दरअसल, दंडकारण्य के घने जंगलों में, जहां पत्तों की हर सरसराहट के साथ शिकार और शिकारी के बीच की सीमा रेखाएं धुंधली पड़ जाती हैं, अभी-अभी वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ देश की लंबे वक्त से चल रही लड़ाई का एक नाटकीय अध्याय लिखा गया. गैरकानूनी करार दी गई भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की सेंट्रल कमेटी में कद्दावर शख्सियत रहे आर.आर. प्रताप रेड्डी उर्फ चलपति का मारा जाना महज एक शख्स की मौत नहीं बल्कि उग्रवादी विद्रोह की राह में दूरगामी असर डालने वाली घटना है.
यह 62 वर्षीय माओवादी नेता और उसके 15 साथी—जिनमें छह महिलाएं भी थीं—21 जनवरी को ओडिशा की सीमा से सटे छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में रायपुर से पूर्व में 160 किमी दूर उदंती सीतानदी वन्यजीव अभयारण्य के नजदीक भीषण मुठभेड़ में मारे गए. ओडिशा में माओवादी गतिविधियां चला रहा चलपति अंतत: छत्तीसगढ़ के जिला रिजर्व गार्ड, ओडिशा के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की अहम कोबरा यूनिट की संयुक्त टीम के जाल में फंस गया. सेंट्रल कमेटी के सदस्य को खत्म करना सुरक्षा बलों के लिए कोई साधारण कामयाबी नहीं है. अक्सर माओवादी आंदोलन का दिमाग कही जाने वाली ये मायावी शख्सियतें मध्य और पूर्व भारत के विशाल तथा बीहड़ भूभाग में गुम होकर सुरक्षा बलों की पकड़ से बचती रही हैं.
जनवरी की 21 तारीख को हुई मुठभेड़ छत्तीसगढ़ में माओवादी विद्रोह के खिलाफ व्यापक, सघन और आक्रामक अभियान का हिस्सा है. 2023 के आखिरी महीनों से राज्य और खासकर हाल के वर्षों में वामपंथी उग्रवाद का नाभिकेंद्र रहे बस्तर इलाके में माओवाद-विरोधी कार्रवाइयों में उछाल आया. 2024 में कम से कम 219 माओवादी मारे गए, जो उससे पिछले साल मारे गए 20 के मुकाबले बहुत ज्यादा थे. अकेले जनवरी 2025 में ही राज्य में 48 माओवादी मारे गए.
चलपति की मौत माओवादियों के लिए बड़ा झटका है. एक करोड़ रुपए का यह इनामी अपराधी मुख्य रणनीतिकार और खूंखार शख्सियत था. आंध्र प्रदेश में रेशम उत्पादन अधिकारी से खूंखार 'सामरिक रणनीतिकार' तक चलपति का सफर विचारधारा से उपजे जोश और बेरहम महत्वाकांक्षा की कहानी है. आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में जन्मे चलपति ने वैचारिक प्रवक्ता के तौर पर अपना सफर शुरू किया. फिर ओडिशा के कोरापुट जिले में हथियारों का प्रशिक्षण लेने के बाद वह काडर के लिए खुद प्रशिक्षक बन गया. 1980 का दशक आते-आते वह भूमिगत हो चुका था. उसके सबसे कुख्यात शिष्यों में से एक माडवी हिडमा है, जो सीपीआइ (माओवादी) की हथियारबंद शाखा पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की बटालियन नंबर 1 का कमांडर है. वह घात लगाकर किए कुछ सबसे भयंकर हमलों के लिए जिम्मेदार रहा है. उनमें 2010 में दंतेवाड़ा में हुआ हमला शामिल है, जिसमें सीआरपीएफ के 76 जवान मारे गए थे.
मगर ज्यादातर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से आने वाले प्रतिबद्ध और शिक्षित नेताओं की अगुआई में कभी शक्तिशाली रहा माओवादी आंदोलन अब ढहने के कगार पर है. 2021 में प्रशांत बोस उर्फ किशन दा और 2023 में प्रमोद मिश्र सरीखी प्रमुख शख्सियतों की गिरफ्तारी और 2023 में कटकम सुदर्शन के मारे जाने के साथ सीपीआइ (माओवादी) का पोलितब्यूरो सिमट गया है. वहीं सेंट्रल कमेटी भी घटकर कमजोर हो गई है. इसके बाकी बचे 19 सदस्यों में से 14 दो तेलुगू राज्यों के हैं और 64 से 75 साल की उम्र के बीच ये सेहत के मसलों से जूझ रहे हैं. विचारधारा में कम ढले अगली पीढ़ी के नेता हिडमा की तरह बंदूक लहराते लड़ाकों से ज्यादा कुछ नहीं हैं.
केंद्र और राज्य सरकारों ने विद्रोह के मूल कारणों से निबटने के लिए विकास की पहलों के साथ सैन्य सटीकता को जोड़कर कार्रवाइयां तेज कर दी हैं. हाल में हैदराबाद में हुई एक रणनीति बैठक में आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और ओडिशा के खुफिया अधिकारियों ने 38 वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में उग्रवाद विरोधी उपायों की गहन पड़ताल की.
तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के पुलिस सूत्रों का कहना है कि बुढ़ाता माओवादी नेतृत्व सुरक्षा बलों की आधुनिक व्यूह रचनाओं का मुकाबला कर पाने में असमर्थ है. नाम न बताने की शर्त पर एक अधिकारी ने कहा, "कभी-कभार होने वाले आइईडी हमले अब भी सुर्खियां भले बटोर लें, मगर अब यह समर्थन नहीं जुटा पाता. उनके हमदर्दों को भी पता है कि अंत नजदीक है." केंद्रीय गृह मंत्रालय ने महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय कर दिया है—माओवादी उग्रवाद के समूचे अध्याय को मार्च 2026 तक इतिहास के गर्त में डाल देना. चलपति की मौत और माओवादी नेतृत्व के आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने के साथ यह लक्ष्य दूर की कौड़ी नजर नहीं आता.
खात्मे की ओर
> चलपति के मारे जाने के बाद, सीपीआइ (माओवादी) सेंट्रल कमेटी 19 सदस्यों तक सिमट गई है: 12 तेलंगाना के हैं, दो आंध्र प्रदेश के हैं. बाकी झारखंड और छत्तीसगढ़ के हैं. 2004 में इनकी संख्या 32 थी.
> इसके पोलितब्यूरो में भी केवल चार सदस्य बचे हैं. इनमें दो तेलंगाना से हैं, जहां वामपंथी उग्रवाद तकरीबन निष्क्रिय है.