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देश का मिज़ाज सर्वे: 57 फीसद लोग क्यों कर रहे RSS प्रमुख भागवत के 3 बच्चे पैदा करने वाले बयान का समर्थन?

सामाजिक-राजनैतिक सुधारों के लिए सरकार को मजबूत समर्थन मिल रहा है, लेकिन लोकतंत्र, धार्मिक ध्रुवीकरण और महिला सुरक्षा को लेकर लोगों की चिंताएं बढ़ रही है

मोहन भागवत के तीन बच्चे वाले बयान से देश के 57 फीसद लोग सहमत (फाइल फोटो)
मोहन भागवत के तीन बच्चे वाले बयान से देश के 57 फीसद लोग सहमत (फाइल फोटो)
अपडेटेड 27 फ़रवरी , 2025

कभी नियोजित परिवार की प्रतीक और विकास की पहलकदमियों में प्रमुख रही 'हम दो, हमारे दो' की अवधारणा अब पड़ताल के दायरे में आती दिखती है. ताजातरीन इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वेक्षण से पता चलता है कि उत्तरदाताओं की बड़ी तादाद करीब 56.5 फीसद लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत की इस अपील से सहमत हैं कि आबादी में गिरावट को रोकने के लिए परिवारों को तीन बच्चे पैदा करने चाहिए.

निम्न शैक्षणिक स्तर वाले लोग इसका समर्थन करने वालों में सबसे ज्यादा हैं और ऐसे 63 फीसद लोगों ने इस विचार का अनुमोदन किया. क्षेत्रीय भिन्नताएं भी साफ हैं और पूरब के 50 फीसद उत्तरदाता इस प्रस्ताव के खिलाफ हैं. मंदिर-मस्जिद विवादों को खत्म करने के भागवत के आह्वान को भी अच्छा-खासा समर्थन मिला है. 67 फीसद ने इसका समर्थन किया. मगर इस सर्वे में ऐतिहासिक रूप से मंदिरों के ऊपर मस्जिदें बनाए जाने का दावा करने वाले मुकदमों के पक्ष में भी प्रबल समर्थन 57.9 फीसद सामने आया.

वहीं, दोनों तरफ 38-38 फीसद के साथ राय इस बात पर बराबर-बराबर बंटी हुई है कि अगर अदालतें ऐसे दावों की तस्दीक कर दें तो मौजूदा धार्मिक ढांचों को तोड़ देना चाहिए या नहीं. वक्फ बोर्डों की मिल्कियत वाली जमीनों को फिर हासिल करने के सरकारी प्रस्ताव ने इस बहस का और ज्यादा ध्रुवीकरण कर दिया है. 56 फीसद मुस्लिम उत्तरदाताओं ने इस कदम का विरोध किया, तो सबसे ज्यादा 78 फीसद समर्थन इसे अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) में मिला.

'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के विचार को लगातार मजबूत समर्थन मिल रहा है, जहां 66.8 फीसद इसके समर्थक हैं. वैसे अगस्त 2024 के देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के मुकाबले इसमें 5.6 फीसद अंकों की गिरावट आई है. बावजूद इसके कि कुछ राज्य जाति-आधारित सर्वे कर रहे हैं, जिनमें सबसे ताजातरीन तेलंगाना है, अखिल भारतीय जाति-आधारित गणना के पक्ष में राष्ट्रीय समर्थन छह महीने पहले के 73.8 फीसद से थोड़ा गिरकर 69.3 फीसद पर आ गया है. सबसे मजबूत समर्थन इसे अनुसूचित जातियों (77 फीसद), अनुसूचित जनजातियों (75 फीसद) और ओबीसी (71 फीसद) में मिला है.

उनके मुकाबले थोड़ा कम 62 फीसद ऊंची जातियों के उत्तरदाताओं ने इसका समर्थन किया. वहीं राष्ट्रव्यापी समान नागरिक संहिता (यूसीसी) हाल में उत्तराखंड में लागू को अच्छा-खासा समर्थन मिला है, जहां 72.6 फीसद इसे लागू करने के पक्ष में है. यह आंकड़ा पिछले सर्वे मंर भी 76.4 फीसद जितना ज्यादा था.

भ्रष्टाचार से निबटने में सरकार की कामयाबी के बारे में धारणाएं थोड़ी कमजोर पड़ी हैं. अगस्त 2024 के 55.7 फीसद के मुकाबले कुछ कम 52.7 फीसद लोग मानते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार को कम किया है. वहीं 47.3 फीसद ने या तो कम होने से इनकार किया या इसको लेकर संदेह जताया. लोकतांत्रिक आजादी को लेकर चिंताएं कायम हैं.

लोकतंत्र को खतरे में मानने वाले उत्तरदाताओं का अनुपात 41.9 फीसद से बढ़कर 46.3 फीसद पर पहुंच गया, तो यह आंकड़ा एससी उत्तरदाताओं में सबसे ज्यादा (52 फीसद) है. न्यायिक आजादी को लेकर भी चिंताएं साफ दिखती हैं. 48.8 फीसद लोग विपक्ष के इस दावे से सहमत हैं कि मोदी कार्यकाल में इसमें गिरावट आई है जो असहमत होने वाले 48 फीसद से कुछ ज्यादा हैं.

सांप्रदायिक सौहार्द के सवाल पर राय बंटी हुई है. 39.8 फीसद लोग मानते हैं कि यह बेहतर हुआ है जो अगस्त 2024 के 37.9 फीसद से ज्यादा हैं. अन्य 32.7 फीसद को लगता है कि इसमें गिरावट आई है, जो पिछली बार के 28.1 फीसद से ज्यादा हैं. मगर धार्मिक अल्पसंख्यक खासकर चिंता जताते हैं, जिसमें 61 फीसद ईसाई और 56 फीसद मुसलमान उत्तरदाताओं ने स्थिति के और बिगड़ने की ओर इशारा किया.

महिलाओं की सुरक्षा के बारे में धारणाएं बदतर हुई हैं और 42.9 फीसद का मानना है कि देश कम सुरक्षित हो गया है, जो छह महीने पहले के 37.9 फीसद से ज्यादा हैं. क्षेत्रीय असमानताएं भी मौजूद हैं, जहां पूर्वोत्तर के 52 फीसद और पश्चिम के 50 फीसद उत्तरदाताओं ने चिंताएं जाहिर की हैं. सोशल मीडिया के असर को लेकर शोरगुल के बीच 31.6 फीसद लोग इसे जनमत को गढ़ने में सकारात्मक असर डालने वाला मानते हैं, जबकि 21.8 फीसद नकारात्मक मानते हैं. सार्वजनिक परिवहन के बुनियादी ढांचे को बेहतर मूल्यांकन हासिल हुआ है.

करीब 45 फीसद इसे उत्कृष्ट या अच्छा आंकते हैं और सिर्फ 20.8 फीसद ने इसे खराब या बहुत खराब कहा. सड़कों को और भी ऊंची रेटिंग मिली, जहां 50.7 फीसद ने इन्हें उत्कृष्ट या अच्छा आंका. जहां तक पूर्ण विद्युतीकरण और वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनों के विस्तार की तरफ बढ़ रहे भारतीय रेलवे की बात है, सिर्फ 34.6 फीसद इसके निजीकरण के समर्थन में हैं. इससे पता चलता है कि जनमत अब भी इसे सरकारी नियंत्रण में रखने के पक्ष में है.


49% उत्तरदाता भारतीय रेलवे के निजीकरण का विरोध करते हैं, जबकि 35 फीसद इसका समर्थन करते हैं और 13 फीसद तटस्थ हैं 

 

 

 

 

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