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क्या इनकम टैक्स में छूट दे सकेगी भारत में आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा?

एक ओर जहां कमजोर मांग, कम निवेश और दुनियाभर में अनिश्चितता की वजह से भारत की वृद्धि पर असर पड़ रहा है, वहीं आसमान छूती महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी कर में मिली राहत को ढक रही है

नोएडा के डीएलएफ मॉल ऑफ इंडिया में लोग 
नोएडा के डीएलएफ मॉल ऑफ इंडिया में लोग 
अपडेटेड 27 फ़रवरी , 2025

कोविड के बाद भारत की आर्थिक बहाली की रफ्तार की तेजी खत्म हो गई है. इस पर सुस्त पड़ती खपत, निर्बल निजी निवेश और प्रतिकूल वैश्विक भू-राजनैतिक माहौल का भी असर हुआ है. सरकारी अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में विकास दर 6.4 फीसद रहने की उम्मीद है जो वित्त वर्ष 2024 में हासिल दर 8.2 फीसद से कम है. रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026 में इसके थोड़ा घटकर 6.7 फीसद रह जाने का अनुमान लगाया है. ये चुनौतियां नीतिगत अनिश्चितताओं के कारण और ज्यादा जटिल हो जा रही हैं जो अमेरिका में नए डोनाल्ड ट्रंप शासन के कारण खड़ी हो रही हैं. इनसे भारतीय अर्थव्यवस्था की आगे की राह में उथल-पुथल का संकेत मिल रहा है.

इस पृष्ठभूमि में केंद्रीय बजट 2025-26 में नरेंद्र मोदी सरकार ने करीब 3.2 करोड़ वेतनभोगी वर्ग को उल्लेखनीय सौगात दी है. बजट में आयकर छूट का मतलब है कि सालाना 12 लाख रुपए तक कमाने वाले व्यक्ति को कोई आयकर नहीं देना होगा. सरकार ने यह कदम खर्च योग्य आय को बढ़ाने और शहरी खपत को बढ़ावा देने के मकसद से उठाया है. हालांकि अकेले इसके बूते विकास में कोई बड़ा बदलाव नहीं आ सकता, लेकिन ज्यादा खर्च से निजी निवेश को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है. सरकार ने साफ संकेत दिया है कि उसकी नीतियां आर्थिक चुनौतियों से निबटने और मध्य वर्ग की चिंताओं को दूर करने के लिए हैं-सरकार के इस नजरिए से कुछ लोगों ने इत्तेफाक किया है. 

देश का मिज़ाज यानी मूड ऑफ द नेशन के ताजा सर्वेक्षण में यह पूछने पर कि अर्थव्यवस्था को संभालने के मामले में मोदी सरकार को क्या रेटिंग देते हैं, 52.3 फीसद उत्तरदाताओं ने इसे असाधारण या अच्छा बताया—जो अगस्त 2024 के सर्वे से थोड़ी अधिक है. हालांकि, 28.8 फीसद ने इसे खराब या बेहद खराब बताया है जो पिछली बार के 25 फीसद से अधिक है, जिससे आर्थिक चिंताओं के संकेत मिलते हैं.

केंद्र के चिंतित होने के कारण हैं, यह बात अगले छह महीनों में अर्थव्यवस्था के बारे में उत्तरदाताओं के जवाब से साफ है: केवल 34 फीसद का मानना है कि इसमें सुधार होगा, जबकि 57 फीसद को अंदेशा है कि यह या तो खराब हो जाएगी या ऐसी ही रहेगी. आशावाद में निरंतर कमी 2024 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को उम्मीद से कम सीटें मिलने से भी जाहिर हुई थी. पिछले देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के बाद से मनोबल में और गिरावट आई है क्योंकि तब 38 फीसद ने अर्थव्यवस्था में सुधार की संभावना जताई थी जबकि 50.6 फीसद ने गिरावट या वैसी ही बनी रहने का अनुमान जताया था.

कर कटौती ही नहीं पर्याप्त 

अकेले आयकर में छूट से ही मध्य वर्ग पर कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला. दिल्ली के थिंक टैंक पीपल रिसर्च ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकोनॉमी (प्राइस) के अनुमानों के अनुसार मध्य वर्ग करीब 57 करोड़ है. हालांकि रिजर्व बैंक ने सख्त मौद्रिक नीति के जरिए खुदरा मुद्रास्फीति पर लगाम कस दी है जो दिसंबर 2024 में 5.2 फीसद पर थी. लेकिन खाद्यान्न की मुद्रास्फीति 8.4 फीसद के उच्च स्तर पर बनी रही. इसलिए ताज्जुब नहीं जो 43.6 फीसद उत्तरदाताओं का कहना है कि आयकर छूट में बढ़ोतरी से उनकी बचत और खर्च में इजाफा होगा जबकि अन्य 34.6 फीसद का मानना है कि ऐसा नहीं होगा.

तथ्य यह है कि बजट प्रस्तावों से बहुत से लोग खुश नजर नहीं आए, केवल 28.2 फीसद का मानना है कि इससे विकास में तेजी आएगी और रोजगार पैदा होंगे जबकि 14 फीसद लोगों का कहना है कि इसका उद्देश्य मध्य वर्ग को खुश करना है. बहुत कम को लगता है कि इसमें ऐसा कुछ है जिससे मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा, जो ज्यादा रोजगार पैदा करने के लिए अहम है. इस बीच, सर्वेक्षण में शामिल 23.4 फीसद लोगों का कहना है कि इनमें से कोई भी उद्देश्य बजट से हासिल नहीं होगा, जिससे वार्षिक बजट के प्रति उनकी बढ़ती उदासीनता का पता चलता है.

बड़े कारोबार को बढ़ावा

सरकार की आर्थिक नीतियों से ज्यादातर बड़े कारोबारों को फायदा होता है, यह धारणा कई सर्वेक्षणों में बरकरार रही है. अगस्त 2022 के देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के बाद से आधे से ज्यादा उत्तरदाताओं ने ऐसा ही महसूस किया है. ताजा सर्वेक्षण में यह आंकड़ा 51.2 फीसद है. हालांकि यह पिछले सर्वेक्षण में दर्ज 58.3 फीसद से कम है. केंद्र को कुछ राहत देने वाली धारणा यह है कि छोटे कारोबारों और किसानों को भी फायदा हो रहा है, पिछले सर्वेक्षण में उनका हिस्सा 8 फीसद और 8.5 फीसद था जो इस बार क्रमश: 10 फीसद और 10.6 फीसद है.

महामारी के बाद से केंद्र छोटे कारोबारों को सहायता दे रहा है, उन्हें बिना किसी जमानत के सरकार की गारंटी पर ऋण मुहैया कराया जा रहा है. हाल के बजट में ज्यादा संक्चया में सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को शामिल करने के लिए निवेश और टर्नओवर सीमा में संशोधन किया गया है और सरकार से समर्थित ऋण सीमा को भी दोगुना करके 10 करोड़ रुपए किया गया है. इस बीच, जिस कृषि क्षेत्र को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विकास का पहला इंजन बताया, उसके लिए धन-धान्य कृषि योजना जैसे कार्यक्रम लाए गए हैं. इनका मकसद कम फसल उपज वाले 100 जिलों के 1.7 करोड़ किसानों को लाभ पहुंचाना है. दिहाड़ी मजदूरों की स्थिति में थोड़ा-सा सुधार हुआ है. 6 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि इस समूह को सरकारी योजनाओं से लाभ हुआ है. पिछले सर्वेक्षण में यह आंकड़ा 5 प्रतिशत था.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, जिनका दिसंबर 2024 में निधन हो गया, की प्रशंसा में बढ़ोतरी हुई है, 40 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्होंने अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से संभाला जबकि पिछले सर्वेक्षण में यह संख्या 35 फीसद थी. हालांकि बहुमत—51 फीसद—अभी भी मोदी के पक्ष में है. लेकिन यह अगस्त 2024 के 57.4 फीसद के आंकड़े से कम है.

2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से आपकी आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव आया है या नहीं, इस सवाल के जवाब में लोगों की राय मिली-जुली है. 35 फीसद उत्तरदाताओं का कहना है कि इसमें सुधार हुआ है—पिछले सर्वेक्षण के 33.3 फीसद से थोड़ी ज्यादा—लेकिन 31.8 फीसद ने कहा कि कोई बदलाव नहीं हुआ. चिंता की बात यह है कि 31 फीसद का कहना है कि उनकी आर्थिक स्थिति खराब हुई है. इतना ही चिंताजनक अगले छह महीनों में घरेलू आय या वेतन के प्रति उनका नजरिया है: 65 फीसद का मानना है कि यह या तो खराब हो जाएगा या वैसा ही रहेगा. यह पिछले एमओटीएन सर्वेक्षण में 60.8 फीसद था.

कीमतों की मार, जाते रोजगार 

उच्च मुद्रास्फीति का असर साफ दिखता है, 64.3 फीसद उत्तरदाता कहते हैं कि उनके लिए मौजूदा खर्चों को मैनेज कर पाना बहुत मुश्किल हो गया है. पिछले सर्वेक्षण में यह आंकड़ा 63 फीसद था. सुस्त वेतन वृद्धि इस दुश्वारी को और बढ़ाती है. शहरी क्षेत्रों में निजी कंपनियों में वास्तविक वेतन वृद्धि इस समय घटकर केवल 3-4 फीसद रह गई है जो वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही तक 10 फीसद से ज्यादा थी. हालांकि आयकर के मोर्चे पर कुछ राहत मिली है, लेकिन केंद्र को अभी भी माल और सेवा कर (जीएसटी) को तर्कसंगत बनाने और कुछ चीजों पर कर का बोझ कम करने की जरूरत है जिससे ज्यादा असर पैदा हो सके. इस बीच, केवल 6.7 फीसद उत्तरदाताओं ने यह कहा कि उनके मौजूदा खर्च में कमी आई है. 

नौकरियों के हालात अभी भी अनिश्चित बने हुए हैं. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के आंकड़ों के अनुसार, भारत की बेरोजगारी दर दिसंबर 2024 में बढ़कर लगभग 8 फीसद हो गई जो अगस्त 2024 के बाद सबसे ज्यादा है. इसलिए, ताज्जुब की बात नहीं जो सर्वेक्षण में शामिल 76.2 फीसद उत्तरदाता बेरोजगारी को या तो बहुत गंभीर या कुछ हद तक गंभीर मानते हैं. हालांकि, इस तथ्य से थोड़ी राहत मिलती है कि यह आंकड़ा पिछले सर्वेक्षण के 78.3 फीसद से जरा कम है.

मोदी सरकार के तीसरी बार सत्ता में आने के बाद जुलाई 2024 के बजट में सीतारमण ने प्रधानमंत्री पैकेज की घोषणा की थी. इस पैकेज में पांच योजनाएं और पहल शामिल थीं जिनका उद्देश्य पांच साल की अवधि में 4.1 करोड़ नौजवानों के लिए रोजगार, कौशल और अन्य अवसरों की राह तैयार करना था. इसका परिव्यय 2 लाख करोड़ रुपए रखा गया. लेकिन जमीनी स्तर पर इसका अभी भी कोई खास असर नहीं दिखता. इन चिंताओं में अब यह डर भी शामिल हो गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बड़ी संख्या में युवाओं की नौकरियों की जगह ले लेगा. इस पर 60.2 फीसद उत्तरदाताओं का मानना है कि ऐसा होगा. इसके मद्देनजर क्या भारत में सबको बेसिक आय होनी चाहिए? 82 फीसद लोग मानते हैं कि ऐसा होना चाहिए.

इस बीच, यह मांग मजबूती से बनी हुई है कि सरकार को 'कारोबार चलाने के काम’ से बाहर निकल जाना चाहिए, 56.3 फीसद उत्तरदाताओं का मानना है कि उसे घाटे में चल रही सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का विनिवेश कर देना चाहिए. केंद्र का विनिवेश रिकॉर्ड खराब रहा है. वित्त वर्ष 21 और वित्त वर्ष 25 के बीच वह अपने लक्ष्य का केवल 29 फीसद ही हासिल कर सका है. इस साल, सीतारमण ने बजट में विनिवेश पर किसी बड़ी घोषणा से परहेज किया, जिससे यह धारणा मजबूत हुई कि यह अभी सरकार के एजेंडे में नहीं है.

निवेश के मामले में जमीन कई लोगों के लिए पसंदीदा विकल्प बनी हुई है, 49.7 फीसद लोग इसे चुनते हैं, जबकि केवल 15.3 फीसद लोग बैंकों में बचत करना चाहते हैं; 13 फीसद शेयर बाजार में निवेश करते हैं. शेयर बाजार की भारी अनिश्चितता और उतार-चढ़ाव को देखते हुए इसमें आश्चर्य नहीं कि सुनिश्चित रिटर्न के लिए कई लोगों का जमीन के टुकड़े पर भरोसा अभी बरकरार है.

क्या है उत्तरदाताओं का कहना?

70% उत्तरदाताओं (कम आय वर्ग के) का कहना है कि मौजूदा खर्चों को संभालना मुश्किल हो गया है. यह सभी आय वर्गों में सबसे ज्यादा है.

43% अधिक आय वर्ग वालों का कहना है कि अगले छह महीने में अर्थव्यवस्था की हालत खराब होगी, यह सभी आय वर्गों में सबसे ज्यादा आंकड़ा है.

64% पूर्वोत्तर और 60 फीसद पूरब के उत्तरदाता बेरोजगारी की स्थिति को बेहद गंभीर मानते हैं जबकि दक्षिण में ऐसा मानने वाले 48 फीसद हैं.

50% उत्तरदाताओं (अधिक आय वर्ग वालों) का कहना है कि 2014 में एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से उनकी माली हालत सुधरी है, सभी आय वर्गों में यह सबसे ज्यादा है.

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