—अरुण पुरी
गणतंत्र का 75वां वर्ष कोई छोटा मील का पत्थर नहीं है. 1950 के बाद पहली आधी सदी बुनियादी गुजर-बसर के लिए साधन जुटाने और अपनी आबादी को गरीबी की रेखा से ऊपर लाने में ही बीत गई, पर साथ ही आर्थिक वृद्धि के लिए साजोसामान भी इकट्ठा किया गया. अलबत्ता विभिन्न क्षेत्रों में अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भारतीयों के लिए बहुत ज्यादा थकाऊ और मुश्किलों भरा काम था.
जब नई सहस्राब्दी की पौ फटी, हमारी आबादी का बड़ा हिस्सा अब भी उस सीमा से नीचे था जिसे मैंने गरिमा रेखा कहा है. 90 फीसद ग्रामीण घरों में नल नहीं थे जो उनके लिए पानी लाते. इसके बजाए महिलाओं को सामुदायिक हैंडपंपों पर लंबी और हुड़दंगी कतारों में खड़ा होना पड़ता या कुओं और प्राकृतिक स्रोतों से पानी लाने के लिए मीलों चलना पड़ता था. बदतर यह कि ज्यादातर ग्रामीण घरों में शौचालय के साथ पक्के घर नहीं थे.
शहरी लोगों को भी ऐसे भी रोजमर्रा के अभाव झेलने पड़ते थे, चाहे वह शहर में रोज का आना-जाना हो, नागरिक सुविधाओं के बिल चुकाना हो या यहां तक कि ड्राइविंग लाइसेंस लेना हो जहां हथेलियां गरम करना काम करवाने की पूर्वशर्त थी. राजमार्गों पर टोल चुकाने के लिए वाहनों की लंबी-लंबी कतारों को न भूलें. हर जगह कतारों में अंतहीन घंटे बर्बाद हो जाते और तिस पर भी व्यवस्था साधारण भारतीयों को पूरी तरह नाकाम कर सकती थी.
ऐसी गरिमाहीनताएं और तिरस्कार थे जो हमें जिंदगी का निर्वाह करते हुए सहने पड़ते थे. मगर यह तेज रफ्तार और आत्मसजग बदलाव की चौथाई सदी रही है. अब जब हम 2025 का सफर शुरू कर रहे हैं, 'जीवनयापन में आसानी’ लेकर आई उस क्रांति के अचूक संकेत दिखाई दे रहे हैं जिसने बहुत सारे मोर्चों पर भारतीयों की रोजमर्रा की जिंदगी का कायापलट कर दिया है.
इस विशेषांक के लिए हमने बदलाव के ऐसे ही 25 निशान संजोए हैं. ये बुनियादी बदलाव हैं जो तमाम वर्गों के भारतीयों के जिए गए अनुभव को बयान करते हैं. ग्रामीण घरों में नल का पानी लाने के लिए शुरू किए गए जल जीवन मिशन के पदचिह्नों को ही लीजिए. अभी हाल में 2019 तक महज 18 फीसद ग्रामीण घरों में नल थे, वहीं अब हैरतअंगेज 80 फीसद ग्रामीण घरों में नल के कनेक्शन हैं; 2025 वह वर्ष है जिसमें वे 100 फीसद तक पहुंचने के लिए जोर लगा रहे हैं.
लाखों महिलाएं अब उन श्रमसाध्य घंटों को कहीं ज्यादा फलदायी कामों में लगा सकती हैं जो वे महज पानी लाने में बिता देती थीं. ग्रामीण भारत से तीन और निशान हैं. 2016 से बनकर तैयार हुए करीब 2.7 करोड़ पक्के घरों में ईंट और गारे का दोटूक बदलाव हमारा अभिनंदन करता है, जो सभी स्वास्थ्य और साफ-सफाई की जरूरतों को पूरा करते हैं.
गर्व से भरे इनके मालिकों के लिए यह सिर पर छत भर होने से कहीं ज्यादा है—यह उन्हें गरिमा से सुशोभित करता है, स्वास्थ्य संकेतकों पर इसके जो व्यापक प्रभाव हैं, सो अलग. जहां तक ग्रामीण गतिशीलता की बात है, 2000 से हैरतअंगेज 7,71,310 किमी लंबी सभी मौसमों में कारगर सड़कें बिछाई गई हैं. अगली 62,500 किमी 2028-29 तक बिछाई जाएंगी और इसके साथ ही समूचा ग्रामीण भारत देश के सड़क नेटवर्क से जुड़ जाएगा.
यही नहीं, भारतनेट पहल ने कोई 7,00,000 किमी ऑप्टिकल फाइबर केबल से 2,20,000 ग्राम पंचायतों को जोड़ लिया है, जिससे 80 फीसद से ज्यादा गांव-देहात हाइ-स्पीड इंटरनेट के लिए 'सर्विस रेडी’ यानी सेवा के लिए तैयार हो गए हैं. कुल मिलाकर इसका मतलब हजारों लाखों जिंदगियों को खुशहाल बनाना है.
हमारे दर्ज परिवर्तनों में 15 जितने ज्यादा ने रहन-सहन के स्तरों पर ऐसे ही भौतिक कायापलट को अंजाम दिया है और ग्रामीण व शहरी दोनों भारतीयों के जीवन में आसानी और सुकून लेकर आए. जिन क्षेत्रों में व्यापक और अहम बदलाव आया है, वे हैं आवास, परिवहन और आवागमन, कनेक्टिविटी, राजकाज, कॉमर्स और मनोरंजन. कई परिवर्तनकारी पहल टेक्नोलॉजी के अभिनव प्रयोगों से निकली हैं.
मसलन, हमारा केंद्रीयकृत ई-पेमेंट ग्रिड यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआइ) सरलता, दूरदृष्टि और स्मार्ट सिस्टम के जोड़ से बना है जिसे दुनिया भर में निर्यात किया जा सकता है. यूपीआइ और सस्ते डेटा के बीच वे हमारे लिए ई-कॉमर्स की आसानी लेकर आए. अब हम अपने घरों की आरामतलबी से डिजिटल लेन-देन करते हैं—किराने के सामान से लेकर खाने-पीने की चीजों और दवाइयों तक, शेयर बाजारों से मनोरंजन के विभिन्न विकल्पों के समूचे केलाइडोस्कोप तक हर चीज हमारी उंगलियों के एक इशारे पर मौजूद है. घर से बाहर फास्टैग सिस्टम राजमार्गों से हमारे गुजरने को आसान बना रहा है.
नीति निर्माता अफसरशाही की परतों को भेदने के लिए टेक्नोलॉजी को सान पर चढ़ा रहे हैं. मसलन भू-अभिलेख डिजिटाइज हो रहे हैं और नगरपालिकाओं में भवन निर्माण की मंजूरी प्रक्रियाएं आसान बनाई जा रही हैं. इसमें सुपरफास्ट होम डिलिवरी वाले डिजिटल रूप से सशक्त नए पासपोर्ट दफ्तरों को भी जोड़ लीजिए. जो थोड़े बुजुर्ग हैं, उन्हें नए पासपोर्ट के लिए अंतहीन इंतजार याद होगा.
बड़े हवाई अड्डों पर डिजियात्रा लेन पर चेक-इन करना ठंडी हवा के झोंके की तरह है—इसमें ऑप्टिकल स्कैनर हैं जो चेहरे को पहचानकर यात्री को आइडी कार्ड दिखाए बिना अंदर जाने देते हैं. डिजिटल पेमेंट आम बात हो गए हैं, तो महानगरों की रसोइयों में पाइप गैस भी. पहले के चौतरफा दिखाई देने वाले लाल गैस सिलेंडर तेजी से गायब हो रहे हैं. यही नहीं, घर पर खाना बनाना भी जरूरी नहीं रह गया है, क्योंकि एक फोन करके घर पर खाना मंगवाया जा सकता है.
हमारी जीवनशैली में आए बदलावों को अक्सर हल्केपन से लिया जाता है और पहले की स्थितियों को आसानी से भुला दिया जाता है. अलबत्ता, ये सारे बदलाव जिंदगी के कहीं ज्यादा आसान और आरामदायक होने की कहानी बयान करते हैं. वे सब मिलकर हमें बेहतर भारत की ओर ले जा रहे हैं.
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं!
— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)