इस बार गणतंत्र दिवस पर जब दिल्ली समेत पूरे भारत में देश की बेहतरी के लिए काम करने की कसमें खाई जा रही थीं, ठीक उसी दोपहर को राष्ट्रीय राजधानी में ठीक इसके उलट एक मोलभाव चल रहा था. इस भ्रष्टाचार के एक सिरे पर थे उच्च शिक्षा संस्थानों की रैंकिंग करने वाली सरकारी एजेंसी राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (नैक) से जुड़े प्रोफेसर और दूसरी तरफ वे प्रतिनिधि जिनसे उनके संस्थान की ऊंची रैंकिंग के लिए घूस मांगी जा रही थी. हालांकि यह बात छिपी नहीं रही और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को अपने 'सूत्रों' से इसकी भनक लग गई.
दरअसल, यह मामला आंध्र प्रदेश के गुंटूर कोनेरू लक्ष्मैया एजुकेशन फाउंडेशन (केएलईएफ) डीम्ड यूनिसर्विटी से जुड़ा हुआ है. इसके मूल्यांकन के लिए जो नैक टीम गई थी, उसने अच्छी रेटिंग देने के लिए संस्थान से 1.80 करोड़ रुपए की रिश्वत मांगी. फिर यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) तक पहुंचा और अब इस मामले में 10 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है. यह मामला सामने आने के बाद नैक में मूल्यांकन के लिए गठित की जाने वाली टीम और इसकी पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया के साथ एजेंसी की कार्यप्रणाली पर कई तरह के सवाल खड़े हो गए.
इन सवालों की क्या अहमियत है, इसको जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि नैक का ढांचा क्या है और यह कैसे काम करती है. दरअसल, नैक की स्थापना 1994 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के तहत एक स्वायत्त संस्था के रूप में की गई थी. यूजीसी के चेयरमैन ही इसके पदेन चेयरमैन होते हैं. फिलहाल इस पद पर एम. जगदीश कुमार हैं. नैक का मुख्यालय बेंगलूरू में है और प्रशासनिक प्रमुख ही इसका निदेशक होता है. गणेशन कन्नाबिरन अभी इसके निदेशक हैं. नैक को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह उच्च शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता सुनिश्चित करे. इस काम के लिए नैक में जनरल काउंसिल और एग्जीक्यूटिव काउंसिल गठित की गई हैं.
नैक के रोजमर्रा के कार्यों के लिए अकादमिक दुनिया के लोगों के अलावा अन्य विशेषज्ञों की भी नियुक्ति की जाती है. लेकिन नैक का जो मुख्य कार्य उच्च शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करना और इसके मुताबिक रेटिंग देना है, इस कार्य के लिए नैक अपने प्रशासनिक ढांचे के बाहर के विशेषज्ञों पर काफी हद तक निर्भर है. हालांकि, अलग-अलग उच्च शैक्षणिक संस्थानों से नैक टीम के सदस्य रखने के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि इनका आपस में इतना परिचय नहीं होता कि ये मिलकर कुछ गड़बड़ी कर सकें.
लेकिन केएलईएफ के मूल्यांकन में हो रहा भ्रष्टाचार कुछ और ही कहानी बयान करता है. इसके लिए जो नैक टीम गई थी, उसकी अध्यक्षता झारखंड के पलामू जिले में स्थित रामचंद्र चंद्रवंशी विश्वविद्यालय के कुलपति समरेंद्र नाथ साहा कर रहे थे. इसके सदस्यों में जेएनयू के प्रोफेसर राजीव सिजारिया थे. उनके अलावा तमिलनाडु के भरत इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ के डीन डी. गोपाल, भोपाल के जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी के डीन राजेश सिंह पवार, ग्रेटर नोएडा स्थित जीएल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ऐंड मैनेजमेंट के निदेशक मानस कुमार मिश्र, दावणगेरे विश्वविद्यालय की प्रोफेसर गायत्री देवराज, बेंगलूरू विश्वविद्यालय के एम. हनुमंतप्पा और संबलपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बुलु महाराणा इस नैक समिति के सदस्यों में शामिल थे. ये सभी अलग-अलग संस्थानों और अलग-अलग राज्यों के हैं फिर भी, सीबीआईके मुताबिक, इन सभी लोगों ने आपस में मिलकर नैक मूल्यांकन की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को अंजाम दिया.
केएलईएफ मामले में सीबीआई अब तक 10 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है. इसमें नैक समिति के अध्यक्ष साहा, सिजारिया, मिश्र, गायत्री देवराज के अलावा केएलईएफ के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं. अब तक गिरफ्तार होने वालों में केएलईएफ यूनिवर्सिटी के कुलपति जी.पी. सारधी वर्मा, केएलईएफ के उपाध्यक्ष कोनेरू राजा हरिण और केएल यूनिवर्सिटी के हैदराबाद परिसर के निदेशक ए. रामकृष्ण के अलावा संस्थान के कुछ अन्य कर्मचारी शामिल हैं. सीबीआई ने अपनी एफआईआर में 14 लोगों को नामजद किया है.
सीबीआई का दावा है कि केएलईएफ को अपनी मर्जी की रेटिंग देने के लिए समिति की तरफ से 1.80 करोड़ रुपए की मांग की गई. केएलईएफ प्रबंधन की बातचीत समिति के सदस्य सिजारिया के माध्यम से हो रही थी. सीबीआई की एफआइआर के मुताबिक, 25 जनवरी को केएलईएफ के उपाध्यक्ष कोनेरू राजा हरिण और केएलईएफ के हैदराबाद कैंपस के निदेशक रामाकृष्णन ने सिजारिया के साथ दिल्ली में बैठक की. इसी में सिजारिया ने 1.80 करोड़ रुपए की मांग की और कहा कि वे पूरी समिति को 'मैनेज' कर लेंगे.
सीबीआई के मुताबिक, सिजारिया ने यह भी कहा कि रिपोर्ट उन्हें ही तैयार करनी है, इसलिए उनका हिस्सा 1.30 करोड़ रुपए होगा और बाकी लोगों को वे 50 लाख रुपए में मैनेज कर लेंगे. इस बैठक के बाद केएलईएफ के दोनों लोगों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बात की. अगले दिन यानी 26 जनवरी को ये दोनों रिश्वत की रकम पर मोलभाव करने फिर से सिजारिया के घर पहुंचे और बताया कि वे हर सदस्य को तीन लाख रुपए और एक लैपटॉप दे सकते हैं. रिश्वत के इस मोलभाव में यह तय हुआ कि सिजारिया को वे 10 लाख रुपए दे सकते हैं. इस पर दोनों पक्षों में सहमति बन गई. सीबीआई का कहना है कि अगले दिन यानी 27 जनवरी को ये लोग सिजारिया के घर पर 10 लाख रुपए देने गए थे.
इस पूरे मामले पर यूजीसी के चेयरमैन और नैक की जनरल काउंसिल के अध्यक्ष एम. जगदीश कुमार कहते हैं, "इस मामले में निर्धारित प्रोटोकॉल और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए उचित कार्रवाई की जाएगी." नैक के निदेशक गणेशन कन्नाबिरन का पक्ष जानने के लिए इंडिया टुडे ने उनके कार्यालय से संपर्क साधा लेकिन इसके बावजूद उनसे कोई बातचीत नहीं हो पाई.
यह भी दिलचस्प बात है कि नैक की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए राधाकृष्णन समिति की रिपोर्ट बीते साल यानी 2024 में ही आई थी. केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की स्वीकृति के बाद नैक इसे चरणबद्ध तरीके से लागू कर रही है. हालांकि इसमें भी जो सुधार सुझाए गए हैं, उसमें मूल्यांकन के लिए बाहरी विशेषज्ञों पर नैक की निर्भरता खत्म करने संबंधित कोई सुझाव शामिल नहीं हैं, लेकिन ताजा मामला बताता है कि यह नैक की ऐसी कमजोर कड़ी साबित हो सकता है, जिससे उसकी पूरी विश्वसनीयता ही धराशायी हो जाए.
नैक से कैसे मिलती है ग्रेड
> नैक ग्रेडिंग उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए ऐच्छिक है, यानी इसके लिए उन्हें खुद ही आवेदन देना होता है.
> संस्थान की तरफ से मिले दस्तावेजों की जांच कर नैक मूल्यांकन का फैसला करती है. फिर नैक की विशेषज्ञ समिति संस्थान का दौरा कर विभिन्न मानकों पर अपने ढंग से मूल्यांकन करती है.
> मूल्यांकन से मिले अंकों के आधार पर संस्थान को ग्रेड दी जाती है. इसकी कुल आठ श्रेणियां हैं : ए++, ए+, ए, बी++, बी+, बी, सी और डी. यह ग्रेडिंग पांच साल के लिए मान्य होती है.