
बजट 2025 की सबसे बड़ी बात किसी की भी नजर से ओझल नहीं हुई. देश के मध्यम वर्ग को कर में कुछ रियायत मिली, आयकर का बोझ कुछ कम किया गया. यह मोदी सरकार की रणनीति की दिशा में बदलाव का संकेत है. यानी विकास दर तेज करने के लिए पूंजीगत खर्च पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए अब जोर खपत बड़े पैमाने पर बढ़ाने पर है.
लस्तपस्त मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दम भरने के सरकार के इरादे का भी बजट में इशारा मिला. दरअसल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के सिर्फ 17 फीसद पर अटका हुआ है, जो पांच साल पहले तय लक्ष्य 2025 तक 25 फीसद से काफी पीछे है.
बजट 2025 में राष्ट्रीय उत्पादन मिशन का ऐलान स्वागतयोग्य कदम है, खासकर इसलिए कि उसका फोकस कुटीर, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को निचली विकास दर के गर्त से बाहर निकालने पर है. इसी तरह सरकार का इरादा नियमों के मकड़जाल को तोड़ना भी है, जिसकी वजह से उद्यमशीलता के पैर बेड़ियों से जकड़े हुए हैं.
इसके लिए गैर-वित्तीय क्षेत्र में नियमों, सर्टिफिकेशन, लाइसेंस और मंजूरी के झमेलों की समीक्षा के लिए उच्चस्तरीय समिति के गठन का प्रस्ताव किया गया है. ये झमेले किसी उद्योग की स्थापना में बेहिसाब देरी का सबब बनते हैं. ऊपर से बढ़ती लागत और भ्रष्टाचार का पहलू अगल से. तेज विकास रफ्तार के लिए इन मामलों में आगे बढ़ने के साथ ही दूसरे कई सुधारों पर जोर देने की दरकार है.
इनमें ढेरों पहलकदमियां सरकार की बाट जोह रही हैं. सरकार ने प्रत्यक्ष कर स्लैब में फेरबदल करके करदाताओं को थोड़ी राहत तो दी है, लेकिन परोक्ष कर में सुधार को छुआ भी नहीं जा सका है. माल और सेवा कर (जीएसटी) अपने बहुप्रचारित अच्छे और सरल कर के आसपास दूर-दूर तक नहीं है. उसके पांच स्लैब की तीखी आलोचना हुई है, खासकर न्यूनतम मूल्य इजाफे के साथ एक ही उत्पाद पर अलग-अलग टैक्स की खातिर.
सबसे बड़ी मिसाल मामूली-सा पॉपकॉर्न ही है. उस पर कारमेलाइज्ड होने पर 18 फीसद जीएसटी लगता है, जबकि बिना पैक किए और बिना लेबल के सिर्फ नमक और मसालों वाले पॉपकॉर्न पर 5 फीसद. हालांकि, एक ही उत्पाद पर अलग-अलग टैक्स जीएसटी की तो सिर्फ एक समस्या है. जीएसटी रिटर्न दाखिल करने की उलझाऊ प्रक्रिया दूसरी बड़ी समस्या है. केंद्र लंबे समय से जीएसटी को तर्कसंगत बनाने और इनपुट क्रेडिट का दावा करने की प्रक्रिया को सरल बनाने का वादा करता रहा है, लेकिन अब इसका वक्त आ गया है.
जहां तक एमएसएमई की बात है तो सबसे आम शिकायत यह है कि भारी आयात शुल्क, डंपिंग रोधी शुल्क और सुरक्षा शुल्क बड़े उद्योगों के मुआफिक है और उससे छोटे उद्यमों की लागत बढ़ जाती है, जिससे बाजार में होड़ करने की उनकी ताकत घट जाती है. फिर कारोबारी सहूलियत का चाहे खूब ढिंढोरा पीटा जाता हो, लेकिन कारोबारियों को जकड़ने वाली कानूनी प्रक्रियाएं अब भी अच्छी-खासी हैं.
लगभग 70,000 ऐसी प्रक्रियाएं है, जिनमें 26,000 से ज्यादा में जेल के प्रावधान हैं. ये कानूनी खर्च भी भारी बोझ बढ़ाते हैं. नाकाम उद्योग उस उपक्रम को ठीक से समेट सकें, समाधान की उस प्रक्रिया में उनकी मदद के लिए आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 ने ''दिवालिया और दिवालियापन सुधार’’ की वकालत की लेकिन वही सलाह बजट दस्तावेज में शामिल नहीं हुई. सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने सर्वेक्षण की प्रस्तावना में कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें अर्थव्यवस्था का माइक्रो मैनेजमेंट बंद करें और ''रास्ते से हटने’’ की दिशा में काम करें. उनकी सलाह पर पूरी तरह गौर किया जाना चाहिए.
विनिवेश एक और मामला है जिस पर लगता है कि सरकार धीमे चल रही है. एयर इंडिया को छोड़कर, केंद्र 2021 की सूची में शामिल उद्यमों में विनिवेश नहीं कर पाया है. ये हैं बीपीसीएल, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, आइडीबीआइ बैंक, बीईएमएल, पवन हंस और नीलाचल इस्पात निगम वगैरह. इसके बजाए, इन कंपनियों में और ज्यादा पैसा डाला जा रहा है, जिनमें कुछ बीमार हैं. मसलन, एमटीएनएल को लें. सितंबर 2024 में उसका घाटा 890 करोड़ रुपए और कुल कर्ज 32,145 करोड़ रु. था.
यह उसकी कमाई से 40 गुना ज्यादा है, जिससे वह 5,774 करोड़ रु. के भुगतान नहीं कर सका है. 2021 से 2025 तक औसतन सालाना विनिवेश महज 25,000 करोड़ रु. है. यह 2014 से 2020 के बीच मोदी सरकार की सालाना उपलब्धि का आधा है. फिर, पश्चिमी दुनिया की चीन+1 नीति के मद्देनजर भारत के लिए अवसरों के खुलने की लगातार चर्चा होती है, लेकिन भारत को अगर वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में ज्यादा बढ़-चढ़ कर भूमिका निभानी है, तो उसे अपने निर्यात को और ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनने की जरूरत है. इसके लिए निर्यातकों को कर्ज का बेहतर प्रवाह, रसद लागत में कमी, हमारे उत्पादों के विपणन प्रयासों में सुधार और अधिक व्यावहारिक मूल्य वाली मुद्रा की जरूरत होगी.
लगातार परेशानी का विषय श्रम कानून भी बने हुए हैं. उनमें सुधार लंबे समय से अधर में लटके हुए हैं. देश ने 5-6 साल पहले चार नई श्रम संहिताएं पारित की थीं—वेतन (2019), औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियां. लेकिन उन्हें अभी तक लागू नहीं किया जा सका है. पिछली बार कृषि कानूनों को लेकर भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने कृषि क्षेत्र में भी मूलभूत सुधारों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) मंडियां सुधार की बाट जोह रही हैं, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक बेहतर फ्रेमवर्क की और सामुदायिक खेती को नीतिगत समर्थन मिलने का इंतजार है.
सरकार की कार्य सूची अंतहीन है. इसके मद्देनजर बजट 2025 में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान दिया गया है और नया नजरिया पेश किया गया है, लेकिन उन पर अमल अगर लुंजपुंज हो तो सबसे अच्छी योजनाएं भी नाकाम हो जाती हैं. और इसी मामले में केंद्र को अपनी कोशिशें काफी तेज करनी चाहिए. वह बजट में प्रस्तावित सुधारों पर और संभव हो तो उससे आगे भी तेज कदम बढ़ाए.
बजट में प्रत्यक्ष करों के मामले में बड़ी छूट तो दी गई, मगर सरकार अभी भी जीएसटी सुधारों की ओर कदम नहीं बढ़ा पाई है.
जीएसटी: लोगों को चाहिए एक अच्छा और सरल टैक्स
अमल खराब हो तो अच्छे इरादे पर पानी फिर जाता है. जुलाई 2017 में पहली नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से लागू किए गए माल और सेवा कर (जीएसटी) के बारे में यही कहा जा सकता है. आठ साल बाद भी देश की जीएसटी दुनिया के उन कुछ जीएसटी में एक है जिसमें कई स्लैब हैं, बढ़ती जटिलता है, गलत वर्गीकरण है और बेईमानी के लिए पूरी गुंजाइश है.
नवंबर 2024 में नई दिल्ली में स्कॉच समिट में 14वें वित्त आयोग के पूर्व सदस्य तथा अर्थशास्त्री एम. गोविंद राव ने कहा था, ''दुनिया भर में जीएसटी को पैसा कमाने की मशीन माना जाता है. सबसे अच्छा तरीका व्यापक आधार, कम दरों की, सरल और पारदर्शी जीएसटी प्रणाली है. राजनैतिक मजबूरियों के कारण एकल दर भले संभव न हो पाए लेकिन दरों की संक्चया घटने से स्पष्टता और दक्षता आएगी.’’

फिलहाल जीएसटी में पांच स्लैब हैं—0 फीसद, 5 फीसद, 12 फीसद, 18 फीसद और 28 फीसद. इसके साथ ही कीमती धातुओं जैसी कुछ वस्तुओं के लिए विशेष दरें और अवांछनीय वस्तुओं पर अतिरिक्त उपकर लगता है. इसमें 5 फीसद वाला स्लैब 21 फीसद वस्तुओं पर लागू होता है जबकि 12 फीसद स्लैब 19 फीसद पर, 18 फीसद 44 फीसद पर, 28 फीसद का उच्चतम स्लैब 3 फीसद वस्तुओं पर लागू होता है. उलझान उस वक्त होती है जब वैल्यू एडिशन से एक ही उत्पाद पर अलग-अलग दरें लागू होती हैं.
सरकार दरों को तर्कसंगत बनाने के अपने इरादे बताती रही है. सितंबर 2021 में उसने दरों को तर्कसंगत बनाने के लिए एक मंत्री-समूह का गठन किया. लेकिन कोई प्रगति नहीं हुई. वित्त मंत्री ने बजट के बाद मीडिया से कहा, ''तर्कसंगत का मतलब महज दरों को कम करना नहीं है. यह भी तय करना है कि 0, 5, 12, 18 और 28 फीसद के स्लैब हैं तो हम 18 या 12 या जो हो, में से एक दर को हटा कर निकटतम संभव दर पर ले जा सकते हैं...’’
बैंक ऑफ बड़ौदा में मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस जीएसटी दाखिल करते समय कई जटिलताओं को सहज करने की जरूरत बताते हैं. वे कहते हैं, ''लोगों को उम्मीद है कि दरें कम होंगी. लेकिन जीएसटी कमाई का जरिया है, इसलिए सरकार बदलाव की जल्दबाजी के मूड में नहीं होगी.’’ यह समझने की जरूरत होगी कि क्या दरें कम करने के बाद भी कमाई अच्छी होती रहेगी.
इसके अलावा ज्यादा से ज्यादा छोटे और मझोले उद्यम जीएसटी नेटवर्क में जुड़ते जा रहे हैं. वे कहते हैं, ''हमें नहीं पता कि ऊंची कमाई में कितनी बेहतर अनुपालन से है और कितनी अर्थव्यवस्था की आंतरिक वृद्धि के कारण.’’ अंतत: सरकार को कुछ स्लैब खत्म करने होंगे, आधार बढ़ाना होगा और नाकामियां दूर करने के लिए डिजिटल टूल्स का लाभ उठाना होगा.
कई तरह के स्लैब से उलझन और पेचीदगी बढ़ रही है, इसलिए बेहद जरूरी है कि सरकार जीएसटी को तर्कसंगत बनाए और रिटर्न फाइल करने की प्रक्रिया आसान बनाई जाए.
कृषि: खेती की गांठें खोलनी होंगी
आज देश की 43 फीसद आबादी कृषि (पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी शामिल) पर निर्भर है और यह क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसटी) का 17 फीसद पैदा करता है. पिछले 25 वर्षों में कृषि 3.3-3.5 फीसद की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ी है जबकि जीडीपी में करीब 6.5 फीसद की वृद्धि हुई है. इसे हासिल करने के लिए देश जीडीपी का करीब 2 फीसद सब्सिडी में खर्च करता है.
हालात पहले की तरह ही हैं. ऐसे में कई नीति निर्माताओं का मानना है कि किसानों को निजी पूंजी की ओर धकेलना शायद थोड़ी जल्दबाजी थी—वापस लिए गए 2020 के कृषि कानूनों में ऐसा सोचा गया था—और ऐसा बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा जिसमें किसानों को अपनी उपज को जहां चाहें वहां बेचने की सुविधा हो.
संक्षेप में कहें तो ज्यादा फोकस वाले नजरिए की जरूरत है. इनमें सबसे पहला तो 6,639 कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) मंडियों के कानून में सुधार है. इसके अलावा ठेका खेती के लिए सक्षम तंत्र बनाने, निजी मंडियों की स्थापना के लिए ढांचे को मजबूत करने, आत्मनिर्भर कृषि के लिए 9,268 किसान-उत्पादक संगठनों (एफपीओ) की तरफ ले जाने में तेजी और समुदाय के स्वामित्व वाली कृषि के लिए नीतियों की जरूरत है.

इनके जरिए कृषि की जकड़न दूर की जा सकती है. सरकार को फिलहाल 1,410 एपीएमसी और निजी मंडियों को जोड़ने वाले ई-नाम नेटवर्क का दायरा बढ़ाना होगा और इलेक्ट्रॉनिक नेगोशिएबल वेयरहाउस रिसीट (ईएनडब्ल्यूआर) का इस्तेमाल वित्तीय साधन के रूप में बढ़ाकर उसका विस्तार करना होगा ताकि किसानों को उपज बेचने के लिए देशव्यापी बाजार मिल सके.
लेकिन पिछले पांच वर्षों में महज 4,000 के करीब ही वेयरहाउस इस सुविधा से जुड़ सके हैं जिनमें कुल लेनदेन करीब 10,000 करोड़ रुपए के आसपास ठिठका रहा है. अब आरबीआइ के दबाव से एनबीएफसी और बैंक ईएनडब्ल्यूआर को लेनदेन के लिए बतौर जमानत लेने लगे हैं. वेयरहाउसिंग, कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग में निवेश बढ़ाने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी की भी जरूरत होगी.
इसके लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसीए) के कुछ प्रावधानों को नरम बनाना होगा जो मूल रूप से जमाखोरी और कीमतों की जोड़-तोड़ पर नियंत्रण के लिए लाए गए थे. ईएनडब्ल्यूआर को वित्तीय साधन का दर्जा देने के साथ-साथ स्टोरेज इकाइयों का नेटवर्क बनाने से किसानों को उपज की कीमत पर ज्यादा नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी. इससे सरकार को दूर होने और सहकारी समितियों, एफपीओ, खाद्य कंपनियों, उद्योग जगत जैसी निजी इकाइयों को कारोबार करने की सुविधा मिलेगी और उसके पास इस लेनदेन की 'ग्रैंडफादरिंग’ होगी.
एक और झटका
केंद्र ने राज्यों पर एपीएमसी कानून में संशोधन का दबाव डाला है जिससे ठेका खेती (खरीदार और किसान उपज पर पहले से राजी हों) के प्रावधान बनें. सरकार को खाद, बिजली और सिंचाई पर सब्सिडी के बजाए नकदी हस्तांतरण पर सोचना होगा. इस सूची में कृषि ऋणों और कृषि बीमा के लिए ब्याज छूट शामिल नहीं.
सबसे पहले तो कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) मंडियों से संबंधित कानूनों में सुधार की जरूरत है. उसके बाद ही बाकी सुधारों के जरिए कृषि की वृद्धि दर बढ़ाई जा सकती है.
एमएसएमई: नियमों का मकड़जाल हटाइए
बजट में कई आयात पर शुल्क घटा दिए गए हैं, जिनमें इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) उद्योग में इस्तेमाल की जाने वाली लीथियम बैटरियों के निर्माण के लिए जरूरी मशीनरी और साजोसामान शामिल हैं. अलबत्ता कई दूसरे उद्योगों के लिए संरक्षणवादी नीतियां कायम हैं, जिसका असर एमएसएमई की प्रतिस्पर्धा और निर्यात की क्षमताओं पर पड़ेगा, लेकिन इस मुद्दे पर बजट मोटे तौर पर खामोश है.
भारतीय कुटीर, लघु और मझोले उद्यम महासंघ (एफआइएसएमई) के महासचिव अनिल भारद्वाज कहते हैं, ''कोई भी देश संरक्षणवादी आयात व्यवस्था को बनाए रखकर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा नहीं दे सकता.’’ मैन्युफैक्चरिंग के लिए अक्सर निश्चित कच्चे माल का आयात करने की जरूरत होती है, लेकिन एमएसएमई क्षेत्रों (जैसे प्लास्टिक, एल्युमिनियम, स्टील, कॉपर और टेक्सटाइल) के लिए जरूरी इनपुट पर ऊंचे आयात शुल्क, ऐंटी-डंपिंग शुल्क, और सुरक्षा शुल्क से लागतें बढ़ जाती हैं, जिससे भारतीय मैन्युफैक्चरिंग महंगी हो जाती है और निर्यात सिमट जाता है.

भारद्वाज बताते हैं, ''कच्चे माल की कीमतें कृत्रिम रुकावटों से काफी ज्यादा हैं, जो उन पर निर्भर तमाम उद्योगों पर असर डालती हैं.’’ मसलन, इस्पात पर ऊंचे शुल्कों का असर ऑटो कलपुर्जों, पूंजीगत सामान, मशीनरी और बिजली क्षेत्रों के एमएसएमई पर पड़ता है. मकसद घरेलू मैन्युफैक्चरिंग की रक्षा है. इनसे लागत बढ़ जाती है, और वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता घट जाती है.
सहूलियत न होने का एहसास
दूसरा मुद्दा 'कारोबारी मुश्किलात’ का है. आर्थिक सर्वे 2025 में कहा गया, ''नियम-कायदों के झंझट-झमेले सहज कामकाज में बाधा डालते हैं, श्रम उत्पादकता घटाते हैं, रोजगार वृद्धि को सीमित करते हैं, नवाचार का गला घोंट देते हैं और समग्र आर्थिक विस्तार को दबा देते हैं.’’ ज्यादा छोटे उद्यमों के लिए प्रबंधन और वित्तीय गुंजाइशें पहले ही सीमित हैं.
बहुत ज्यादा नियम काम शुरू करने, टिकने और बड़ा बनने की क्षमता में बाधा डालते हैं. अफसरशाही और पुराने कानून एक और अभिशाप हैं. मसलन, फैक्टरियों से जुड़े नियम-कायदे कारोबार के लिए 300 कर्मचारियों की एक फैक्टरी के बजाए 150-150 कमर्चारियों की दो फैक्टरियां चलाना आसान बनाते हैं.
केंद्र सरकार ने नियम-कायदों के मकड़जाल को आसान बनाने के लिए उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है, लेकिन सुधारों को युद्ध स्तर पर लागू करने की जरूरत है. अनुपालन प्रबंधन सॉफ्टवेयर कंपनी टीमलीज रेगटेक की 'जेल्ड फॉर डूइंग बिजनेस’ शीर्षक रिपोर्ट से पता चला कि देश में कारोबार को 69,233 कानूनों का पालन करना पड़ता है, जिनमें 26,134 में जेल के प्रावधान हैं.
50 से ज्यादा कर्मचारियों वाले एमएसएमई के लिए 500 से 900 नियम-कायदे हैं, जिसकी लागत प्रति वर्ष 12-18 लाख रुपए आती है. जन विश्वास विधेयक 1.0 ने जेल के 113 प्रावधानों को खत्म करके अच्छा कदम उठाया और आने वाले 2.0 संस्करण का लक्ष्य 100 और नियम-कायदों को अपराध मुक्त बनाना है. मगर यह काफी नहीं है.
छोटे उद्योगों की क्षमताएं और कामकाज के दायरे वैसे भी सीमित हैं, इसलिए बहुत ज्यादा नियम-कायदों के झंझट-झमेले उनके लिए काम शुरू करने, टिकने और आगे बढ़ने में रोड़ा बन जाते हैं.
विनिवेश: घाटे के सरकारी उद्यम बेचिए, गुंजाइश बनाइए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्सर दोहराया है कि सरकार का 'कारोबार में बने रहने का कोई काम नहीं’ है. मगर सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (पीएसयू) की हिस्सेदारी निजी खिलाड़ियों के पक्ष में जो कंपनियों को ज्यादा दक्षता से चला सकते हैं, छोड़ देने की योजनाएं कम से कम अभी खरी उतरती दिखाई नहीं देतीं. इसके बजाय केंद्र सरकार उनमें और ज्यादा धन उड़ेलती मालूम देती है, जिनमें कुछ बीमार हैं.
चार साल पहले फरवरी 2021 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021-22 का केंद्रीय बजट पेश किया था, तो विनिवेश को लेकर आशावादी माहौल था. ऐसा लगा था कि सरकार अपनी मिल्कियत की कुछ कंपनियों को बेच देगी. उसने विलय और परिसंपत्तियों की बिक्री की योजनाएं बनाई भी थीं. वित्त वर्ष 2021-22 में केंद्र ने पीएसयू के विनिवेश, निजीकरण और संपत्ति मौद्रीकरण से 1.75 लाख करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य रखा था.

उस योजना में भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमि., एयर इंडिया, भारतीय नौवहन निगम, भारतीय कंटेनर निगम, आइडीबीआइ बैंक, बीईएमएल, पवन हंस और नीलाचल इस्पात निगम का विनिवेश शामिल था. मगर टाटा ग्रुप के हाथों बेचे गए एयर इंडिया और नीलाचल इस्पात निगम को छोड़कर बाकी उद्यमों का विनिवेश शुरू तक नहीं हो पाया. सरकार बार-बार अपने लक्ष्यों से चूकते हुए वित्त वर्ष 2021-22 में महज 14,638 करोड़ रुपए जुटा सकी क्योंकि इन उद्यमों के खरीदार ही नहीं मिल सके. इसके अलावा शेयर बाजार के उतार-चढ़ावों के बीच कुछ कंपनियों के बाजार मूल्य में भारी गिरावट आई.
लक्ष्य से चूके
सरकार ने वित्त वर्ष 26 के लिए विनिवेश का लक्ष्य कहीं ज्यादा मामूली 47,000 करोड़ रुपए रखा है. वित्त वर्ष 25 के लिए 50,000 करोड़ रुपए के बजटीय अनुमान के मुकाबले संशोधित अनुमान 33,000 करोड़ रुपए है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विनिवेश और सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग के सचिव अरुणीश चावला ने कहा कि परिसंपत्तियों के मौद्रीकरण पर वे इस साल 'तेजी से’ आगे बढ़ेंगे. उन्होंने कहा कि विनिवेश का कोई निश्चित लक्ष्य नहीं है, लेकिन उद्देश्य सरकारी परिसंपत्तियों के प्रबंधन के जरिए मूल्य को अधिकतम बढ़ाना है.
विशेषज्ञों का कहना है कि खासकर राजकोषीय बाध्यताओं और ऋण-जीडीपी अनुपात को समय के साथ कम करने की जरूरत को देखते हुए केंद्र को 2021 की अपनी विनिवेश योजनाओं में नई जान फूंकनी चाहिए. इससे राजकोषीय गुंजाइश बनेगी. सूचीबद्ध कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी 40 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है. सरकार को अपना स्वामित्व उन्हीं तक सीमित रखना चाहिए जो रणनीतिक आर्थिक हितों की पूर्ति करती हैं.
सरकार विनिवेश के लक्ष्य से लगातार चूकती जा रही है. वित्त वर्ष 26 के लिए उसने बहुत मामूली 47,000 करोड़ रु. का लक्ष्य रखा है. वित्त वर्ष 25 का संशोधित अनुमान महज 33,000 करोड़ रुपए है.
इन्फ्रास्ट्रक्चर: सुधारो और रफ्तार बढ़ाओ
निजी क्षेत्र की बौद्धिक संपदा को संरक्षित कीजिए. सड़क सुरक्षा बढ़ाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कीजिए. स्वायत्त विमानन नियामक बनाइए. ये ऐसे कुछ निर्भीक सुधार हैं जिनकी अब रेल, राजमार्ग और विमानन जैसे क्षेत्रों को जरूरत है ताकि उनकी वृद्धि की क्षमताएं खुल सकें.
मसलन, रेलवे को लीजिए. राष्ट्रीय रेल योजना 2030 में माल ढुलाई में रेलवे की हिस्सेदारी बढ़ाकर 45 फीसद करने का इरादा रखा गया है जो अभी 25 से 28 फीसद है. इसके लिए क्षमता निर्माण, बड़े पैमाने पर निवेश और सहज प्रक्रियाओं के लिए इनोवेशन की जरूरत है. जाहिर है, कोई भी देश निजी क्षेत्र की भागीदारी के बिना इतना बड़ा सपना नहीं देख सकता.
लेकिन भारत में, रेलवे में निजी क्षेत्र का इनोवेशन पुरानी नीतियों के आगे लाचार है. विकसित की गई कोई भी नई तकनीक भारतीय रेलवे की अनुसंधान और विकास शाखा, अनुसंधान डिजाइन और मानक संगठन को सौंपनी जरूरी होती है. वैगन, डिब्बे और लोकोमोटिव बनाने वाली कंपनी टेक्समैको रेल ऐंड इंजीनियरिंग के उपाध्यक्ष इंद्रजीत मुखर्जी कहते हैं, ''बौद्धिक संपदा में सुरक्षा की कमी वैश्विक और घरेलू कंपनियों को नए डिजाइनों और आधुनिक रेलवे समाधानों में अनुसंधान और विकास में निवेश करने से रोकती है.’’

राह के रोड़े
निजी कंपनियों वाला नागरिक उड्डयन क्षेत्र अक्सर यह मांग उठाता रहा है कि उसके क्षेत्र की निगरानी संस्था-नागरिक उड्डयन महानिदेशालय में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए और उसे अमेरिका के फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन या यूरोपीय यूनियन एविएशन सेफ्टी एजेंसी की तरह एक स्वायत्त निकाय में बदला जाए.
भ्रष्टाचार को कम करने और विमानन सर्टिफिकेशन प्रक्रिया की समग्र दक्षता में सुधार के लिए सख्त सेवा मानकों को लागू करने की भी जोरदार मांग की जा रही है. एशिया पैसिफिक फ्लाइट ट्रेनिंग अकादमी के सीईओ और विमानन विशेषज्ञ हेमंत डी.पी. कहते हैं, ''डीजीसीए में कुछ बड़े बदलाव होने जरूरी हैं. एक ऐसे स्वायत्त निकाय की जरूरत है जिसका संचालन पेशेवर करते हों. इसमें अनावश्यक लालफीताशाही और देरी को खत्म करने की जरूरत है.’’
कुल मिलाकर, यह सब प्राथमिकताओं को नए सिरे से तय करने के बारे में है. राजमार्ग क्षेत्र को ही लीजिए जो मोदी सरकार की सफलता की कहानी है. वह समय दूर नहीं जब नए राजमार्गों के निर्माण से ज्यादा ध्यान मौजूदा राजमार्गों के प्रबंधन पर देने की जरूरत पड़ेगी. और इसके लिए एक धुरी की जरूरत है. डेलॉयट इंडिया में निदेशक राघव मदान कहते हैं, ''हमें कई सुधारों की जरूरत लगती है जिनमें एनएचएआइ को निर्माण कराने वाली एजेंसी के बजाय राजमार्ग का प्रबंधन करने वाली एजेंसी में बदलने की जररूत होगी.’’
उनका कहना है कि बेहतर सड़क डिजाइन और यातायात प्रवर्तन के जरिए सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता देनी होगी जो इन सुधारों की रीढ़ बनेगी. इन सुधारों के बिना इन क्षेत्रों का वैसा विकास नहीं हो पाएगा जिसके वे हकदार हैं.
निजी क्षेत्र की बौद्धिक संपदा को सुरक्षा प्रदान कीजिए. सड़क सुरक्षा बढ़ाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा कीजिए. स्वायत्त विमानन नियामक बनाइए.
आइटी और डीप टेक: लंबी डिजिटल छलांग चाहिए
भारत तकनीकी विकास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर है. जैसे-जैसे दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ), क्वांटम कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर में आगे बढ़ रही है, देश को डिजिटल नेतृत्व के अगले युग में आगे ले जाने के लिए सरकार को निर्णायक कदम उठाने होंगे. मजबूत एआइ तंत्र विकसित करना प्राथमिकता होनी चाहिए.
एआइ की क्षमता का इस्तेमाल स्वास्थ्य सेवा और पर्यावरण अनुकूलता से लेकर कृषि और ई-गवर्नेंस तक के उद्योगों में फैला हुआ है. इसका अहम केंद्र है ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (जीपीयू). ये जीपीयू एआइ कम्प्यूटेशन के पावरहाउस हैं. भारत में अभी भी एआइ इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास का शुरुआती दौर है. इस अंतर को पाटने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल को आगे बढ़ाने की जरूरत है ताकि देश की पहुंच अत्याधुनिक प्रोसेसिंग पावर तक हो.
भारत इस समय कई बुनियादी एआइ मॉडल पर काम कर रहा है, जिन्हें अगले वर्ष के भीतर तैनात किया जाना है. फिर भी, एक बड़ी बाधा डिजिटल-फर्स्ट डेटासेट की उपलब्धता है जो भारतीय इस्तेमाल के अनुरूप हो. इसका समाधान बड़े पैमाने पर समुदाय से जुटाए गए डेटा हो सकते हैं. हालांकि विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि ऐसी परियोजनाएं वास्तव में ओपन सोर्स होनी चाहिए, इसके लिए जरूरी हैं कि सभी चार आवश्यक घटक-एल्गोरिदम, डेटासेट, मॉडल वेट और सोर्स कोड-सार्वजनिक समीक्षा और इस्तेमाल के लिए सुलभ हों.

इसके अलावा भारतीय एआइ मॉडल को वैश्विक समकक्षों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपनी लागत और देरी कम करनी होगी जिसके लिए एल्गोरिदमिक दक्षता को प्राथमिकता देनी पड़ेगी. इस लक्ष्य को तेजी से हासिल करने के लिए भारत स्वदेशी जीपीयू डिजाइन विकसित करने के वास्ते तीन वैश्विक प्रौद्योगिकी दिग्गजों के साथ बातचीत कर रहा है. हो सकता है कि ये दुनिया के सबसे उन्नत प्रोसेसर की बराबरी न कर सकें लेकिन ऐसे कम खर्चीले विकल्प के रूप में काम कर सकते हैं जो एआइ इनोवेशन को बढ़ाए.
कई भारतीय राज्य, खास तौर पर दक्षिण में, एआइ अपनाने में आगे निकल गए हैं. उन्होंने पिछले साल शुरू किए गए राष्ट्रीय इंडिया एआइ मिशन से भी पहले उसे अपनाया है. हालांकि, भारत को एआइ कौशल की पहलकदमियों का उल्लेखनीय विस्तार करना होगा और एआइ स्टार्टअप्स में फिर से निवेश बढ़ाना होगा. 2024 में भारतीय एआइ स्टार्टअप्स ने सिर्फ 16.6 करोड़ डॉलर (मौजूदा विनिमय दर पर 1,445 करोड़ रुपए) जुटाए जो 2022 के 51.8 करोड़ डॉलर (4,510 करोड़ रुपए) से काफी कम हैं.
स्टार्टअप्स को थोड़ी जगह दीजिए
डीप टेक के महत्व को स्वीकार करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट भाषण में 'अगली पीढ़ी के स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए’ डीप टेक फंड ऑफ फंड्स का प्रस्ताव रखा. हालांकि उद्योग निकाय नैसकॉम ने शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए 10,000 करोड़ रुपए के कहीं ज्यादा मजबूत फंड की सिफारिश की थी.
नैसकॉम के अनुसार इस फंड को दो अहम क्षेत्रों को लक्षित करना चाहिए. पहला ईवी बैटरी, स्पेस तकनीक, बायोटेक और चुनिंदा एआइ फर्मों जैसे उच्च-विकास वाले क्षेत्रों का समर्थन करेगा और भारतीय स्टार्टअप्स को अमेरिकी और चीनी स्टार्टअप के साथ प्रतिस्पर्धा करने में मदद करेगा. दूसरा रक्षा, कृषि बायोटेक और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी रणनीतिक प्रौद्योगिकियों पर फोकस करेगा. ये ऐसे क्षेत्र हैं जो दीर्घकालिक तकनीकी संप्रभुता के लिए महत्वपूर्ण हैं. मजबूत आइटी और डीप टेक तंत्र बनाने के लिए नजरिए की जरूरत है.
सरकार अगली पीढ़ी के स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए डीप टेक फंड ऑफ फंड्स की संभावना तलाश रही है. इसके लिए एक ठोस रोडमैप की दरकार है.
शिक्षा केंद्रीय बजट: संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर स्मार्ट बनिए
केंद्रीय बजट 2025-26 में इन्फ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और शिक्षा में एआइ के इस्तेमाल की पहल की गई लेकिन यह देश के उच्च शिक्षा के माहौल में सही मायने में सुधार के लिए जरूरी कदम उठाने में नाकाम रहा. उच्च शिक्षा के लिए कुल आवंटन में मामूली पांच फीसद की बढ़ोतरी की गई है. यह आंकड़ा दुनिया के बेंचमार्क से कम है. देश सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का एक फीसद से भी कम अनुसंधान और विकास पर खर्च करता है.

अधूरे इरादों का साया
बजट की सबसे बड़ी खामी अनुसंधान और नवाचार के प्रति उसके आधे-अधूरे नजरिए में है. महत्वाकांक्षी घोषणाएं भी फंडिंग में कटौती से कमजोर पड़ जाती हैं. शिक्षा के लिए एआइ में तीन उत्कृष्ट केंद्रों के लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान है, लेकिन 'विश्व स्तरीय संस्थान’ योजना के लिए फंडिंग में 74 फीसद की भारी कटौती ने उसे दबा दिया है. उसका आवंटन 1,800 करोड़ रुपए से घटकर 475 करोड़ रुपए रह गया है. इससे वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी संस्थान बनाने की प्रतिबद्धता पर संदेह पैदा होता है.
इसी तरह, निजी क्षेत्र के तहत अनुसंधान और विकास के लिए तो 20,000 करोड़ रुपए के प्रावधान हैं, लेकिन अनुसंधान संबंधी पहलों के लिए कुल बजट में गिरावट आई है. उच्च शिक्षण संस्थानों में स्टार्टअप इंडिया पहल, इंप्रिट अनुसंधान पहल, शैक्षणिक और अनुसंधान सहयोग को बढ़ावा देने की योजना और एसटीआरएस (विज्ञान में परिवर्तनकारी और उन्नत अनुसंधान योजना) जैसी प्रमुख योजनाओं में कुल मिलाकर 8 फीसद की कटौती हुई है, जो 355 करोड़ रुपए से घटकर 327 करोड़ रुपए हो गई है. इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि निधियों का बड़े पैमाने पर कम उपयोग किया गया है, पिछले साल इन क्षेत्रों में 74.5 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे.
बजट में अब बेहतर शिक्षकों पर ध्यान होना चाहिए. इस मामले में बजटीय समर्थन बहुत कम है. मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम को 70 करोड़ रुपए मिले, जो 100 करोड़ रुपए से कम है. प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान (पीएम-यूएसएचए) के तहत निधि भी 1,815 करोड़ रुपए पर स्थिर बनी हुई है. विश्व स्तरीय संस्थानों को वित्तपोषित करने, शोध को मजबूत करने और संकाय भर्ती में सुधार करने में बजट कम पड़ गया. अगले बजट में उनमें सुधार किया जाना चाहिए, ताकि यह तय हो सके कि देश की उच्च शिक्षा प्रणाली में न सिर्फ क्रमिक सुधार हो, बल्कि बुनियादी बदलाव हो.
शोध और अनुसंधान की योजनाओं के लिए आवंटित फंड का काफी हद तक उपयोग नहीं हुआ और बेहतर शिक्षकों के मामले में सरकारी समर्थन न के बराबर है.
श्रम: सुधारों पर कुंडली न मारिए
देश के श्रम बल में अत्यधिक संख्या में लोग जुड़ रहे हैं. आखिरी गिनती तक उनकी संख्या 56.5 करोड़ है, जिनमें 55 फीसद मैन्युफैक्चरिंग, निर्माण और सेवा क्षेत्र से जुड़े हैं. आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, संगठित क्षेत्र में भारी वृद्धि देखी गई है. कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) में वित्त वर्ष 19 में 61 लाख के बदले वित्त वर्ष 24 में 1.31 करोड़ सब्सक्राइबर हो गए हैं.
नीति आयोग के मुताबिक, अल्पकालिक और लचीले काम करने वाले गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों की संख्या वित्त वर्ष 30 में 2.35 करोड़ हो जाने का अनुमान है. दरअसल, नए सालाना आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) रिपोर्ट के मुताबिक, नौकरी-पेशा से जुड़े या गंभीरता से रोजगार की तलाश कर रहे कामकाजी उम्र के लोगों की फीसद श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) वित्त वर्ष 18 में 49.8 फीसद से बढ़कर वित्त वर्ष 24 में 60.1 फीसद हो गई है.

फिर भी, श्रम सुधार लंबे समय से लंबित हैं. 2019-20 की चार नई श्रम संहिताएं औद्योगिक संबंध; सामाजिक सुरक्षा; मजदूरी; और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की सहूलियत से संबंधित हैं. लेकिन अभी तक लागू नहीं हो पाई हैं. उनका लागू होना केंद्र और राज्य सरकारों दोनों के संबंधित नियमों की अधिसूचना पर निर्भर है क्योंकि श्रम का संबंध संविधान की समवर्ती सूची से है. लागू होने पर ये संहिताएं 29 पुराने केंद्रीय कानूनों की जगह ले लेंगी, जिससे श्रमिकों के जीवन स्तर में बुनियादी सुधार आएगा.
बेहतर संहिताएं
इन संहिताओं से पुराने नियमों को सरल बनाने के अलावा उद्योग और रोजगार को बढ़ावा देने की उम्मीद है. इनमें गैर-जरूरी परिभाषाओं और प्रावधानों को हटाया गया है. इनमें कार्यस्थल सुरक्षा मानदंडों का आधुनिकीकरण भी किया गया है और विवाद निबटारा तंत्र भी है.
संहिताओं के तहत, गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों को भी सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने की बात है. हालांकि, सभी ट्रेड यूनियनें तैयार नहीं हैं. अब केंद्रीय श्रम मंत्रालय प्रमुख अंशों को लागू करने के लिए 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का अंतर-राज्यीय पैनल बना रहा है. लेकिन सरकार को ट्रेड यूनियनों के अंदेशे दूर करने के साथ आम सहमति बनानी चाहिए.
सरकार को नई श्रम संहिताओं को सुचारू ढंग से लागू करने के लिए आम सहमति बनानी चाहिए, ताकि उद्योग और रोजगार को बढ़ावा मिले.
निर्यात: रुकावटें दूर करिए
भारत के निर्यात में वृद्धि सुस्त बनी हुई है. दिसंबर 2024 तक देश का कुल निर्यात 70.67 अरब डॉलर (6.15 लाख करोड़ रुपए) था, जो पिछले साल के इसी महीने तक हुए निर्यात के मुकाबले थोड़ा ज्यादा था. उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, दूरसंचार और फार्मास्युटिकल्स सरीखे उभरते क्षेत्रों पर ध्यान देने और साथ ही कपड़ा और चमड़ा सरीखे श्रम-सघन उद्योगों को सहारा देने की जरूरत है, ताकि नौकरियों के सृजन को गति दी जा सके.
निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए कर्ज के प्रवाह में सुधार लाना और उधार लेने की लागत को कम करना जरूरी है. समुद्री और हवाई ढुलाई के बढ़ते खर्च ने निर्यातकों को पहले ही परेशान कर रखा है. साथ ही वैश्विक खरीदार नकदी की कमी से दो-चार हैं. फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस के डायरेक्टर-जनरल अजय साहनी कहते हैं, ''भुगतान चक्र आम तौर पर 45-60 दिनों का हुआ करता था, जो अब 120-130 दिनों का हो गया है. क्षेत्र को ज्यादा और लंबी अवधि के कर्ज की दरकार है.’’

सरकारी मदद मिले
खासकर एमएसएमई के लिए मार्केटिंग मदद अहम जरूरत है. इसके लिए वाणिज्य मंत्रालय ने सिर्फ 200 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं, जो निर्यात के 20 खरब डॉलर (174 लाख करोड़ रुपए) के लक्ष्य के लिए नाकाफी हैं. ढुलाई की लागत घटाना जरूरी है. मसलन, महाराष्ट्र में जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट पर कंटेनर-बंद कार्गों की शिपिंग का टर्नअराउंड टाइम 22 घंटे है, जो सिंगापुर या हांगकांग के 8-10 घंटे से बहुत ज्यादा है, जिससे लागत बढ़ जाती है.
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मजबूती के लिए प्रमुख मुक्त व्यापार समझौतों में तेजी जरूरी है जिनमें एक ब्रिटेन के साथ प्रस्तावित है और दूसरे पर यूरोपीय संघ के साथ बातचीत चल रही है. निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए निर्यातकों के कर्ज के प्रवाह में सुधार लाना और उधार लेने के लागत खर्च को कम करना बेहद जरूरी है.
पर्यटन: टुकड़े -टुकड़े में कदम न बढ़ाइए
पर्यटन क्षेत्र को लेकर सबसे अहम चिंता यह है कि भारत ने अभी तक अपनी पर्यटन रणनीति को कारगर नहीं बनाया है. डेलॉइट इंडिया के पार्टनर तथा कंज्यूमर इंडस्ट्री लीडर आनंद रामनाथन का कहना है कि केंद्रीय बजट में की गई 50 पर्यटन ठिकानों के विकास की घोषणा सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन उसे और आगे ले जाया जा सकता था. वे सवाल करते हैं, ''विकास के लिए महज 50 ठिकानों का चयन करने के बजाए 50 या 20-30 सर्किट की पहचान क्यों न की जाए?’’

उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि यहां लक्ष्य टूरिस्ट पैकेज तैयार करना होना चाहिए क्योंकि मौज-मस्ती की खातिर एक दिन के लिए जाने वाले लोगों के विपरीत सैलानी केवल एक ही जगह नहीं जाते. वे ज्यादातर कई दिनों की यात्रा की योजना बनाते हैं जिसमें आसपास की आकर्षक जगहें भी शामिल होती हैं. इसलिए पर्यटन में तेजी लाने के लिए समूचे क्षेत्र का और उससे जुड़े सभी पर्यटन स्थलों का विकास करने की जरूरत है.
राज्यों की जिम्मेदारी
बजट राज्यों के सहयोग पर जोर देता है. जिम्मेदारी राज्यों की है क्योंकि जमीनी अमल बुनियादी ढांचे, सुरक्षा, साफ-सफाई, कानून-व्यवस्था पर निर्भर करता है, जिनकी साज-संभाल स्थानीय स्तर पर की जाती है.
रामनाथन का सुझाव है कि एक लाख करोड़ रुपए के शहरी चुनौती कोष की तरह ही एक कोष पर्यटन के लिए लाया जा सकता था, जिससे नगर निगमों को प्रोत्साहन लाभ दिए जाते और पर्यटन विशेषज्ञों को प्रशिक्षित किया जाता.
एक दिक्कत स्थानीय पर्यटन एजेंसियों का न होना है. रामनाथन बताते हैं, ''हमें विदेशों में ये दिखते हैं—एयरपोर्ट हेल्प डेस्क सैलानियों की सहायता करती हैं.’’ ऐसी एजेंसियां स्थानीय लोगों को जोड़ सकती हैं, ऐसे तालमेल के बगैर पर्यटन क्षेत्र का विकास टुकड़ों-टुकड़ों में होगा, जो दीर्घकालिक न होगा.ठ्ठ
सुचारू और सहज पर्यटन माहौल के लिए ऐसी स्थानीय एजेंसियों की दरकार है, जो पर्यटन-स्थलों के स्थानीय संबंधित पक्षों को जोड़ सकें और उनके साथ तालमेल बैठा सकें.
—सोनल खेत्रपाल और अभिषेक जी. दस्तीदार.