—अरुण पुरी
पिछले वर्ष हुए लोकसभा चुनाव ने नरेंद्र मोदी सरकार को हौले से ही सही लेकिन अपनी खुशफहमी से बाहर निकाल दिया था. 'चार सौ पार' का नारा बुलंद कर रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक प्रभावशाली बहुमत की उम्मीद पाल रखी थी. लेकिन पार्टी को सिर्फ 240 सीटें मिलीं जो 2019 में जीती सीटों की तुलना में 63 कम थीं. यही नहीं, पार्टी अकेले अपने दम पर बहुमत से 32 कदम दूर रह गई.
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने तीसरा कार्यकाल हासिल करके एक नया इतिहास तो रचा लेकिन गठबंधन की ताकत सिर्फ 293 सीटों पर सिमट गई. गठबंधन राजनीति में संतुलन साधने की कवायद में पीएम मोदी को पहली बार सहयोगी दलों की मांगों के आगे झुकने को भी विवश होना पड़ा. हालांकि, कमजोर पड़ने वाला यह दुर्लभ क्षण अब बीती बात हो चुका है.
इंडिया टुडे-सीवोटर का नवीनतम देश का मिज़ाज सर्वे भी इस उल्लेखनीय वापसी की तस्दीक करता है, जिसमें मोदी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलता नजर आ रहा है. अगर अभी आम चुनाव कराए जाएं तो भाजपा 281 सीटों के साथ अकेले अपने दम पर बहुमत पा लेगी, यानी उसे 41 सीटों का फायदा होगा. वहीं एनडीए का आंकड़ा 343 सीटों तक पहुंच सकता है, जो 2019 के उसके सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन यानी 353 सीटों के करीब ही है.
दूसरी तरफ, कांग्रेस की अगुआई वाला भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन यानी इंडिया ब्लॉक पिछली गर्मियों में 234 सीटें जीतने के बाद आत्मसंतुष्टि का खामियाजा भुगतता दिख रहा है, जिसकी लोकसभा सीटों की संख्या अब घटकर 188 पर आ सकती है. इसमें सबसे ज्यादा नुक्सान ग्रैंड ओल्ड पार्टी को होगा जो 99 सीटों से घटकर 78 पर सिमट सकती है. छमाही देश का मिज़ाज सर्वे में सरकार की संतुष्टि रेटिंग नए सिरे से मजबूत हुई है, जो अगस्त 2024 में 58.6 फीसद की तुलना में बढ़कर 62.1 फीसद हो गई.
व्यक्तिगत स्तर पर मोदी की रेटिंग लोगों में उनकी लोकप्रियता को दर्शाती है—62 फीसद की नजर में बतौर प्रधानमंत्री उनका प्रदर्शन उत्कृष्ट है या अच्छा, 50.7 फीसद का मानना है कि वे अब तक के सबसे अच्छे पीएम हैं, और 51.2 फीसद की राय में अगले पीएम के लिए वे ही सबसे उपयुक्त हैं. उनके बाद अगर कोई विपक्षी नेता थोड़ा-बहुत टिका है तो वह राहुल गांधी हैं. कांग्रेस नेता को अगले पीएम के तौर पर देखने के इच्छुक लोगों की संख्या अगस्त में 22.4 फीसद की तुलना में बढ़कर अब 24.9 फीसद हो गई. अगर 2019 के आम चुनाव से पहले आयोजित दो सर्वेक्षणों को छोड़ दें तो राहुल के मामले में यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ आंकड़ा है, जो अगस्त की तुलना में भी ज्यादा है.
वैसे, मोदी सरकार की चमचमाती आभा और उसके शासन के रिपोर्ट कार्ड के बीच एक स्पष्ट अंतर दिखता है. सबसे बड़ी उपलब्धि के सवाल पर 15.2 फीसद उत्तरदाताओं के समर्थन के साथ राम मंदिर शीर्ष स्थान पर रहा; राजनैतिक स्थिरता दूसरे, और विकास संबंधी सभी दावों का नंबर इसके बाद रहा. दोनों उपलब्धियां ऐसे समय में बहुत ज्यादा मायने नहीं रखतीं जब आर्थिक चिंताएं पूरी तरह हावी रहने के आसार हैं.
देश का मिज़ाज सर्वे में एक बार फिर बेरोजगारी और महंगाई ही देश की दो सबसे बड़ी समस्याओं के तौर पर चिह्नित हुईं; जनता की नजर में यह मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलताओं में शुमार हैं. आर्थिक मोर्चे की समूची स्थिति की बात करें तो व्यापक निराशा सामने आती है: 56.9 फीसद का मानना है कि स्थिति जस की तस रहेगी या फिर और बदतर हो जाएगी. हालांकि, अगस्त में 50.6 फीसद की तुलना में इसमें गिरावट आई है.
सरकार के लिए चिंता की बात यह है कि 62.7 फीसद लोगों की राय में मोदी सरकार के कार्यकाल में उनकी माली हालत जस की तस बनी रही या फिर बिगड़ी है. केवल 26.5 फीसद लोगों को लगता है कि अगले छह माह में उनकी घरेलू आय में सुधार होगा; 33.8 फीसद को कोई बदलाव होता नजर नहीं आ रहा और 31.2 फीसद इस बात को लेकर आशंकित हैं कि स्थिति और खराब ही होगी. हालांकि, बजट 2025 को 68.1 फीसद उत्तरदाताओं ने पसंद किया; 43.6 फीसद ने आयकर छूट के कारण बचत होने की उम्मीद जताई.
बहरहाल, इसे विडंबना ही कहेंगे कि भले ही गरीबों के लिए चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के अलावा 81.3 करोड़ लोग मुफ्त अनाज पा रहे हों लेकिन मोदी सरकार के प्रति यह धारणा नहीं बदल पाई है कि उसकी नीतियों से बड़े उद्योगों को फायदा होता है. इस तरह की राय रखने वालों का आंकड़ा 51.2 फीसद है. अगस्त के 58.3 फीसद की तुलना में काफी ज्यादा गिरावट के बावजूद यह आंकड़ा देश का मिज़ाज सर्वे के पिछले छह चक्रों में 50 फीसद से नीचे नहीं आया है.
मोदी सरकार के लिए एक उत्साहजनक पहलू यह है कि जनता को इस पर भरोसा है कि आने वाले समय की चुनौतियों से निबटने की कमान सबसे अच्छे हाथों में है: 52.3 फीसद लोगों ने अर्थव्यवस्था संभालने के उसके तरीके को बेहतरीन या अच्छा माना. हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों पर भी जनता ने अपनी मुहर लगाई: 72.6 फीसद लोग समान नागरिक संहिता के पक्ष में हैं, 68.9 फीसद लोग वक्फ भूमि के मामले में सरकार के रुख के समर्थक हैं और 57.9 फीसद मंदिर-मस्जिद विवादों को फिर खोलने वाली याचिकाओं के पक्षधर हैं. बहरहाल, सावधानी बरतने में ही समझधारी होगी.
एक बड़ा वर्ग मंदिर-मस्जिद विवाद खत्म करने के आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आह्वान का समर्थन करता है. ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो प्रवर्तन निदेशालय जैसी एजेंसियों के राजनैतिक इस्तेमाल के खिलाफ हैं और न्यायपालिका की स्वतंत्रता में कथित तौर पर आ रही कमी पर नाराजगी जाहिर करते हैं. यह तथ्य सामूहिक आर्थिक खुशहाली को लेकर अनिश्चितता की स्थिति रेखांकित करता है कि 82 फीसद लोगों का मानना है कि भारत में सार्वभौमिक बुनियादी आय योजना होनी चाहिए.
सरकार को अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अपने सभी कील-कांटे दुरुस्त करने के अलावा लोगों की आजीविका सुरक्षित करने पर भी ध्यान देना होगा, क्योंकि आने वाले वर्षों में हिंदुत्व का प्रभाव सीमित हो सकता है. देश का मिज़ाज सर्वे में मोदी 3.0 के पक्ष में नए सिरे से लामबंदी दर्शाती है कि सरकार को येन केन प्रकारेण साहसिक कदमों के साथ सुधारों की दिशा में बढ़ना होगा और विकास के मोर्चे पर भी नई इबारत लिखनी होगी. विपक्ष के लिए भी संदेश साफ है: ऐसे राजनैतिक दांवों से परहेज करें जो खुद पर ही भारी पड़ सकते हों.
— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह).