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जानें यूपी पुलिस भर्ती में गड़बड़ी की पूरी हकीकत

यूपी की सपा सरकार पर छाया घोटाले का जिन्न. पुलिस भर्ती प्रक्रिया में गड़बडिय़ों के खिलाफ प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन

अपडेटेड 31 मार्च , 2015
समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार में पुलिस भर्ती घोटाले का जिन्न क्या एक बार फिर बाहर निकल आया है? 'उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड' का तौर-तरीका तो इसी ओर इशारा कर रहा है. जरा बानगी देखें:
  • 16 मार्च को बोर्ड ने दरोगा भर्ती का नतीजा घोषित किया. इसमें अजय कुमार सिंह यादव, (रोल नंबर: 412010691) को ओबीसी श्रेणी का होने के बावजूद 313.4167 अंक के साथ सामान्य श्रेणी में चयनित हुआ दिखाया गया. हकीकत में सामान्य श्रेणी का कटऑफ 332.9167 अंक था. ऐसी ही अन्य गड़बडिय़ों को लेकर जब अभ्यर्थियों का गुस्सा फूटा तो बोर्ड ने गुपचुप ढंग से अपनी वेबसाइट पर जारी सूचनाओं में 23 मार्च की सुबह फेरबदल कर दिया. अभी तक केवल ओबीसी श्रेणी के अभ्यर्थी रहे अजय कुमार सिंह को बोर्ड ने 'स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का आश्रित' (डीएफएफ) के तहत क्षैतिज आरक्षण का लाभार्थी बता दिया. (इंडिया टुडे के पास दोनों नतीजों के स्क्रीन शॉट मौजूद हैं) सवाल उठता है कि अगर ओबीसी अभ्यर्थी अजय कुमार सिंह यादव स्वतंत्रता संग्राम श्रेणी में चयनित हुए थे तो बोर्ड ने पूरी जानकारी 16 मार्च को ही क्यों नहीं दी?
  • दरोगा भर्ती का नतीजा घोषित करने के दो दिन बाद 19 मार्च को बोर्ड ने सिपाही और समकक्ष भर्ती में मेडिकल के लिए चयनित अभ्यर्थियों की सूचना अचानक अपनी वेबसाइट पर डाल दी. इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि सामान्य वर्ग की वही महिला मेडिकल के लिए चयनित की गई है, जिसे न्यूनतम अंक यानी कट ऑफ 182.5526 से ज्यादा अंक मिले हों. अगले दिन ही महिला अभ्यर्थियों ने विधानसभा मार्ग स्थित बोर्ड दफ्तर पर धावा बोल दिया. आजमगढ़ की रीता सिंह, सुषमा शुक्ला, लखनऊ की डॉली शुक्ला, प्रेमा पाठक समेत दो सौ से अधिक महिला अभ्यर्थी दो सौ से अधिक अंक पाने के बाद भी अगले चरण के लिए सफल नहीं हुई थीं. अचानक बवाल बढ़ गया और पूरे प्रदेश में आगजनी, प्रदर्शन होने लगे. दो दिन बाद 22 मार्च को बोर्ड ने फिर अपने नतीजों में संशोधन किया. अब बताया गया कि पूर्व घोषित कटऑफ अंक 182.5526 उन सामान्य महिला अभ्यर्थियों के लिए है, जो होमगार्ड श्रेणी के क्षैतिज आरक्षण के अंतर्गत आती हैं. अब अन्य सामान्य महिला अभ्यर्थियों के लिए नया कटऑफ 288.9353 घोषित कर दिया गया. 
  • एटा की रहने वाली कुमारी बेबी (रोल नंबर: 3231751) का दावा है कि उन्होंने दौड़ में 100 में से 80 और लिखित परीक्षा में 179 अंक प्राप्त किए थे. ओबीसी श्रेणी की कुमारी बेबी ने कुल 259 अंक पाए, जो इस श्रेणी के कटऑफ 210.6376 से कहीं अधिक है. बावजूद इसके इन्हें अगले चरण की सिपाही भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया. एक और अभ्यर्थी, गोंडा की ममता वर्मा कहती हैं, ''बोर्ड ने दौड़ और मुक्चय परीक्षा के अंक अपनी वेबसाइट पर घोषित नहीं किए हैं. इससे बड़े पैमाने पर हेरफेर की आशंका है. '' कुमारी बेबी जैसे हजारों अभ्यर्थी कटऑफ से अधिक अंक पाने के बावजूद पीछे रहे गए हैं.
यूपी पुलिस अभ्यर्थी नाराजसिपाही और समकक्ष के 41,610 पदों के लिए 22 लाख से अधिक आवेदनकर्ताओं के साथ देश की सबसे बड़ी भर्ती परीक्षा आयोजित कर रहे 'उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड' की कार्यप्रणाली अब सवालों के घेरे में है. 16 मार्च को दरोगा भर्ती परीक्षा का परिणाम घोषित होने के बाद अभ्यर्थियों में फैला असंतोष तीन दिन बाद सिपाही भर्ती परीक्षा में मेडिकल के लिए चयनित अभ्यर्थियों के नतीजे आने के साथ भड़क उठा. अभ्यर्थियों ने पूरे प्रदेश में हिंसक प्रदर्शन शुरू कर दिए (देखें बॉक्स). मुलायम सिंह यादव के पिछले कार्यकाल में हुई 20,000 सिपाहियों की भर्ती 2007 में बीएसपी की सरकार आने के बाद घोटालों के आरोपों और विवादों में घिर गई थी. अब एक बार फिर सपा सरकार के दामन पर विवादों के दाग गहराने लगे हैं. 

लगातार बदले गए नियम
15 जुलाई, 2011 में तत्कालीन बीएसपी सरकार ने पुलिस आरक्षी (सिपाही) और प्रादेशिक आर्म्ड कांस्टेबुलरी (पीएसी) आरक्षी के कुल 41,610 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरू की थी. ठीक आठ महीने बाद मार्च, 2012 में सपा के सत्तारूढ़ होते ही इस भर्ती प्रक्रिया को रद्द कर 2013 से नए सिरे से यह कवायद शुरू हुई. बीएसपी सरकार के दौरान हुई पुलिस भर्ती में अभ्यर्थियों के अभिलेखों के सत्यापन और मेडिकल के बाद लिखित परीक्षा के अंकों के आधार पर मेरिट बनी थी, लेकिन अखिलेश सरकार ने पहले प्रारंभिक लिखित परीक्षा रखी. इसके बाद मुख्य परीक्षा हुई. मेडिकल और अभिलेखों की जांच सबसे बाद में रखी गई. महिला और पुरुष अभ्यर्थियों के दौड़ के मानक भी बदले गए. 

पहले सिपाही भर्ती की प्रारंभिक परीक्षा 27 अक्तूबर, 2013 में प्रस्तावित थी, लेकिन चार दिन पहले प्रश्नपत्र ला रहे ट्रक के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के बाद अचानक परीक्षा की तिथि दो महीने आगे बढ़ा दी गई. हरदोई के एक अभ्यर्थी प्रतीक दीक्षित कहते हैं, ''बोर्ड ने इसकी कोई जानकारी नहीं दी कि ट्रक कहां दुर्घटनाग्रस्त हुआ था और इस मामले में क्या कहीं कोई मुकदमा भी दर्ज हुआ था? इसी से संदेह उठता है. '' 

2011 में बीएसपी सरकार ने 4,010 दरोगाओं और पीएसी के प्लाटून कमांडर की भर्ती प्रकिया भी शुरू की थी. सपा सरकार ने इसकी भी नियमावली बदली, पर कोर्ट के आदेश पर पुराने नियमों से ही परीक्षा पूरी करनी पड़ी. बीएसपी प्रदेश प्रवक्ता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, ''सपा घोटालों की सरकार है. पुलिस भर्ती में व्यापम घोटाले से बड़ा घोटाला हुआ है. ''


सॉल्वर पर खामोशी से संदेह
एसटीएफ ने पिछले साल सिपाही भर्ती की मुख्य परीक्षा के दौरान कानपुर, बरेली, झांसी, आगरा और गौतमबुद्घ नगर से आठ सॉल्वर समेत डेढ़ दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया था. परीक्षा में सेंध लगाने में राजस्थान के अशोक कुमार विश्नोई गिरोह की भूमिका सामने आई. इसके बाद भर्ती बोर्ड ने पहली बार 'बायोमीट्रिक सिग्नेचर' की व्यवस्था की. सॉल्वर गैंग ने इसका भी तोड़ निकाल लिया. वे असली अभ्यर्थी के अंगूठे के निशान वाली प्लास्टिक की झिल्ली लगाकर परीक्षा देने आए. सिपाही भर्ती प्रक्रिया में शामिल लखनऊ निवासी अमित यादव मुख्य परीक्षा में एक गड़बड़ी की ओर इशारा करते हैं, ''मुख्य परीक्षा में अगल-बगल के परीक्षार्थियों के प्रश्नपत्रों में प्रश्नों की सीरीज एक ही थी. हालांकि यह पीछे बैठे अभ्यर्थियों से भिन्न थी, लेकिन पीछे के अगल-बगल के अभ्यर्थियों की सीरीज एक ही थी. यह व्यवस्था सॉल्वरों के लिए बिलकुल मुफीद थी. '' सॉल्वरों के पकड़े जाने के बाद आज तक भर्ती बोर्ड उनकी पड़ताल नहीं कर पाया. 'उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड' के चेयरमैन वी.के. गुप्ता भी इस बारे में किसी जानकारी से इंकार करते हैं.

व्हाइटनर पर हीलाहवाली
दरोगा और सिपाही, दोनों भर्ती परीक्षाओं में ओएमआर शीट पर व्हाइटनर का प्रयोग पूरी तरह वर्जित था. ऐसा करने पर अभ्यर्थन निरस्त करने की चेतावनी उत्तर पुस्तिका की ओएमआर शीट पर लिखी थी. भूलवश किसी अभ्यर्थी ने ओएमआर शीट पर गलत उत्तर भर दिया हो तो उसे बदलने की गुंजाइश नहीं थी. बावजूद इसके व्हाइटनर लगी शीट जांची गई. हाइकोर्ट के आदेश पर 24 मार्च को अदालत के सामने ऐसी आठ शीट पेश की गईं, जिनमें व्हाइटनर का प्रयोग किया गया था. इसके बाद हाइकोर्ट ने दरोगा भर्ती प्रक्रिया पर फौरन रोक लगा दी.

हाइकोर्ट में अभ्यर्थियों की पैरवी करने वाले वकील शैलेंद्र सिंह कहते हैं, ''भर्ती बोर्ड अपने ही बनाए नियमों का पालन नहीं कर रहा. बोर्ड को बताना चाहिए कि व्हाइटनर के प्रयोग के चलते कितनी शीट निरस्त हुईं. '' सपा सरकार बनने के बाद से युवाओं की ओर से सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अब मिली है. घोटाले के विरोध में उतरे लाखों युवाओं की नाराजगी अखिलेश कैसे दूर करते हैं, यही बात युवा नेता के रूप में उनका कद तय करेगी. 
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