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कैेसे ऑनलाइन पढ़ाई शुरू होने से देश में खत्म हो रही है गैर-बराबरी?

ऑनलाइन पढ़ाई ने शिक्षा को सुलभ और समावेशी बनाया है. सरकारी पहल से अब उन लाखों लोगों को मुफ्त पाठ्यक्रम सुलभ हैं, जिन्हें इनकी सबसे ज्यादा जरूरत रही है

लवेइबाभा खोंगमावलोह, मॉफलांग, मेघालय
अपडेटेड 6 फ़रवरी , 2025

भारत की स्कूल शिक्षा प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा प्रणालियों में से एक आंकी जाती है. इसके दायरे में करीब 15 लाख स्कूल, 98 लाख से ज्यादा शिक्षक और पूर्व-प्राथमिक से लेकर हायर सेकंडरी स्तर तक करीब 24.80 करोड़ छात्र आते हैं.

मगर बुनियादी शिक्षा की चुनौती कायम है. वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (एएसईआर) 2023 कड़वी हकीकत पर रोशनी डालती है: 14-18 उम्र के एक-चौथाई छात्र अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में कक्षा 2 के स्तर का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाते.

संपन्न और गरीब छात्रों के बीच विषमता से मसला और कठिन हो जाता है, जहां साधनहीन छात्रों को धन की कमी से ग्रस्त स्कूलों और निजी शिक्षा की बढ़ती लागत का सामना करना पड़ता है. ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा पढ़ाई-लिखाई के गुणवत्तापूर्ण संसाधनों तक पहुंच को लोकतांत्रिक बनाकर इन ढांचागत चुनौतियों का परिवर्तनकारी समाधान मुहैया कराती है.

यूं आसान हुई जिंदगी

डिजिटल शिक्षा प्लेटफॉर्म अब शिक्षार्थियों को कहीं से भी उच्च गुणवत्ता की विषय सामग्री देकर भौगोलिक और बुनियादी ढांचे की बाधाओं को असरदार ढंग से सुलझा रहे हैं. इस बदलाव का एक उदाहरण मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्सेस (एमओओसी) या विशाल मुक्त ऑनलाइन पाठ्यक्रम हैं, जो अपनी गति से पढ़ाई की सुविधा देने वाले पाठ्यक्रम की पेशकश करके शिक्षा की भिन्न-भिन्न जरूरतें पूरी कर रहे हैं.

शिक्षा को और ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने वाली कुछ सरकारी पहल भी हैं, जैसे स्वयं यानी एसडब्ल्यूएवाइएएम (स्टडी वेब्ज ऑफ एक्टिव लर्निंग फॉर यंग एस्पायरिंग माइंड्स) और एनपीटीईएल (नेशनल प्रोग्राम फॉर टेक्नोलॉजी एनहांस्ड लर्निंग), जो मुफ्त और सस्ते पाठ्यक्रम पेश करती हैं. कोविड-19 की महामारी के दौरान पीएम ईविद्या, दीक्षा और ई-पाठशाला सरीखे प्लेटफॉर्मों ने दूर-दराज में अबाध शिक्षा सुनिश्चित की.

असम के बोवालिमारी गांव की 10वीं कक्षा की छात्रा शहनाज परबीन ऑनलाइन शिक्षा की इस परिवर्तनकारी ताकत की साक्षात मूरत हैं. उनके पिता ने किसी तरह स्मार्टफोन खरीदा, जिसकी बदौलत उन्हें मुफ्त अध्ययन सामग्री और वर्चुअल कक्षाएं सुलभ हो सकीं.

ऑनलाइन शिक्षा की एक अलग और खास बात इसका किसी खास समय से बंधा न होना है. यह नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी और स्वयं (एसएब्ल्यूएवाइएएम) प्रभा सरीखे संसाधनों के जरिए विषय सामग्री की उपलब्धता पक्की करके शिक्षा को लोकतांत्रिक बनाती है. खराब कनेक्टिविटी वाले इलाकों में भी डाउनलोड किए जा सकने वाली विषय सामग्री और उसका कई भाषाओं में उपलब्ध होना भाषाई और प्रौद्योगिकीय खाइयों को पाटने में मदद करता है.

डिस्कशन फोरम, वर्चुअल क्लासरूम और ग्रुप प्रोजेक्ट शिक्षार्थियों के बीच बातचीत को बढ़ावा देते हैं. रिपोर्ट बताती हैं कि ऑनलाइन पुस्तकालय, एआइ से संचालित प्लेटफॉर्म और मॉक टेस्ट सरीखे साधनों की बदौलत शिक्षा में सुधार आया है.

तमाम संभावनाओं के बावजूद भरोसेमंद टेक्नोलॉजी का न होना और इंटरनेट की सुलभता चुनौती है. सामुदायिक शिक्षण केंद्रों को वाइ-फाइ, कंप्यूटर और बिजली की सुविधा देनी होगी. संभावनाओं के अधिकतम दोहन के लिए ये सुधार तो अनिवार्य हैं ही, पर मौजूदा बुनियादी ढांचे ने ही शिक्षा को काफी बदल दिया है.

इसने कैसे बदली मेरी जिंदगी

''इससे मुझे यह समझने में मदद मिली कि मेरी क्षमता कितनी है''

मेघालय के पिंटर गांव की छात्रा लवेइबाभा खोंगमावलोह गरीब माता-पिता की छह संतानों में तीसरी हैं. उनके पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और मां गृहिणी. लवेइबाभा की जिंदगी में उस वक्त अप्रत्याशित मोड़ आया जब 2020 में महामारी की वजह से स्कूलों को बंद करना पड़ा. उनके शिक्षकों ने ऑनलाइन कक्षाओं की घोषणा की तो लवेइबाभा उत्साहित भी थीं और आशंकित भी. डिजिटल दुनिया उनके लिए अनजान थी—उन्होंने न तो कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया था और न उनके पास कोई डिवाइस थी. उनके चाचा ने ईमेल अकाउंट बनाने में मदद की और सुनिश्चित किया कि वे अपना फोन रीचार्ज कर पाएं. कक्षाएं गूगल मीट पर शुरू हुईं और शुरू में बोझिल होते हुए भी उन्होंने तेजी से अपने को ढाल लिया.

इंटरनेट भरोसेमंद नहीं था, बिजली बार-बार चली जाती थी और ग्रामीण जिंदगी का अलगाव तो था ही. इसके बावजूद लवेइबाभा ने हर मौके को बढ़-चढ़कर गले लगाया. ऑनलाइन पढ़ाई-लिखाई ने उनके फलक का विस्तार किया, उन्हें भारत भर के विशेषज्ञों से जोड़ा और खान एकेडमी, ई-पाठशाला और नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी सरीखे संसाधन मुहैया किए. डिजिटल शिक्षा की बदौलत लवेइबाभा अपने और अपने परिवार के लिए उज्ज्वल भविष्य की कल्पना कर पाईं. वे कहती हैं, ''ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों के माध्यम से करियर काउंसलिंग सत्रों ने मुझे अपनी क्षमताओं को समझने में मदद की. ऑनलाइन शिक्षा ने हमें अपने आसपास के इलाकों से दूर के संसाधन और ज्ञान सुलभ करवाकर व्यापक दुनिया से जोड़े रखा.'' उनके जैसी कहानियां अनगिनत दूसरे लोगों को भी अपनी परिस्थितियों से आगे के सपने देखने के लिए प्रेरित करती हैं.

नंदिता बोरा और अपरमिता दास

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