
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2025 में गज़ा के लिए डोनाल्ड ट्रंप की बड़ी योजना पर दो अलग-अलग विचार सामने आए. फलस्तीन लैंड स्टडीज सेंटर की डायरेक्टर डॉ. जेना जल्लाद ने ट्रंप के गज़ा का फिर से निर्माण करने और उसके निवासियों को जॉर्डन तथा मिस्र में बसाने के प्रस्ताव की कड़ी आलोचना की. उन्होंने इसे पश्चिम एशिया को साम्राज्यवादी फ्रांस और ब्रिटेन के बीच बांट देने वाले 1917 के बाल्फोर घोषणापत्र की आधुनिक प्रतिध्वनि बताया.
उन्होंने ट्रंप पर आरोप लगाया कि वे फलस्तीनी जमीन को व्यावसायिक 'रिवेरा’ यानी तटरेखा में तब्दील करना चाहते हैं और फलस्तीनी संप्रभुता का उल्लंघन करते हुए उन्हें निर्वासन को मजबूर करने की साजिश रच रहे हैं. इसके विपरीत, पूर्व इज्राएली सांसद ऐनाट विल्फ ने ट्रंप के विचार का समर्थन किया और तर्क दिया कि गाज़ा के प्राकृतिक संसाधनों—इसके भूमध्यसागरीय तट और उपजाऊ मिट्टी—को 'भूमध्य सागर का दुबई' बनाया जा सकता है.

गगनचुंबी इमारतों की बजाए सुरंगों के जरिए गाज़ा को 'हथियारबंद इलाके’ में तब्दील करने के लिए उन्होंने फलस्तीनियों को दोषी ठहराया. विल्फ ने इज्राएल की ओर से द्वि-राष्ट्र समाधान को लगातार नकारने का भी बचाव किया और दावा किया कि फलस्तीनी अमन के प्रस्तावों को अस्वीकार करते हैं.
इस सत्र में गाज़ा के भविष्य को लेकर वैचारिक विभाजन उजागर हुआ—एक पक्ष जबरन विस्थापन का विरोध करता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे आर्थिक अवसर मान रहा है. इस दौरान, मिस्र की 53 अरब डॉलर की पुनर्निर्माण योजना की अगुआई में अरब नेताओं ने काहिरा के शिखर सम्मेलन में ट्रंप के विस्थापन के विचार को सिरे से खारिज किया है और गाज़ा के फिर से निर्माण का समर्थन किया है.