महज कुछ साल पहले तक बाहर का खाना सिर्फ कभी-कभार खाया जाता था और ज्यादातर भारतीय घर का बना भोजन ही पसंद करते थे. यही नहीं, होटल-रेस्तरां जाने को विलासिता में शुमार किया जाता था. जो लोग खाना बनाना नहीं जानते या बनाना नहीं चाहते थे, उनके पास बचा खाना खाने या किसी नजदीकी रेस्तरां को फोन करके खाना मंगाने सरीखे सीमित विकल्प होते थे.
सिर्फ कुछ ही रेस्तरां घर पर खाना भेजने की सुविधा देते थे, इसलिए अलग-अलग व्यंजनों का लुत्फ उठाना भी आसान नहीं था. ऑर्डर हो जाने पर भी कई बार गफलत या पते को लेकर भ्रम की वजह से डिलिवरी देने आए कर्मचारी गलत पते पर पहुंच जाते या फिर काफी देर हो जाती. कभी-कभी देर रात हल्की-फुल्की भूख लगने पर लोगों को इंस्टैंट नूडल्स या चीज सैंडविच जैसे व्यंजन बनाने पर निर्भर रहना पड़ता.
यूं आसान हुआ जीवन
मगर फूड डिलिवरी ऐप आने से सब कुछ बदल गया. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उपभोक्ताओं को मोबाइल ऐप के जरिए कई तरह के होटल-रेस्तरां के विकल्प मुहैया करा रहे हैं, जिसमें लाइव ऑर्डर ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं शामिल हैं. गुरुग्राम स्थित जोमैटो 2008 में 'फूडीबे’ के नाम से लॉन्च किया गया था, जिसमें लोगों को रेस्तरां की जानकारी मुहैया कराई जाती थी.
इसमें लोग रेस्तरां का डिजिटल मेनू देख सकते थे और उससे संपर्क करने के लिए फोन नंबर आदि ब्यौरे होते थे. 2014 में बेंगलूरू स्थित स्विगी ने ऐप के जरिए रेस्तरां, फूड ऑर्डर और डिलिवरी सुविधा देने वाले एक एंड-टू-एंड प्लेटफॉर्म के साथ बाजार में कदम रखा. इसी मॉडल को बाद में जोमैटो ने अपनाया.
फूडपांडा, टेस्टीखाना, टाइनीआउल और ओला कैफे जैसे अन्य खिलाड़ी बाजार में आए, पर बंद हो गए या बड़े प्रतिस्पर्धियों ने उन्हें खरीद लिया. कंसल्टिंग फर्म रेडसीयर के अनुसार, 2016 से 2019 के बीच फूड डिलिवरी सेक्टर ने लगातार तीन वर्षों तक तिहरे अंकों में वृद्धि दर्ज की. उपभोक्ताओं ने फूड डिलिवरी ऐप की सुविधाओं को दिल खोलकर अपनाया. छूट, कूपन और कैशबैक ने उन्हें नए-नए व्यंजन और रेस्तरां आजमाने के लिए प्रेरित किया.
असल में सुविधाजनक जीवनशैली सबसे बड़ी जरूरत बन गई है, खासकर कामकाजी पेशेवरों और युवाओं के लिए. किफायती दाम, कई विकल्प और फटाफट डिलिवरी के कारण घर के खाने की आदत खत्म हो रही. बढ़ती मांग ने बड़ी संख्या में लोगों के इस क्षेत्र में उतरने, नए रेस्तरां खोलने और छोटे शहरों में आने का रास्ता खोला है.
रेडसीयर का अनुमान है कि 2017 में 15 शहरों तक सीमित फूड-टेक प्लेटफॉर्म 2018 तक 100 से ज्यादा शहरों में पहुंच गए थे. इन ऐप ने क्लाउड किचन के मौके भी पैदा किए. भारत के फूड-टेक बाजार में जोमैटो और स्विगी का दबदबा है. स्विगी रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में भारत में ऑनलाइन फूड डिलिवरी मार्केट 64,000 करोड़ रुपए का था.
फूड ऐप ने शहरी भारतीयों के खानपान के तौर-तरीके को बदल दिया है. उन्हें भूख लगते ही तुरंत खाना मंगाने की सुविधा हासिल है. लजीज व्यंजनों के साथ-साथ वे एक साथ कई चीजें ऑर्डर करते हैं और हफ्ते में कई बार बाहर से खाना मंगाते हैं. खिचड़ी और सलाद से लेकर डोसा और बिरयानी तक...मेनू में हर तरह की चीजें हाजिर हैं.
फूड डिलिवरी के विकल्प और उसकी मांग तेजी से बढ़ रही. ऐसे में इस क्षेत्र के बड़े खिलाड़ी छोटे शहरों में भी दाखिल हो रहे.
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रिद्धिमी कुकरेजा, 36 वर्ष, ब्रांड मार्केटर, नई दिल्ली
"अपने कुक के न आने पर मैं फटाक से ऑर्डर कर देती हूं"
जब से रिद्धिमी कुकरेजा ने नौकरी की वजह से दिल्ली में अकेले रहना शुरू किया, तब से वे फूड डिलिवरी ऐप की सेवाएं ले रही हैं. वे कहती हैं, ''जब आप अपना करियर शुरू करते हैं तो ऐसे खर्चों के लायक थोड़ी-बहुत पैसा आपके हाथ में होता है. इसलिए हफ्ते में सात-आठ बार तक ऑर्डर करने में कोई झिझक नहीं रहती. फूड डिलिवरी तब और ज्यादा मददगार होती है, जब आपको कुक का बनाया खाना पसंद नहीं आता.
आप तुरत-फुरत मोमोज या पिज्जा ऑर्डर कर सकते हैं." रिद्धिमी की मानें तो फूड डिलिवरी ऐप सिर्फ इसलिए उपयोगी नहीं कि वे आपको रेस्तरां या कैफे के कई विकल्प देते हैं, बल्कि ग्राहकों की समीक्षा देखकर नई जगहों और कई तरह के व्यंजनों को आजमाना भी आसान हो जाता है.
वे कहती हैं, ''मैं अपनी सुविधा के लिए हक्रते में चार-पांच बार तो ऑर्डर करती ही हूं. दिनभर दफ्तर का काम किया हो और फिर कुक न आए तो बाहर से खाना ऑर्डर करना बेहतर होता है. खास मौकों पर स्वादिष्ट भोजन का लुत्फ उठाना भी बेहद आसान हो गया है." उनके मुताबिक, अच्छी बात यह है कि सलाद और सूप जैसे स्वास्थ्यवर्धक विकल्प भी उपलब्ध हैं, जो संतुलित जीवनशैली के अनुरूप भी हैं.