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देश का मिजाज सर्वे : काम के घंटे या काम की गुणवत्ता, इस बहस में कौन सा पक्ष भारी?

आधे से ज्यादा कर्मचारी अपने कामकाज को लेकर तनावग्रस्त हैं और हर चौथा कर्मचारी काम और जीवन के बीच संतुलन बनाने में नाकाम हो रहा. यही वजह है कि ज्यादा से ज्यादा लोग कम घंटे वाले कार्य सप्ताह की वकालत कर रहे हैं

काम और जिंदगी के बीच संतुलन
अपडेटेड 27 फ़रवरी , 2025

पिछले साल भर से देश में कार्य-जीवन संतुलन को लेकर बहस छिड़ी है. लार्सन ऐंड टुब्रो (एलऐंडटी) के चेयरमैन एस.एन. सुब्रह्मण्यन ने हाल में 90 घंटे के कार्य सप्ताह का समर्थन किया यानी कर्मचारियों को रविवार को भी काम करना चाहिए.

उनकी टिप्पणी से कुछ समय पहले ही पुणे में अर्न्स्ट ऐंड यंग से जुड़ी एक कंपनी में काम करने वाली 26 वर्षीया अन्ना सेबेस्टियन पेरायिल की मौत हुई थी. इस घटना ने कार्यस्थल पर तनाव को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया था.

इससे पहले इन्फोसिस संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति के 70 घंटे के कार्य सप्ताह के प्रस्ताव पर भी विवाद हो चुका था. इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वे बताता है कि इस मुद्दे पर कर्मचारियों की राय काफी बंटी हुई है. 48.1 फीसद उत्तरदाता 40-70 घंटे काम (यानी पांच दिन के कार्य सप्ताह में हर दिन 8-14 घंटे काम करने) को ठीक मानते हैं, जो उनके रुख में स्पष्ट बदलाव का संकेत है. अगस्त 2024 में यह आंकड़ा 62.7 फीसद था और इसमें आई गिरावट काम के तनाव को लेकर लोगों में बढ़ती जागरूकता दिखाती है.

वहीं, 40 घंटे से कम कार्य सप्ताह की प्राथमिकता में सात फीसद अंकों की वृद्धि हुई है, जो 20.9 की तुलना में 27.8 फीसद हो गया है. 12.2 फीसद के साथ एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण वर्ग अभी भी मूर्ति के 70 घंटे कार्य-सप्ताह प्रस्ताव का समर्थक है. इस समूह का मानना है कि कड़ी मेहनत ही सफलता की कुंजी है. सर्वे बताता है कि मौजूदा काम में कार्य-जीवन संतुलन को लेकर कर्मचारियों की संतुष्टि में गिरावट आई है.

पिछले छह महीनों में आंकड़ा 74.3 फीसद से गिरकर 65.7 फीसद हो गया. एक-चौथाई उत्तरदाता को संतुलन साधने में मुश्किल हो रही है. तनाव का स्तर इस मुद्दे की गंभीरता को और स्पष्ट करता है: 23.6 फीसद लोग अक्सर तनाव महसूस करते हैं, जबकि 30 फीसद कभी-कभी.

सीधा मतलब है कि आधे से ज्यादा कर्मचारियों के लिए तनाव झेलना सामान्य बन चुका है. अच्छी बात है कि 40 फीसद कर्मचारी कभी नहीं या विरले ही तनाव की बात करते हैं, जो बेहतर प्रबंधन या तनाव से निबटने की प्रभावी रणनीतियों की तरफ इशारा करता है. हालांकि, लंबे समय तक काम करने से उत्साह घटने को देखते हुए जरूरी है कि कंपनियां घंटों की गिनती के बजाए उत्पादकता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना शुरू करें.

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