—अरुण पुरी
अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए मनोभावना एक निर्णायक तत्व होता है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने हाल के बजट में साहसिक कदम उठाते हुए मध्य वर्ग के करदाताओं के मनोबल और जेब को जबरदस्त प्रोत्साहन दिया. जो लोग 12 लाख रुपए सालाना कमाते हैं, उन्हें अब किसी भी सूरत में कोई कर नहीं देना होगा; पहले यह सीमा 7 लाख रुपए थी.
इससे अच्छी खासी संख्या में एक करोड़ भारतीय आयकर के जाल से पूरी तरह बाहर निकल जाएंगे जो हमारे 3.2 करोड़ करदाता आधार का एक-तिहाई हैं. कर स्लैब को भी खासा तर्कसंगत बनाया गया है—अब 30 प्रतिशत की उच्चतम दर 24 लाख रुपए से ज्यादा की आय पर लागू होगी जो पहले 15 लाख रुपए थी. इससे सरकार को राजस्व में करीब 1 लाख करोड़ रुपए का नुक्सान होने का अंदेशा है.
उपभोग बढ़ाने के लिए हाल के वर्षों में मोदी सरकार की ओर से दिया गया यह सबसे बड़ा प्रोत्साहन है जो मुख्य अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए पूरी तरह पूंजीगत खर्च पर निर्भरता की बजाए दिशा में बदलाव की ओर इशारा करता है. वित्त वर्ष 26 के लिए पूंजीगत परिव्यय 11.21 लाख करोड़ रुपए पर बरकरार रखा गया है जो पिछले साल के आंकड़े से थोड़ा ही ज्यादा है. कई संदेहवादी अर्थशास्त्री कहते हैं कि प्रत्यक्ष करों में कटौती की तुलना में पूंजीगत खर्च का अर्थव्यवस्था पर ज्यादा व्यापक प्रभाव होता है.
अंदेशा जताने पर तो कोई कर है नहीं, पर दूसरे विशेषज्ञ मौजूदा राह को अच्छी राजनीति और मजबूत अर्थशास्त्र के तालमेल के रूप में देखते हैं. सरकार को उम्मीद है कि इससे अच्छा चक्र शुरू होगा. वित्त सचिव तुहिन कांत पांडेय ने यह सही कहा कि खर्च करने योग्य अतिरिक्त आय उपभोग, बचत या निवेश की तरफ जा सकती है. इन तीनों मामलों में धन आगे बढ़ता है और स्थिर रहने की बजाए विभिन्न क्षेत्रों को पल्लवित करता है. खुदरा निवेशक उद्योग की पूंजी जरूरत को पूरा करते हैं, बचत बैंकों के लिए उधार देने की पूंजी बन जाती है और उपभोग उत्पादन को बढ़ावा देता है जिससे अंततोगत्वा रोजगार पैदा होता है.
भारत सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढ़ता देश है. लेकिन 2024 की दूसरी तिमाही में सुस्ती स्पष्ट रूप से नजर आई थी. मध्यम अवधि में वैश्विक वृद्धि धीमी रहने की संभावनाएं हैं. इसलिए सीतारमण ने इन चुनौतियों से निबटने के लिए सही दिशा में फोकस किया है जिसे उन्होंने विकास के चार शक्तिशाली इंजन—मैन्युफैक्चरिंग, कृषि, निवेश और निर्यात—बताया है. भारत के सकल घरेलू उत्पाद में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान 17 प्रतिशत है, जो 2025 के मूल लक्ष्य 25 प्रतिशत से बहुत कम है.
बजट में सरकार ने इस क्षेत्र के अहम कारकों को सक्रिय करने पर ध्यान देते हुए नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन की घोषणा की है. एमएसएमई भारत के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की रीढ़ हैं, उनके लिए आकार के आधार पर वर्गीकरण मानदंडों को खासा संशोधित किया गया है जिससे कि कई और कारोबार सरकारी प्रोत्साहनों, सब्सिडी और क्रेडिट गारंटी के लाभ के दायरे में आ सकें. सुधारों की बात करें तो बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर 74 प्रतिशत की सीमा को पूरी तरह हटा दिया गया है, इस शर्त पर कि प्रीमियम का निवेश यहीं करना होगा.
सरकार ने पूंजीगत खर्च के लिए राज्यों को 50 साल के ब्याज मुक्त ऋण के रूप में 1.5 लाख करोड़ रुपए का परिव्यय रखा है, उनको प्रोत्साहित करने के लिहाज से यह अच्छा कदम है. कृषि की बड़ी घोषणाओं में दलहन में आत्मनिर्भरता के लिए छह साल का मिशन है. इसकी बहुत जरूरत थी क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 50 प्रतिशत आयात करता है. इस पर 2023-24 में 3.75 अरब डॉलर (32,858 करोड़ रुपए) खर्च हुए थे.
वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का लाभ उठाने के इच्छुक स्थानीय कारोबारों के लिए निर्यात संवर्धन मिशन मददगार की भूमिका निभाएगा. ट्रंप का असर कम करने के लिए मोटरसाइकिलों और यात्री वाहनों समेत कई वस्तुओं पर शुल्क कम किए गए हैं. अच्छी बात यह कि बजट में भविष्य की राह तैयार करने के साथ-साथ सीतारमण ने राजकोषीय विवेक को बनाए रखा है और वित्त वर्ष 26 में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.4 प्रतिशत पर रखने का वादा किया है.
हालांकि बजट 2025 कुल मिलाकर अच्छा है, लेकिन सरकार को प्रमुख मोर्चों पर पूरी ताकत लगानी होगी जिससे कि 8-10 प्रतिशत की महत्वाकांक्षी विकास दर हासिल करते हुए विकसित भारत बनने की दिशा में बढ़ा जा सके. विनिवेश का रिकॉर्ड काफी खराब रहा है. 2020-21 से 2024-25 तक सरकार लक्ष्य का केवल 29 प्रतिशत ही हासिल कर सकी है. यहां तक कि लक्ष्य भी कम होते जा रहे हैं. केवल वित्त वर्ष 22 में ही हम 1.75 लाख करोड़ रुपए का लक्ष्य हासिल कर पाए; इस बजट में यह मामूली 47,000 करोड़ रुपए का है.
ऐसा लगता है कि सरकार ने उदारीकरण के इस हिस्से पर फिर से विचार किया है. बुरी बात यह है कि सरकार लगातार संपत्तियां बेचकर निरंतर घाटे वाली एमटीएनएल और बीएसएनएल जैसी कंपनियों में पैसा डाल रही है, दोनों का घाटा क्रमश: 3,302 करोड़ रुपए और 5,371 करोड़ रुपए है. हाल में सरकार ने विजाग स्टील प्लांट को 11,440 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज जारी किया, जिसे 2023-24 में 4,850 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है और जिस पर कुल 17,000 करोड़ रुपए का कर्ज है.
बजट ने गैर-वित्तीय क्षेत्र में नियमों और विनियमों की उलझनों की समीक्षा के लिए उच्च-स्तरीय समिति बनाकर अच्छा काम किया है. लेकिन यह नौकरशाही का एक और आराम का या निहित स्वार्थों का अड्डा न बन पाए; केवल स्पष्ट समय-सीमा और लक्ष्य ही उन नियामकीय जड़ताओं को हटा सकते हैं जो कारोबार का प्रवाह रोक देती हैं. विनियमन की जांच के लिए समितियों की स्थापना स्वागत योग्य कदम है, लेकिन प्रस्तावों की सिफारिशों और लागू करने में वक्त लगता है.
शायद इसे कई बजटों से पहले भी किया जा सकता था क्योंकि 2011-12 से निजी निवेश घटता जा रहा है. यहां तक कि 2019 में कॉर्पोरेट करों में की गई कटौती का भी इस पर कोई असर नहीं हुआ है. खास बात यह कि इस वर्ष की आर्थिक समीक्षा में सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा है कि केंद्र और राज्य दोनों 'रास्ते से हटने' की दिशा में काम करें—यानी आर्थिक गतिविधियों का सूक्ष्म स्तर पर प्रबंध करना बंद करें.
सरकार को अराजक उल्लंघनकर्ताओं को पकड़ने के लिए जकड़बंदी भरे नियम लागू करने की बजाए अपने नागरिकों पर भरोसा करना सीखना होगा. तभी 'मनोबल का आवेग' ऊंचाइयों पर जाना शुरू करेगा जिसे वह अति उत्साह के साथ प्रोत्साहित करना चाहती है.
— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह).