये तमाम बाजार सूने नजर आते हैं. रक्सौल के बैंक रोड बाजार में कपड़े, किराना, इलेक्ट्रॉनिक, बर्तन आदि की दुकानें बड़ी संख्या में हैं. नेपाल के सीमा से सटे इलाकों के लोग हमेशा बड़ी संख्या में खरीदारी करने आते हैं. मगर इन दिनों यहां सन्नाटा है. एक कपड़ा व्यापारी दिलीप कुमार बताते हैं, ''खास तौर पर शादियों के सीजन में तो इन गलियों से गुजरना मुश्किल हो जाता था, इतनी भीड़ होती थी. अभी भी शादी का सीजन ही चल रहा है, मगर आज सुबह से पूरे बाजार में दस नेपाली ग्राहक भी नजर नहीं आए.''

पूर्वी चंपारण के ढाका थाना की सीमावर्ती पंचायत चंदनबारा के मुखिया जईमुर रहमान एक अलग तरह की शिकायत करते हैं. वे कहते हैं, ''हाल के दिनों में नेपाली पुलिस का व्यवहार एकाएक बदल गया है. अब उसमें पहले जैसा दोस्ताना रवैया नजर नहीं आता. पिछले दिनों मैं अपने एक रिश्तेदार को मिट्टी देने नेपाल की तरफ जा रहा था. मगर बॉर्डर पर नेपाली पुलिस ने हमें रोक दिया और कहा कि कार लेकर आप नेपाल नहीं जा सकते जबकि मैं हमेशा इस रूट से अपनी कार से ही जाता रहा हूं.''

भारतीय रुपए में 5-7 फीसद गिरावट

भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों के बाजार में भीषण मंदी छा जाना एक मसला तो है. लेकिन इन इलाकों में भारतीय मुद्रा की कीमतों में अचानक गिरावट आना नई मुसीबत है. किसी को इसकी सही वजह समझ नहीं आ रही.

रक्सौल के व्यापारी महेशचंद्र अग्रवाल इस बात को कुछ इस तरह साफ करते हैं, ''भारत और नेपाल की मुद्राओं का विनिमय दर 1993 से एक सौ रुपए भारतीय मुद्रा के बदले 160 रुपए नेपाली मुद्रा फिक्स है. वैसे तो सरकारी दर तय है, मगर व्यावहारिक रूप से भारतीय मुद्रा ज्यादा मजबूत रहती है. इसलिए हमें 160 रुपए के बदले प्रति सौ रुपए 162 नेपाली रुपए तक मिलते रहे हैं. मगर पिछले दो महीने से अचानक यह सिस्टम पलट गया है. अब लोकल एक्सचेंज वाले सौ रुपए भारतीय मुद्रा के बदले 153 से 157 रुपए के बीच ही नेपाली मुद्रा दे रहे हैं.''

यह एक अलग तरह की मुसीबत है और इसका असर जयनगर बाजार में अपने भारतीय रुपयों के बदले नेपाली रुपए हासिल कर रहे बलभद्र यादव के चेहरे पर दिखता है. यही कोई 55-60 के बीच की वय के बलभद्र सवा नौ बजे की ट्रेन से अपनी बेटी के ससुराल नेपाल के महिनाथपुर जा रहे हैं. उन्होंने स्टेशन के पास बैठे एक एजेंट से 2,000 भारतीय रुपए बदलवाए हैं, जिसके बदले उन्हें सिर्फ 3,100 नेपाली रुपए मिले. वे कहते हैं, ''हम इससे पहले कभी पैसे बदलवाकर नेपाल नहीं गए. नेपाल में हर जगह भारतीय रुपया चलता था. मगर बेटी बोल रही है कि कोई दुकानदार अब वहां भारतीय रुपया लेने को तैयार नहीं.''

बलभद्र की तरह जनकपुर धाम की ट्रेन पर सवार ज्यादातर यात्रियों ने पैसे जयनगर स्टेशन पर ही बदलवा लिए. इनमें अधिकतर तीर्थयात्री हैं, जो जनकपुर धाम के जानकी मंदिर में पूजा-पाठ करने जा रहे हैं.

जनकपुर धाम पहुंचते ही यह सचाई साफ नजर आती है. फूल, प्रसाद, भोजन, यहां तक कि पार्किंग शुल्क लेने वाला भी भारतीय मुद्रा लेने के लिए तैयार नहीं जबकि इसी नेपाल में 1957 से पहले तक भारतीय और नेपाली दोनों मुद्राएं सरकारी तौर पर वैध मानी जाती थीं. 

जनकपुर से वीरगंज की तरफ जाने वाले नेपाल के राजमार्ग पर 139 किमी लंबी यात्रा करते हुए पेट्रोल पंपों और दुकानों पर जगह-जगह पोस्टर लगे दिखते हैं. 'भारू पैसा बंद'. 'इंडियन रुपया नहीं चलेगा'. थोड़ी दूर जाने पर एक भारतीय कार को नेपाल की ट्रैफिक पुलिस ने रोक रखा है. वह बिना भंसार (परमिट) दिए किसी अवैध रास्ते से नेपाल की सीमा में घुस आई है. उस पर तीन हजार नेपाली रुपए का फाइन लगा है. गाड़ी मालिक पांच-पांच सौ के भारतीय नोट निकालता है, नेपाली पुलिस के जवान कहते हैं, ''नहीं चलेगा. नेपाली रुपया दो या गाड़ी सीज हो जाएगी.''

मुश्किल की वजह तस्करी है?

जयनगर में रहने वाले भारतीय पत्रकार ललित झा ने नेपाली वेबपोर्टल हिमालिनी पर इस मसले पर एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी है. वे कहते हैं, ''वैसे तो इसकी बहुत साफ वजह समझ नहीं आती. मगर एक बात साफ है कि नेपाल से कोई न कोई चीज बड़े पैमाने पर तस्करी के माध्यम से भारत आ रही है, जिसके बदले में उतनी ही मात्रा में भारतीय रुपया अवैध तरीके से नेपाल जा रहा है. मेरे हिसाब से हाल के दिनों में सोना बड़े पैमाने पर नेपाल से भारत चोरी-छिपे आ रहा है. खास तौर पर 2,000 रुपए के नोट को बंद करने की घोषणा के बाद से ऐसी घटनाएं बढ़ गई हैं.''

हालांकि सभी लोग इस बात से सहमत नहीं कि सिर्फ सोने की तस्करी की वजह से ऐसा हुआ है. रक्सौल के व्यापारी महेशचंद्र अग्रवाल जो सीमा जागरण मंच के भी प्रदेश अध्यक्ष हैं, कहते हैं, ''मेरा मानना है कि सोने से ज्यादा तस्करी नशीले पदार्थों की हो रही है. सरकार को इस बारे में तफ्तीश करानी चाहिए.''

हालांकि जब बिहार की आर्थिक अपराध इकाई के एक वरिष्ठ अधिकारी से इस बारे में पूछा जाता है तो वे कहते हैं, ''नेपाल से नारकोटिक्स के मामले तो इतने नहीं हैं. हां, जाली नोटों की जब्ती होती है, मगर उसकी मात्रा भी इतनी अधिक नहीं होती कि करेंसी की कीमत पर असर पड़े. नोटबंदी और सोने की तस्करी की बात ही सचाई के करीब लगती है. हालांकि फिलहाल हम आधिकारिक रूप से कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं.''

करेंसी एक्सचेंज की वैध सुविधा नहीं

यह भी माना जा रहा है कि सीमावर्ती इलाके में नेपाल की करेंसी बदलने की किसी आधिकारिक संस्था के अभाव में भी ऐसा हो रहा है. अग्रवाल कहते हैं, ''नेपाल से बिहार के इलाकों में रोज तकरीबन सौ से सवा सौ करोड़ की नेपाली करेंसी आती है. मगर पूरे सीमावर्ती क्षेत्र में एक भी बैंक इस करेंसी को बदलने के लिए अधिकृत नहीं है. ऐसे में हर जगह इस करेंसी को बदलने वाले अवैध एजेंट तैयार हो गए हैं.''

अग्रवाल यह भी दावा करते हैं कि 2015 से पहले तक आरबीआइ ने ही इसकी इजाजत यहां के बैंकों को नहीं दी थी. 2015 में भूकंप के बाद जब इसकी इजाजत मिली तब कुछ दिनों तक यहां के बैंकों ने करेंसी एक्सचेंज की, मगर फिर सब बंद हो गया. हालांकि इस बारे में जयनगर के भारतीय स्टेट बैंक के शाखा प्रबंधक सौरभ कुमार कहते हैं, ''आरबीआइ ने सिर्फ ए-ग्रेड के बैंकों को ही करेंसी एक्सचेंज करने की सुविधा दी है. पूरे उत्तर बिहार में सिर्फ मुजफ्फरपुर में ऐसी शाखा है. मेरी जानकारी में यहां के बैंकों को कभी करेंसी एक्सचेंज करने की इजाजत नहीं रही है.''

रक्सौल और जयनगर दोनों जगह छोटी-छोटी मेज पर दोनों देशों की करेंसी लेकर बैठने वाले एजेंट दर्जनों के हिसाब से नजर आते हैं. जयनगर स्टेशन परिसर में बाहर पार्किंग के पास बैठे ओमप्रकाश पिछले दस साल से यही काम कर रहे हैं. वे कहते हैं, ''करेंसी का रेट बड़े लोग तय करते हैं. हम तो बस उनसे पैसे लेकर एक-दो परसेंट पर अपना कारोबार करते हैं.''

लेकिन ये बड़े लोग कौन हैं? ओमप्रकाश बताने से इनकार कर देते हैं. जयनगर बाजार में एक फॉरेन मनी एक्सचेंज की दुकान जरूर है मगर दिलचस्प बात यह है कि वहां सिर्फ खाड़ी देशों की मुद्रा और डॉलर ही एक्सचेंज किए जाते हैं. वहां के मालिक कहते हैं, ''जब यहां के बैंक ही नेपाली करेंसी नहीं लेते तो हम कैसे एक्सचेंज करें?''

नेपाल की भी मजबूरी है

नेपाल-भारत सीमावर्ती मामलों के जानकार और नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकिशोर कहते हैं, ''इस पूरे मामले को नेपाल की निगाह से भी देखा जाना चाहिए. जब तक नेपाल के सीमावर्ती इलाके के लोग भारत के बाजार पर निर्भर रहेंगे, नेपाल में व्यापार विकसित नहीं हो पाएगा. इसी वजह से नेपाल के व्यापारियों की मांग पर नेपाल सरकार ने सौ रुपए से अधिक का सामान लाने पर भंसार चुकाने का आदेश जारी किया है. इन दिनों भारतीय रुपया भारी मात्रा में डंप हो गया है. नेपाल के कारोबारी परेशान हैं कि इसे कैसे बदला जाए. भारत सरकार को इस बारे में भी सोचना चाहिए, तभी मुसीबतें दूर होंगी.''

रोटी-बेटी के रिश्ते निभाने वाले भारत और नेपाल के आम लोगों के लिए यह अचानक आई मुसीबत है, जिसका फिलहाल उनके पास कोई हल नहीं है.''

रिश्ता करेंसी का

î1957 से पहले नेपाल में भारत और नेपाल दोनों की मुद्राएं चलती थीं

î1957 में नेपाल राष्ट्र बैंक की स्थापना के बाद वहां दोहरी मुद्रा की व्यवस्था को खत्म कर दिया गया और नेपाल में सिर्फ नेपाली मुद्रा ही लीगल करेंसी रही

îउस वक्त पेगिंग के जरिए भारत और नेपाल की करेंसी का एक्सचेंज रेट भारतीय 100 रुपए के बदले नेपाली 160 रुपए तक कर दिया गया

îहालांकि समय-समय पर पेगिंग की दर में बदलाव भी होते रहे. 1966 में यह 100 रुपए भारतीय मुद्रा के बदले 101 रुपए नेपाली मुद्रा तक चला गया था. मगर फिर जल्द ही यह 100 रुपए भारतीय मुद्रा के बदले 160 रुपए नेपाली मुद्रा पर पहुंच गया

î1993 से दोनों मुद्राओं का पेगिंग रेट पूरी तरह स्थिर है

îदोनों देशों के सीमावर्ती इलाकों में ऐसी कोई सरकारी एजेंसी नहीं है जो करेंसी एक्सचेंज की सुविधा दे. ऐसे में बड़े पैमाने पर अवैध एजेंटों का नेटवर्क विकसित हो गया है

îएजेंट रोज अपने हिसाब से मुद्रा विनिमय की दर तय करते हैं

î2023 के मार्च-अप्रैल महीने में पहली दफा ऐसा हुआ कि पिछले तीस साल में भारतीय मुद्रा की विनिमय दर घटी

îनेपाल की कई दुकानों पर ऐसे पोस्टर लगे हैं कि 'भारतीय मुद्रा नहीं ली जाएगी'

îअब 100 रुपए भारतीय मुद्रा के बदले 150 रुपए नेपाली मुद्रा ही दी जाती है

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