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इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2025: साइंटिस्ट टोबी वाल्श ने क्यों कहा- सिर्फ 2 चीजों का इस्तेमाल कर AI में बेहतर कर सकता है भारत

एआइ पर कई किताबें लिख चुके न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के चीफ साइंटिस्ट वाल्श ने कहा, ''फिलहाल मशीनें ठीक वही करती हैं जो हम उन्हें करने के लिए कहते हैं.’’

Future.Ai Agent or Master?
टोबी वाल्श, चीफ साइंटिस्ट यूएनएसडब्ल्यू.एआइ, सिडनी
अपडेटेड 2 अप्रैल , 2025

न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के चीफ साइंटिस्ट टोबी वाल्श आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) को समझाने के लिए जिसे मिसाल बनाना पसंद करते हैं, वह है बिजली. यह सब जगह है, दूरदराज के कोनों में भी.

मगर इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में उन्होंने बताया कि जिसे आज सार्वभौम जरूरत के तौर पर देखा जाता है, उस पर कभी कुछेक ऐसे लोगों का एकाधिकार था जिन्हें इस क्षेत्र में पहले आने की वजह से बढ़त हासिल थी.

यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स में चीफ साइंटिस्ट और एआइ के क्षेत्र में चार दशक से काम कर रहे वाल्श ने कहा, ''एआइ की दुनिया ऐसी ही रहने वाली है.’’ वे मानते हैं कि लंबे वक्त में एआइ के परिदृश्य की विजेता कोई ''एक सुपर-डुपर’’ कंपनी या सबसे ज्यादा धनसंपन्न कंपनी नहीं होगी. उन्होंने कहा कि अगर भारत अपने पत्ते अच्छी तरह खेले तो 'बहुत अच्छा कर’ सकता है, क्योंकि उसके पास एआइ के लिए जरूरी दो चीजें दिमागी ताकत और डेटा दोनों हैं.

क्या हमें मशीनों के हावी होने को लेकर फिक्रमंद होना चाहिए? एआइ पर कई किताबें लिख चुके वाल्श ऐसा डर फैलाने वालों में नहीं हैं. उन्होंने कहा, ''फिलहाल मशीनें ठीक वही करती हैं जो हम उन्हें करने के लिए कहते हैं.’’ उन्हें फिक्र इंसानों को लेकर है. गलत हाथों में पड़ने पर एआइ 'गलत और भ्रामक सूचनाओं’ को सोशल मीडिया के मुकाबले ज्यादा तेज और ताकतवर बना सकता है.

उन्हें डर है कि ऐसा करते हुए यह युद्ध और लोकतंत्र का स्वरूप ही बदल सकता है. वाल्श ने कहा कि एआइ की ताकत को सान पर चढ़ाने के लिए टेक्नोलॉजी को सबके हाथों में होना चाहिए, न कि सिलिकॉन वैली के चंद गिने-चुने लोगों के हाथों में, ''जो ये बुनियादी फैसले कर रहे हैं कि भविष्य कैसा होने वाला है.’’

एटमी और जैविक हथियारों का जिक्र कर उन्होंने बताया, ''हम भूलें नहीं. कई टेक्नोलॉजी हैं जिन्हें हम नियमों के दायरे में लाए हैं.’’ उनकी राय में टेक कंपनियों की दलील कि नियम-कायदे नवाचारों का गला घोंट देते हैं, 'कुछ हद तक भ्रांति’ ही है.

उन्होंने बताया कि एआइ पूरी दुनिया में अनुसंधान और विकास का 20% बजट निगल रहा है. यह भ्रांति है कि नियम-कायदे नवाचारों का गला घोंट देते हैं. एआइ की ताकत का असली फायदा लेने को टेक्नोलॉजी सबके हाथ में होनी चाहिए.

इस क्षेत्र के विस्तार की रफ्तार मुझे वास्तव में हैरान करती है...पूरी दुनिया में प्रति दिन एक अरब डॉलर एआइ के विकास पर खर्च किए जा रहे हैं. इससे पहले किसी एक प्रौद्योगिकी पर इस स्तर का निवेश हमें देखने को नहीं मिला.

आपको अभी मशीनों से बहुत ज्यादा फिक्रमंद होने की जरूरत नहीं...कंप्यूटर खुद से कोई कदम नहीं उठा सकते. पर आपको इससे जरूर चिंतित होना चाहिए कि मनुष्य तकनीकों को इस तरह चलाने जा रहे हैं जो कि नुक्सानदेह हो सकता है.

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