—अरुण पुरी
भारतीयों का नेतृत्व करने वाली सियासी हस्तियां अलग-अलग मिजाज और अंदाज वाली रही हैं. इस लिहाज से आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल अपनी तरह के अनूठे नेता हैं. वे कोई खांटी नेता नहीं रहे बल्कि आम शहरी नागरिकों के बीच से निकलकर सियासत में आए. भ्रष्ट राजनीति के खात्मे और जनहितैषी शासन सुनिश्चित करने के आह्वान के साथ केजरीवाल ने राजनीति को 'आम आदमी' पर केंद्रित कर दिया.
उन्होंने उनकी बुनियादी जरूरतों, बदहाल व्यवस्था को लेकर उनकी हताशा को न केवल समझा बल्कि इन मुद्दों को उनकी आम बोलचाल की भाषा में पुरजोर ढंग से उठाया. भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा की अपनी मूल छवि की बदौलत वे 2013 में कुछ महीनों के लिए ही सही, पहला कार्यकाल पाने में सफल रहे. फिर जल्द ही केजरीवाल ने खुद को निम्न मध्य वर्ग के मसीहा और गरीबों के तारणहार के तौर पर स्थापित कर लिया.
कट्टर प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के हर पैंतरा आजमाने के बाद भी केजरीवाल ने 2015 और 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में आप को शानदार जीत दिलाई. नई पार्टी ने दिल्ली की कुल 70 सीटों में से क्रमश: 67 और 62 सीटें जीतीं, और बीजेपी के खाते में केवल तीन और आठ सीटें ही आईं. इस प्रभावशाली जीत ने निम्न वर्ग को कल्याणकारी योजनाओं की सौगात देने की राह खोली. इनमें मुफ्त बिजली और पानी, बेहतर सरकारी स्कूल और घर के आसपास ही स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना शामिल था.
हालांकि, 12 वर्षों से राजनीति के मैदान में जमे रहने वाले केजरीवाल पर कुछ दाग भी लगे हैं. केजरीवाल को चौतरफा घेरने में लगी बीजेपी के साथ तीखी सियासी झड़पें आप प्रमुख पर भारी पड़ी हैं. इसमें सबसे बड़ी चुनौती बना उनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की तरफ से दायर धनशोधन मामला. इसकी वजह से केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने से पहले करीब पांच महीने जेल में गुजारने पड़े.
ईडी ने इसी तरह के आरोपों में आप के दूसरे क्रम के अन्य नेताओं को भी जेल की सैर करा दी. इनमें उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी हैं, जो अब जमानत पर बाहर आ चुके हैं. केजरीवाल ने आखिरकार सितंबर 2024 में मुख्यमंत्री पद छोड़ा और अस्थायी रूप से यह कुर्सी ऑक्सफोर्ड में पढ़ीं आतिशी मार्लेना को सौंप दी. वे ईमानदार कार्यकर्ता से राजनेता बनने के आप के मूल प्रोटोटाइप में पूरी तरह फिट बैठती हैं.
हर आरोप के पुरजोर खंडन (और यहां तक कि मुकदमा चलाने के लिए ठोस सबूत न मिलने) के बावजूद विवादों ने उनकी भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा की छवि को नुक्सान ही पहुंचाया है. भाजपा ने 'शीश महल’ पर घेरने के साथ आप के खिलाफ आक्रामक तेवर की रणनीति जारी रखी है, जिसमें बताया गया कि कैसे खुद को 'आम आदमी’ बताने का दावा करते रहे केजरीवाल के सरकारी आवास पर सजाने-संवारने पर 33.66 करोड़ रुपए खर्च किए गए.
लेकिन केजरीवाल की शख्सियत को देखते हुए उन्हें हराना इतना आसान काम नहीं होगा. यही वजह है कि पिछले कुछ समय में आप ने दिल्ली के बाहर भी अपना परचम लहराया. पार्टी ने पंजाब में शानदार जीत हासिल की और गुजरात और गोवा में सियासी पारी के लिए पूरी तरह मुस्तैद दिखी. इसलिए दिल्ली की सड़कों पर आप-भाजपा के बीच संग्राम सिर्फ राज्य की सत्ता हासिल करने तक सीमित नहीं है. यह केजरीवाल के लिए अस्तित्व की लड़ाई है. न सिर्फ उनका बल्कि उनकी बनाई पार्टी का राजनैतिक भविष्य भी दांव पर है.
जमानत मिलने के बाद वे एक बार फिर वही सब कर रहे हैं, जिसमें उन्हें महारत हासिल है. जाहिरा तौर पर रेवड़ी संस्कृति को नए स्तर पर पहुंचाना वंचितों के बीच अपनी पैठ को और गहरी बनाने की कोशिश का हिस्सा है, जिनकी तादाद दिल्ली के 3.40 करोड़ आबादी में करीब आधी है. केजरीवाल मुफ्त सुविधाओं का विस्तार करके गरीब महिलाओं को 2,100 रुपए प्रति माह देने का वादा कर रहे हैं. पहले से ही मुफ्त बस यात्रा का लाभ उठा रही महिलाओं की संख्या 45 फीसद है, जिन्हें केजरीवाल हर हाल में अपने साथ बनाए रखना चाहते हैं.
बीजेपी पिछले 27 वर्षों से देश की राजधानी में सत्ता से बाहर है. इसलिए दिल्ली जीतना उसके लिए प्रतिष्ठा का सवाल बना हुआ है और उसने प्रतिद्वंद्वी दल को करारी शिकस्त देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पार्टी के तमाम शीर्ष नेता लगातार रैलियां कर रहे हैं. इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी घर-घर जाकर प्रचार अभियान चला रहा है.
बीजेपी यहां पर गरीब मतदाताओं को लुभाने के लिए 'रेवड़ी’ संस्कृति अपनाकर अपने पुराने पैंतरे को ही आजमाना चाहती है. यही वजह है कि उसने केजरीवाल से भी बड़ा चुनावी वादा करते हुए महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपए नकद देने की घोषणा की है.
बीजेपी मध्य वर्ग पर अपनी स्वाभाविक पकड़ को और मजबूत करने में जुटी है. माना जाता है कि मतदाताओं का यही 45 फीसद हिस्सा विधानसभा चुनावों में आप और लोकसभा चुनावों में बीजेपी को जिताने में निर्णायक भूमिका निभाता है. मध्य वर्ग सड़कों की खराब स्थिति, कचरा निबटान की पुख्ता व्यवस्था न होने और प्रदूषित यमुना को लेकर खासा नाखुश है, और बीजेपी उन्हें रिझा रही है.
इस त्रिकोणीय मुकाबले का तीसरा कोण यानी कांग्रेस सबसे कमजोर स्थिति में है लेकिन उसका प्रदर्शन कई मायने में बहुत ज्यादा मायने रखता है. इंडिया ब्लॉक के दो घटक चुनाव मैदान में आपस में ही जोर-आजमाइश कर रहे हैं. 2020 में आप की बढ़ती धमक के आगे कांग्रेस को महज 4.2 फीसद वोटों के साथ संतोष करना पड़ा था. बहरहाल, बीजेपी की एक रणनीति यह सुनिश्चित करना भी है कि कांग्रेस 2015 के अपने करीब 10 फीसद वोट के आंकड़े पर पहुंच जाए, ताकि आप के वोट बैंक में सेंध लग सके.
लेकिन कांग्रेस इस बात को अच्छी तरह जानती है कि दिल्ली में आप की हार का मतलब काफी हद तक इंडिया ब्लॉक की ताबूत पर आखिरी कील साबित होगा. इसलिए वह दुविधा में है. इस सप्ताह हमारी कवर स्टोरी सियासत की रपटीली राह के इन्हीं सब दांव-पेचों पर केंद्रित है. शतरंज की यह बिसात पूरी तरह केजरीवाल पर केंद्रित है, जिन्होंने एक आम आदमी के तौर पर सत्ता की सीढ़िया चढ़ना शुरू किया और बतौर राजनेता एक अलग ही तरह का मुकाम बनाया. वे अब करो या मरो की लड़ाई लड़ रहे हैं.
— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह).