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सेक्स सर्वे 2017: आओ, कुछ सेक्स की बात करें

सेक्स अब लोगों के जीवन में दबाने-छिपाने की चीज नहीं रही, न बेवफाई कोई खास बेचैन करने वाली बात, और रिश्तों का टूटना सुखद आजादी का एहसास बना, लब्बोलुबाब यह कि सेक्स को लेकर खुलापन अब हुआ आम.

सेक्स को लेकर खुलापन अब हुआ आम
सेक्स को लेकर खुलापन अब हुआ आम
अपडेटेड 15 मार्च , 2017
यह विशुद्ध संयोग है कि 15 साल पहले इंडिया टुडे ने सेक्स पर अपना पहला सर्वेक्षण प्रकाशित किया था और ब्रिटेन से भारत आकर एक मनोचिकित्सक के रूप में काम करते हुए मुझे भी इतने ही साल हो गए. सर्वेक्षणों में सामाजिक रुझानों के व्यापक परिदृश्य का अंदाजा लगाने के लिए लोगों से बेहद गोपनीय और निजी बातचीत की जाती है. इसके विपरीत अपने मरीजों के साथ मेरी बातचीत बेहद व्यक्तिगत, अंतरंग होती है और उनकी धारणाएं गहराई तक धंसी हुई होती हैं. सेक्स के बारे में बात करना आसान नहीं है, लेकिन शायद एकांत और गोपनीयता का पन्न्का भरोसा होने पर लोग झिझक छोड़कर अपनी अंतरंग बातें, अपनी दुविधाएं, हसरतें और आशंकाओं को जाहिर कर देते हैं.

मेरे ऊपर भरोसा करके लोगों ने मुझसे जो बातचीत की, वह बीते वर्षों में बदलती सामाजिक मान्यताओं और मूल्यों की कहानी है. तब और अब के बीच सबसे बड़ा अंतर जो देखने को मिला है, वह यह है कि महिलाएं अब अपनी कामुकता और अपनी अतृप्त इच्छाओं के बारे में खुलकर बात करने लगी हैं. मैंने 15 साल पहले भारत में जब काम करना शुरू किया था तो ऐसा नहीं था. अब मैं ऐसी कई महिलाओं से मिलता हूं जिन्हें यह स्वीकार करने में जरा भी झेंप नहीं होती कि वे अपने साथी के साथ सेक्स के मामले में संतुष्ट नहीं हैं या उनके विवाहेतर संबंध हैं, क्योंकि पतियों से उन्हें सेक्स में संतुष्टि नहीं होती. वे मेरे पास यह पूछने के लिए आती हैं कि वे सही हैं या नहीं. जो बातचीत आज से 15 साल पहले बेहद मुश्किल हो सकती थी, वह अब बड़ी सहजता के साथ खुलकर होती है.

इसके उलट, मैं बहुत ऐसे युवा दंपतियों से भी मिलता हूं जो सेक्स-विहीन विवाह में प्रत्यक्ष रूप से काफी संतुष्ट हैं. इनमें से ज्यादातर शादी से पहले एक-दूसरे से प्यार करते थे और उनके विवाह को 5 से 15 साल हो चुके थे. वे एक-दूसरे के साथ बिल्कुल खुश हैं, पारिवारिक जीवन अच्छी तरह से व्यतीत कर रहे हैं, लेकिन काम के बोझ और पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त होने के कारण सेक्स के प्रति उनमें न तो ज्यादा रुचि है, न ही ऊर्जा. शायद वजह यह है कि उनका ध्यान करियर पर बहुत ज्यादा है. काम का बोझ उनकी सेक्स की ताकत को चूसता जा रहा है और सेक्स के लिए उनके पास समय और ऊर्जा का अभाव है.

यौन उत्पीडऩ और जोर-जबरदस्ती पर बात करना अब उतनी शर्मिंदगी वाला नहीं माना जाता, जितना पहले माना जाता था. पिंक जैसी फिल्में और दिल दहला देने वाले निर्भया कांड के बाद हुए आंदोलन ने इस मसले पर बात को सहज बनाने में मुख्य भूमिका निभाई है. इससे हमारी सोच बदली है और अब यौन उत्पीडऩ की शिकार महिला को दोषी नहीं माना जाता.  

पिछले 15 वर्षों में लैंगिक विविधता के बारे में भी लोगों की सोच बदली है. पुरुष समलैंगिकों, स्त्री समलैंगिकों, किन्नरों वगैरह ने मुझ पर भरोसा करते हुए सेक्स के बारे में अपनी रुचियों, हसरतों, हताशा और परेशानियों को लेकर खुलकर बातें की हैं. दुर्भाग्य से हमारा समाज आज भी ऐसे लोगों को बारे में रूढ़ और पाखंडी बना हुआ है. एक समाज के तौर पर हम अभी बदले नहीं हैं, लेकिन कम से कम मीडिया कवरेज और सेक्स की दृष्टि से अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करने वाले निर्भीक संगठनों ने उन्हें एक आवाज दी है. अब वे बंद दरवाजों से बाहर आ रहे हैं और अपने जैसों के बीच एकजुटता का अनुभव कर रहे हैं.

सोशल मीडिया पर नेटवर्किंग ने उनके जीवन में गुणात्मक अंतर ला दिया है. सोशल मीडिया पर मित्रता करने से उनकी वास्तविक जिंदगी में बड़ा बदलाव आया है, जो उस वक्त अकल्पनीय था, जब इंडिया टुडे ने सेक्स पर अपना पहला सर्वेक्षण किया था. अब मेरे पास बहुत से किन्नर बच्चे और युवा अपने माता-पिता, यहां तक कि दादा-दादी को साथ लेकर आते हैं और मुझसे परामर्श लेते हैं कि वे अपनी नई पहचान को किस तरह स्वीकार करें. 17 साल के एक युवा (जो शरीर से पुरुष है) ने  एक बार इच्छा जाहिर की कि वह एक शादी में घाघरा-चोली पहनना चाहता है, जिसे उसकी दादी ने साफ-साफ मना कर दिया, लेकिन उन्होंने उसे हल्की लिपिस्टिक लगाने की इजाजत जरूर दे दी.

सोशल मीडिया और स्मार्टफोन ने हमारे सेक्स जीवन पर सबसे बड़ा असर डाला है. कामुक चित्रों और वीडियो का आदान-प्रदान आम बात हो गई है. जब मैंने एक लड़की से पूछा कि उसे हस्तमैथुन का वीडियो अपने बॉयफ्रेंड को भेजते क्या डर नहीं लगा? उसका जवाब था कि उसने वीडियो बनाते समय चेहरा छिपा लिया था. लेकिन, अश्लील दृश्यों के जरिए किसी को परेशान करने की घटनाएं भी बढ़ गई हैं. अब मेरे पास ऐसे लोग भी आते हैं जो बेहद परेशान हैं और आत्महत्या करना चाहते हैं, क्योंकि सेक्स के अंतरंग दृश्यों को इंटरनेट पर चलाया जा रहा है.

बहरहाल, मैंने इन 15 वर्षों में सबसे बड़ा बदलाव यह देखा है कि साथी की वफादारी के बारे में नजरिया काफी बदला है. कोलकाता में मेरा कार्यालय सॉफ्टवेयर केंद्र के बहुत नजदीक है. मैं अक्सर ही कॉलसेंटर या आइटी कंपनियों में काम करने वाले युवक-युवतियों से मिलता रहता हूं. इनमें से ज्यादातर लड़के-लड़कियां परिवार और माता-पिता की नजरों से दूर अकेले रहते हैं.

उनके बीच जिस तरह से आकस्मिक सेक्स, रंगरेलियां और ''मतलब की यारी" चलती रहती है, वह शोभा डे जैसी लेखिकाओं के लिए अच्छी सामग्री हो सकती है. मैंने महसूस किया है कि युवा और शहरी भारतीय अब ''विवाह के बाद ही सेक्स" के विचार से बहुत आगे बढ़ चुके हैं. हालांकि सेक्स में इस स्वच्छंदता की कीमत भी चुकानी पड़ती है. अक्सर नौजवान भ्रमित होते हैं और अपने नादानी के कारण कभी-कभी उन्हें समस्याओं का सामना भी करना पड़ जाता है.

अंत में, अगर मुझे 15 साल बाद दोबारा बदलावों के बारे में लिखने का अवसर मिला तो मैं उनके बारे में बताना चाहूंगा. अब सेक्स शिक्षा बहुत जरूरी हो गई है, ताकि युवा पीढ़ी उसे ठीक से समझ सके और यौन उत्पीडऩ तथा अज्ञानतावश सेक्स की आजादी का खामियाजा भुगतने से बच सके. हम इसे बड़े स्तर पर लागू करने का इंतजार नहीं कर सकते. सेक्स की विविधता को स्वीकार करना और रूढ़िवादी लैंगिक सोच को बदलना जरूरी हो गया है. हम अब इस तरह के सोच की अनदेखी नहीं कर सकते. आशा है कि अगले 15 वर्षों में हम इनमें से बहुत-सी वर्जनाओं को तोड़ते हुए आगे निकल जाएंगे.

(निमहांस, बेंगलूरू से एमडी और ब्रिटेन से एमआरसीपी (साइक) की डिग्रियां हासिल करने वाले डॉ. जय रंजन राम मनोचिकित्सा में जोर-जबरदस्ती के खिलाफ हैं. वे कोलकाता में धर्मार्थ मेंटल हेल्थ फाउंडेशन चलाते हैं.)
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