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क्या दिल्ली के बाद अब पंजाब में भी खतरे में है AAP सरकार?

AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल का विधायकों को सीधा संदेश है कि अब हमारे पास दिल्ली नहीं है, ऐसे में पंजाब को देश के सामने कैनवस के रूप में दिखाना होगा

फिसल गई दिल्ली आतिशी, केजरीवाल और भगवंत मान दिल्ली चुनाव में प्रचार के दौरान
अपडेटेड 25 फ़रवरी , 2025

अरविंद केजरीवाल के लिए सवाल यह नहीं है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) का भविष्य है या नहीं. उनके लिए प्रश्न यह है कि पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में एक आइडिया के रूप में प्रासंगिक रहेगी या नहीं. दिल्ली में पार्टी की हार के तीन दिन बाद 11 फरवरी को मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में पंजाब के 95 में से 86 आप विधायकों के साथ उनकी आधे घंटे बैठक हुई. माना जाता है कि इसमें केजरीवाल ने बताया कि पार्टी के भविष्य को लेकर उनके मन में क्या है.

बैठक में मौजूद लोगों ने कहा कि अब खास फोकस दिल्ली में एक दशक की सत्ता के दौरान सावधानी के साथ बनाए गए 'आप के शासन मॉडल' को बनाए रखने पर होगा. स्कूलों, अस्पतालों, मुफ्त बिजली आदि के बारे में सोचिए. विधायकों को सीधा संदेश था: अब हमारे पास दिल्ली नहीं रही तो पंजाब को देश के सामने आप के कैनवस के रूप में दिखाना होगा. इस सीमावर्ती राज्य में दो साल बाद चुनाव होने हैं. इसलिए सूत्रों के अनुसार पंजाब में अब पिछले पांच साल की तुलना में केजरीवाल की ज्यादा छाप दिखने की उम्मीद है.

संभावना यही है कि यह जुड़ाव आगे चलकर औपचारिक हो सकता है: आप कार्यकर्ताओं में चर्चा है कि केजरीवाल पंजाब के रास्ते राज्यसभा की राह पकड़ सकते हैं. इससे उन्हें राष्ट्रीय फलक पर वह पहचान मिलेगी जिसकी उन्हें जरूरत है, साथ ही राष्ट्रीय सहयोगी दलों से नजदीकी भी. उच्च सदन में पंजाब सात सांसद भेजता है. इस समय सभी आप के सदस्य हैं.

हालांकि, राजनीति में चीजें शायद ही कभी वैसी होती हैं जैसी दिखती हैं. कई लोगों का मानना है कि हाइकमान ने एकता दिखाने के लिए बैठक बुलाई थी. यह एक तरह से पंजाब इकाई की एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए 'मौजूदगी' जताने जैसी कवायद थी. इस समय यही सबसे बड़ी प्राथमिकता है क्योंकि राज्य में कांग्रेस नेता खुलेआम दावा कर रहे हैं कि आप के कई विधायक पार्टी छोड़ देंगे. पर मुख्यमंत्री मान इस दावे को अक्सर खारिज करते रहे हैं.

8 फरवरी को पंजाब कांग्रेस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब खबर आई कि 70 सदस्यों की दिल्ली विधानसभा में आप की सीटें घटकर 22 रह गई हैं और खुद केजरीवाल हार गए हैं. भले ही खुद कांग्रेस राष्ट्रीय राजधानी में अपना खाता न खोल सकी हो और उसे 6 फीसद से भी कम वोट मिले हों लेकिन अब पार्टी का दावा है कि पंजाब में 'आप के 30 से ज्यादा विधायक' उसके संपर्क में हैं. केजरीवाल से मिलने के बाद मान ने इसे सिरे से खारिज किया और मीडिया से कहा, ''कांग्रेस पिछले तीन साल से यही कह रही है. पार्टी को हमने खून-पसीने से बनाया है. पार्टी छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता.''

हालांकि, उनके विधायकों की बॉडी लैंग्वेज उत्साहजनक नहीं कही जा सकती. आखिर 2013 में दिल्ली में आप की शानदार चुनावी फसल ने ही पंजाब में इसका बीजारोपण किया था: 2014 के लोकसभा चुनाव में आप के उम्मीदवारों ने राज्य की 13 सीटों में से चार पर जीत हासिल की थी. इस जन समर्थन का परिणाम 2022 के विधानसभा चुनाव में नजर आया जब आप ने 117 सदस्यीय विधानसभा में 92 सीटों के साथ सत्ता हासिल करते हुए सबको चौंका दिया. पिछले तीन साल में यह संख्या बढ़कर 95 हो गई है.

पिछले साल एक वास्तविकता यह भी दिखी कि लोकसभा चुनाव में आप सिर्फ तीन सीट ही जीत पाई. इसका कारण मान के नेतृत्व की कमजोरी और शराब घोटाले में केजरीवाल की गिरफ्तारी को माना गया. फिर भी स्थानीय कार्यकर्ताओं का मनोबल बरकरार था. पर अब यह कसौटी पर है. 

इस बीच, दिल्ली में आतिशी और गोपाल राय जैसे वरिष्ठ नेताओं के नेतृत्व में आप के 22 विधायक भाजपा सरकार पर दबाव बनाए रखेंगे. फौरी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होगी कि दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) पर आप का नियंत्रण रहे जो वित्तीय और प्रशासनिक ताकत का मुख्य केंद्र है. प्रशासन पर नियंत्रण को लेकर उपराज्यपाल के कार्यालय के साथ चली तीखी जंग में फंसकर आप ने रणनीतिक और सीधे-सीधे अपनी जमीन गंवा दी है. अब वह एमसीडी के मामले में और ज्यादा मैदान नहीं छोड़ना चाहेगा. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि केजरीवाल और उनके करीबी सहयोगी प्राथमिकता वाली इस योजना पर नजर रखे हुए हैं. 

लेकिन भाजपा की नजर एमसीडी पर भी है और अब उसका दावा है कि उसके पास बहुमत लायक पर्याप्त संख्या बल है. पार्टी के पास 120 पार्षद हैं जबकि आप के पार्षद घटकर 122 रह गए हैं. एमसीडी में 14 विधायकों के वोट (आनुपातिक प्रतिनिधित्व) के साथ-साथ सात लोकसभा और तीन राज्यसभा सांसदों के वोट भी हैं. दिल्ली में विधानसभा और लोकसभा में अपने मौजूदा संख्या बल की वजह से भाजपा आश्वस्त दिखती है. सूत्रों का कहना है कि दिल्ली में आप के मेयर महेश खीची के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी चल रही है. बेशक, इसका मकसद भले ही आप के मझोले नेतृत्व का मनोबल और गिराना है.

केजरीवाल के लिए हालात और दुरूह करते हुए अमित शाह के नेतृत्व वाले गृह मंत्रालय ने प्रवर्तन निदेशालय को आबकारी नीति से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन पर केस चलाने की मंजूरी दे दी है. भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, इसकी पक्की संभावना है कि उन्हें फिर से गिरफ्तारी का सामना करना पड़ सकता है.

पंजाब में भी मान सरकार लोकप्रियता के पैमाने पर फिसलती दिख रही है. दिल्ली में एकजुटता प्रदर्शन को छोड़ दें तो सूत्रों का कहना है कि उनकी अपनी पार्टी के लोगों में उनसे नाराजगी है. अक्तूबर में जमानत पर बाहर आने के बाद केजरीवाल ने राज्य में बदलाव के लिए दबाव डाला था जिसमें कैबिनेट फेरबदल भी शामिल था. मान के कम से कम चार सहयोगियों को हटा दिया गया. मुख्यमंत्री ने राज्य इकाई के प्रमुख का पद भी केजरीवाल की पसंद के मंत्री अमन अरोड़ा को दे दिया. इन सभी को सत्ता का केंद्र चंडीगढ़ से दिल्ली ले जाने के कदम के रूप में देखा गया. तब काफी चर्चा थी कि पंजाब में आप विधायकों का एक खेमा मान को बदलने के लिए केजरीवाल पर दबाव बना रहा था.

चिंता का एक और कारण है. पंजाब में आप के मौजूदा 95 विधायकों में से कम से कम 40 विभिन्न दलों, मुख्य रूप से कांग्रेस से आए हैं. विपक्ष के नेता और कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने यह दावा करते हुए माहौल गरमा दिया है कि आप के 30 से ज्यादा विधायक उनके संपर्क में हैं. उन्होंने कयास लगाया कि मान भाजपा से हाथ मिलाने के लिए खुद पार्टी तोड़ सकते हैं. निश्चित ही मामला शह-मात का है: राज्य भाजपा का अपना घर दुरुस्त नहीं है, ऐसे में वह किसी बड़े कद के नेता के लिए अपने आप को संभावित ठिकाना नहीं बनाना चाहेगी.

फिर भी दिल्ली में आप की हार से पंजाब इकाई में गुटबाजी और तेज हो सकती है. इस पर नियंत्रण के लिए दिल्ली के नेता और मान खेमा दोनों में ही तकरार बढ़ सकती है. इससे राज्य भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं.

केजरीवाल के लिए हालात अभी इतने अच्छे नहीं दिखते. लेकिन जैसा कि भारतीय राजनीति के मौसम विज्ञानी रामविलास पासवान कहते थे, राजनैतिक रूप से कोई भी व्यक्ति तब तक पूरी तरह खत्म नहीं होता जब तक वह हार के बाद घर न बैठ जाए और कोपभवन न चला जाए. केजरीवाल के पास ऐसी कोई योजना नहीं है. वे सक्रिय रहेंगे, नजर में रहेंगे: चर्चा में बने रहना उनकी राजनीति का ईंधन है.

अभिषेक जी. दस्तीदार और अनिलेश एस. महाजन

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