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केंद्र की एक योजना ने कैसे गरीबों के पक्का घर के सपने को किया साकार?

गरीबों के लिए केंद्र सरकार की पीएम आवास योजना की बदौलत लाखों ग्रामीणों को पक्का घर मिला और सबसे बढ़कर इज्जत के साथ सुरक्षा मिली

प्रेमचंद महतो, जितना देवी, थाथन बुजुर्ग, वैशाली, बिहार
अपडेटेड 11 फ़रवरी , 2025

फूस की झोपड़ियों और कच्चे घरों में रहने वाली ग्रामीण आबादी के लिए रोजमर्रा की जिंदगी चुनौतियों से घिरी होती है. घोर सर्दी, गर्मी और बारिश की मार के अलावा रहन-सहन की ज्यादातर आदतें और सेहतमंद रहने के लिए जरूरी बातें उनके घर की बनावट से मेल नहीं खाती.

कमरों और रसोई में हवा के आने-जाने की जगह नहीं होती और शौचालय तो खैर होता ही नहीं. एनएफएचएस (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण) के 2016 के आंकड़ों के अनुसार, जब पीएमएवाइ-जी शुरू की गई थी, तब महज 56.3 फीसद खुशनसीब आबादी के पास पक्के मकान थे.

यूं आसान हुआ जीवन

गरीबों को आवास मुहैया कराने के लिए 1985 में इंदिरा आवास योजना शुरू की गई थी, लेकिन 30 साल बाद भी इसमें बहुत सारी खामियां बनी हुई थीं. सरकार ने निर्णायक बदलाव की जरूरत को समझते हुए अप्रैल 2016 में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाइ-जी) शुरू की.

मकसद सीधा-सा था: सभी पात्र बेघरों और कच्चे या जीर्ण-शीर्ण घरों में रहने वाले अन्य परिवारों को बुनियादी सुविधाओं से सुसज्जित पक्के घर मुहैया कराना. शुरुआती लक्ष्य मार्च 2024 तक 2.95 करोड़ घर बनाना था. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले साल अगस्त में इस योजना के तहत दो करोड़ अतिरिक्त घरों के निर्माण को मंजूरी दी. इस तरह संशोधित लक्ष्य अब 2029 तक 4.95 करोड़ घर बनाने का है.

पीएमएवाइ-जी लाभार्थियों को अपने इलाके की आबोहवा के अनुकूल स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री और डिजाइन का इस्तेमाल करके अपने घर बनाने का अधिकार देता है. हर घर का न्यूनतम आकार 25 वर्ग मीटर है, जिसमें साफ-सुथरा खाना पकाने के लिए एक अलग हिस्सा भी शामिल है. 

इसके लिए वित्तीय सहायता मैदानी इलाकों में 1.2 लाख रुपए से लेकर पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में 1.3 लाख रुपए तक है. लाभार्थियों को अन्य योजनाओं के माध्यम से शौचालय निर्माण के लिए 12,000 रुपए, मनरेगा के तहत 90-95 दिन की मजदूरी और घर में सुधार के लिए 70,000 रुपए तक के कर्ज की सुविधा है. इस कार्यक्रम ने चुपचाप पूरे देश में बदलाव की पटकथा लिखी है. मिसाल के तौर पर, बिहार ने अपने लक्ष्य का 98.9 फीसद हासिल करते हुए लगभग 40 लाख ऐसे घर बनाए हैं. पीएमएवाइ-जी से कुछ हद तक पारदर्शिता भी आई है. लाभार्थी की पहचान 2011 की सामाजिक-आर्थिक जनगणना के आंकड़ों के माध्यम से होती है. इनका सत्यापन ग्राम सभाएं करती हैं और पैसा सीधे आधार से जुड़े बैंक खातों में स्थानांतरित किया जाता है.

पीएमएवाइ-जी का असर ग्रामीण इलाकों में सिर्फ आवास तक सीमित नहीं है. सर्वेक्षणों से पता चला है कि इसने लाखों लोगों को सुरक्षा और सम्मान दिया है, और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को भी बढ़ावा दिया है. सबसे बढ़कर, यह पहल ग्रामीण अभाव को पाटने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है.

इसने कैसे बदली हमारी जिंदगी

''सबसे ज्यादा जरूरत के वक्त यह योजना हमारी मददगार बनी''

प्रेमचंद महतो के लिए जिंदगी हमेशा बहुत मशक्कत भरी रही है. बस किसी तरह से वे अपना जीवनयापन करते आए. एक छोटी जोत के मालिक और दिहाड़ी मजदूर महतो ने अपनी दो बेटियों की शादी कर दी थी. जब काम ठीक-ठाक चल रहा होता था तो वे किसी महीने में लगभग 10,000 रुपए तक कमा लेते थे. फिर 2023 में उनकी किस्मत मानो उनसे नाराज हो गई. एक अजीब दुर्घटना में उसका दाहिना पैर कुचल गया, जिसकी वजह से उन्हें महीनों तक अस्पताल में रहना पड़ा.

लेकिन उस निराशाजनक समय में भी आशा की एक किरण थी. महतो की पत्नी जितना देवी पीएमएवाइ-जी की लाभार्थी बन गई थीं और दुर्घटना से पहले, उनका मामूली छप्पर वाला घर एक पक्के घर में तब्दील हो गया था. जब महतो अस्पताल से घर लौटे तो उन्होंने पाया कि उन्हें एक मजबूत छत, एक शौचालय और यहां तक कि एक अलग कमरे की सुविधा मिली है. इस बदलाव ने उन्हें आजीविका और घर कहलाने वाली सुरक्षित जगह दोनों खोने के दोहरे बोझ से बचा लिया.

उम्मीद की एक और किरण भी थी. महतो के इकलौते बेटे अमरेश कुमार ने 2023 में अंग्रेजी में अपनी डिग्री पूरी कर ली थी और स्थानीय बच्चों को ट्यूशन देना शुरू कर दिया था. एक छोटे-से कोचिंग सेंटर में काम करने के अलावा वह अपने नए घर के बरामदे में भी क्लास लेता था. दरअसल, अब वह अपने पिता से ज्यादा कमाता है.

यह योजना लाभार्थियों को अपने इलाके की आबोहवा के अनुकूल, स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री और डिजाइन का इस्तेमाल कर घर बनाने का अधिकार देती है.

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