
थीं कितनी दुश्वारियां
सुबह जल्दी उठना. घर के सभी बर्तनों को लेकर सबसे पास वाले कुएं या हैंडपंप पर जाना और लंबी कतार में लगना. बर्तनों के अपने कोटे को भरने के लिए बूंद-बूंद पानी का अंतहीन इंतजार. और सिर पर एक के बाद एक बर्तनों को संतुलित ढंग से रखकर घर वापस लौटने के लिए लंबा सफर. हमारे गांवों में भारतीय महिलाओं की यही नियति थी. रोजाना पानी इकट्ठा करने में बिताए जाने वाले कीमती घंटों की बर्बादी. गर्मी का मौसम अपने साथ डर लाता है और तब पानी की किल्लत बढ़ने का अंदेशा रहता है. कई लोगों ने जीवन के अमृत को पाने के लिए जमीन में गहरी खुदाई की लेकिन ज्यादा से ज्यादा बोरवेल की वजह से भूजल खतरनाक ढंग से नीचे चला गया और जमीन सूख गई. नल का कनेक्शन एक विलासिता थी जिसे भारत के 82 फीसद ग्रामीण परिवारों ने कभी नहीं देखा था.
यूं आसान हुआ जीवन
अब यह बीती बात हो गई है. देश के 19 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण परिवारों में से लगभग 80 फीसद यानी 15.4 करोड़ के घर में नल है. और इस बदलाव को लाने में मदद करने वाला जल जीवन मिशन (जेजेएम) है, जिसे 2019 में लॉन्च किया गया था. जेजेएम 3.6 लाख करोड़ रुपए के परिव्यय, और पारदर्शिता और वास्तविक समय की निगरानी के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाते हुए 2024 तक सभी गांवों के घरों में नल कनेक्शन लगाने की कोशिश कर रहा है. इसका ध्यान जल आपूर्ति के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण कर जल प्रवाह बनाए रखने के लिए जल संसाधनों को बनाए रखना है.
जेजेएम की विविध चुनौतियों ने पांच साल में पूर्ण कवरेज के लिए इसकी महत्वाकांक्षा को भले नाकाम कर दिया हो लेकिन 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने असंभव लगने वाले लक्ष्य को हासिल कर लिया है. छह में से केवल एक घर में नल के पानी के कनेक्शन के मुकाबले अब चार में से तीन ग्रामीण परिवारों के पास नल से जल का कनेक्शन है. जेएमएम के आंकड़ों से पता चलता है कि घर में नल के पानी की पहुंच की कमी केवल चार राज्यों में चिंता का विषय है. पश्चिम बंगाल में सबसे कम 53.9 फीसद कवरेज है, उसके बाद केरल में 54.13 फीसद, झारखंड में 54.62 फीसद और राजस्थान में 54.95 फीसद कवरेज है.
इस तरह के मिशन के परिवर्तनकारी प्रभावों पर शायद ही कोई संदेह हो. विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि पूर्ण कवरेज से हर रोज 5.5 करोड़ घंटे की बचत हो सकती है, सुरक्षित पेयजल से डायरिया से होने वाली बीमारियों से लगभग 4,00,000 मौतें रोकी जा सकती हैं, जिससे लगभग 1.4 करोड़ विकलांगता समायोजित जीवन वर्ष बच सकते हैं. आखिरकार, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2010 में स्वच्छ पेयजल को मानव अधिकार के रूप में मान्यता दी थी.
इसने कैसे बदली मेरी जिंदगी
''अब पढ़ने का समय मिल पाता है''

अपनी उम्र से कहीं ज्यादा समझदार, कक्षा नौ की छात्रा आकांक्षा अहीरवार को अच्छी तरह याद है कि कैसे उनके गांव की नई-नवेली बहुओं को भी तुरंत दूर-दराज के कुओं और हैंडपंपों से पानी लाने के लिए भेज दिया जाता था. उत्तर प्रदेश से सटा राज्य का सबसे छोटा जिला निवाड़ी सूखे बुंदेलखंड का हिस्सा है, जहां पानी की कमी रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा थी. आकांक्षा कहती हैं, "सिर्फ हमारे गांव में ही नहीं, पूरे जिले में पानी की किल्लत थी. हमें दूर के हैंडपंप से पानी लाना पड़ता था. इसमें वक्त बर्बाद होता और कई बार मैं स्कूल के लिए देर से पहुंचती."
जल जीवन मिशन ने यह सब बदल दिया. आकांक्षा कहती हैं, "अब हमारे यहां नलों में पानी आ रहा है." महिलाएं दूसरे कामों के लिए समय निकाल ले रही हैं. आकांक्षा के पास अब पढ़ाई के लिए ज्यादा समय है. वे कहती हैं, "पूरा गांव हरा-भरा हो गया है." वे पिछली तकलीफ भूल गई हैं क्योंकि जिले के सभी 55,645 घरों में हर रोज नलों से पानी आ रहा है.''
विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि हर घर नल का पानी पहुंच जाने से रोज के 5.5 करोड़ घंटे बच सकते हैं, जो अन्यथा पानी जमा करने में खर्च हो जाते हैं.