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जस्टिस सुनीता अग्रवाल: कानूनी नुक्तों और सामाजिक सच्चाइयों के बीच संतुलन बिठाने वाली जज

2020 में जब उत्तर प्रदेश पुलिस ने कुछ लोगों को कोविड-19 प्रोटोकॉल का उल्लंघन कर खाने के पैकेट बांटने के आरोप में गिरफ्तार किया तो जस्टिस अग्रवाल ने उनकी रिहाई का आदेश दिया

जस्टिस सुनीता अग्रवाल, मुख्य न्यायाधीश, गुजरात हाइकोर्ट
अपडेटेड 11 जनवरी , 2024

जस्टिस सुनीता अग्रवाल ने जब इस साल जुलाई में गुजरात हाइकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली, तो वे उस समय देश के 25 हाइकोर्टों में से किसी एक का शीर्ष पद संभालने वाली एकमात्र महिला न्यायाधीश बन गईं. गुजरात में चीफ जस्टिस के पद पर काबिज होने वाली दूसरी महिला बनने की उपलब्धि भी उनके खाते में दर्ज हो गई. जस्टिस अग्रवाल की इस उपलब्धि का महत्व इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि भारत में सभी हाइकोर्टों के न्यायाधीशों में केवल 13 फीसद महिलाएं हैं.

हालांकि जस्टिस अग्रवाल को उम्मीद है कि नई पीढ़ी की और महिलाएं भी तमाम बाधाओं को तोड़कर इस क्षेत्र में आगे आएंगी. गुजरात रवाना होने से पहले इलाहाबाद हाइकोर्ट में दिए अपने विदाई भाषण में जस्टिस अग्रवाल ने कानून क्षेत्र की युवा महिला प्रोफेशनल्स से कहा कि वे किसी को यह बोलने का मौका न दें: वे क्या हासिल कर सकती हैं, क्या नहीं. उन्होंने इन महिलाओं से कड़ी मेहनत करने, आत्मविश्वास बनाए रखने और बाहरी प्रभावों के आगे न झुकने की अपील करते हुए कहा, "दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो आप कुछ भी हासिल कर सकती हैं. मैं यह कर सकती हूं तो आप भी कर सकती हैं. आपके सामने कई विकल्प आएंगे. आप बुद्धिमानी से चुनेंगी तो बहुत कामयाब होंगी."

30 अप्रैल, 1966 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में जन्मीं सुनीता ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से विज्ञान में स्नातक करने के बाद अवध यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री ली. दो दशक तक वकालत करने के बाद उन्हें नवंबर 2011 में इलाहाबाद हाइकोर्ट की अतिरिक्त न्यायाधीश के तौर पर पदोन्नत किया गया. अगस्त 2013 में वे स्थायी न्यायाधीश बन गईं.

अपने शानदार न्यायिक करियर में उन्होंने हमेशा ऐसे फैसले दिए, जो सामाजिक वास्तविकताओं और कानूनी बारीकियों के बीच संतुलन कायम करने के लिए जाने जाते हैं. 2020 में जब उत्तर प्रदेश पुलिस ने कुछ लोगों को कोविड-19 प्रोटोकॉल का उल्लंघन कर खाने के पैकेट बांटने के आरोप में गिरफ्तार किया तो जस्टिस अग्रवाल ने उनकी रिहाई का आदेश दिया. उनका तर्क था कि प्रशासन को पहले प्रोटोकॉल के बारे में जागरूकता पैदा करनी चाहिए. 

उन्होंने संवैधानिक कानून के संबंध में भी अहम फैसले दिए हैं. 2020 में वे तीन न्यायाधीशों की उस पीठ का हिस्सा थीं, जिसने व्यवस्था दी थी कि एक हाइकोर्ट अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले व्यक्तियों पर अपनी न्यायिक शक्तियों का प्रयोग कर सकता है, अगर मामला उसके अधिकार क्षेत्र के भीतर हुई घटना से संबंधित हो तो. उसी साल वह पांच न्यायाधीशों की उस पीठ में भी शामिल थीं, जिसने फैसला सुनाया था कि अग्रिम जमानत चाहने वाला व्यक्ति विशेष परिस्थितियों में सीधे हाइकोर्ट का रुख कर सकता है.

न्यायमूर्ति अग्रवाल एक वकील की बेटी हैं और उनका विवाह भी एक वकील से ही हुआ. उनकी दो संतानें हैं. बेटी ऐश्वर्य भी वकालत के ही पेशे में हैं और बेटा अभिनव अभी कानून की पढ़ाई कर रहा है. यानी दोनों संतानें भी उनकी समृद्ध विरासत को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं.

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