थीं कितनी दुश्वारियां
भारत के मछुआरे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सागर की अनिश्चितताओं से तो जूझते ही रहे हैं, तटों पर भी उन्हें कम चुनौतियां नहीं झेलनी पड़तीं—खराब बुनियादी ढांचा, शिकार के बाद घाटा और नाकाफी आमदनी. मत्स्य पालन क्षेत्र के हितधारक बताते हैं कि इस उद्योग की आर्थिक अहमियत, रोजगार देने की क्षमता और मछलियों की पोषकता के बावजूद इसे लंबे समय से आधुनिक बुनियादी ढांचे की कमी से जूझना पड़ा.
गहरे सागर में मछली पकड़ने वाले जहाज, बंदरगाह, मछली उतारने के केंद्र, उन्नत थोक और खुदरा बाजार, मछली चारा संयंत्र और समुद्र से कांटे तक समुद्री भोजन को सुरक्षित रखने के लिए बेहद जरूरी मजबूत शीत शृंखला सरीखे अहम हिस्से अविकसित ही रहे. समुद्री खाद्य पदार्थों के खराब हो जाने की प्रकृति को देखते हुए शीत शृंखला अहम है, जिसमें मछली पकड़ने वाले ट्रॉलरों के लिए ब्लॉक आइस और प्रसंस्करण सुविधाओं के लिए ट्यूब आइस की आपूर्ति भी शामिल है.
फिर भी मछली पकड़ने के व्यस्ततम सीजन (सितंबर से दिसंबर) के दौरान बर्फ की कमी के चलते कीमतें बढ़ जातीं और कामकाज में रुकावटें आती हैं. बाजार में समद्री खाद्य पदार्थों के दाम सीधे उनकी गुणवत्ता से तय होते हैं. समुचित शीत भंडारण या रेफ्रिजरेशन में परिवहन के बिना इनका मूल्य तेजी से घटता जाता है.
यूं आसान हुआ जीवन
यहीं प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाइ) आती है, जो भारत के मछुआरों के लिए गेमचेंजर बन गई. जीवनदायी बुनियादी ढांचा और वित्तीय सहायता मुहैया करके यह योजना न केवल लंबे वक्त से चली आ रही चुनौतियों से निबट रही है बल्कि मछुआरों के करीब 6,00,000 परिवारों को बेहतर आजीविका और ज्यादा आमदनी हासिल करने में मदद कर सशक्त भी बना रही है.
प्रमुख पहलों में 27,189 यातायात सुविधाएं, 1,091 मछली चारा संयंत्र, 922 हैचरी और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले 480 जहाजों का विकास शामिल है. इससे मछली उत्पादन के वित्त वर्ष 2018-19 में 1.375 करोड़ मीट्रिक टन से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 2.2 करोड़ मी. टन होने का अनुमान है. यह पहल लॉजिस्टिक्स की चुनौतियों से पार पाने, शिकार के बाद के घाटे को कम करने और बाजार तक पहुंच को बेहतर बनाने में मछुआरों की मदद कर रही हैं.
महाराष्ट्र मत्स्य पालन विभाग के एक बड़े अधिकारी कहते हैं, "कोल्ड स्टोरेज, इंसुलेटेड वैन, हैचरी और ओरिएंटल फिश यूनिट जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी थी. पीएमएमएसवाइ के जरिए मिली सब्सिडी से उनके निर्माण को बढ़ावा मिला है." अकेले महाराष्ट्र ने 4,174 लाभान्वितों के लिए 1,400 करोड़ रुपए की सब्सिडी को मंजूरी दी और यह धन रिजर्वायर केज फार्मिंग, बायोफ्लॉक तालाबों, मछली फीड मिलों और शीत भंडारण की सुविधाओं सरीखी परियोजनाओं में लगाया गया. 60 फीसद सब्सिडी महिलाओं और अनुसूचित जाति, जनजातियों के लाभार्थियों को दी जाती है, जबकि अन्य वर्ग 40 फीसद के पात्र होते हैं.
योजना के तहत रेफ्रिजरेटेड वैन हासिल करने वाले राज्य के एक फूड प्रोसेसिंग उद्यमी कहते हैं, "वैन की बदौलत मैं कोल्ड चेन को बनाए रखते हुए झींगे प्रोसेस, स्टोर और एक्सपोर्ट कर पाता हूं. इससे प्रीमियम क्वालिटी सुनिश्चित होती है और उपज का अच्छा मूल्य मिलता है." इन कदमों से न केवल आमदनी बढ़ी बल्कि बर्बादी घटी और निर्यात के अवसर खुले. यह योजना सहकारी कोशिशों पर भी जोर देती है. महाराष्ट्र की मत्स्यपालन सहकारी समितियां परियोजनाओं के अमल में अहम भूमिका अदा कर रही हैं.
इस पहल से मत्स्य पालन मूल्य शृंखला मजबूत हुई और यह सुनिश्चित हुआ कि मछुआरे टिकाऊ और आधुनिक तौर-तरीकों का फायदा उठा सकें. उत्पादन, टेक्नोलॉजी और बुनियादी ढांचे की कमियों को पाटकर पीएमएमएसवाइ मछुआरों का आर्थिक लचीलापन बढ़ा रही है और उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार ला रही है.
प्रमुख पहलकदमियों में 27,189 यातायात सुविधाएं, 1,091 मछली चारा संयंत्र, 922 हैचरी और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले 480 जहाजों का विकास शामिल है.
इसने कैसे बदली मेरी जिंदगी
"मैंने कुछ नया किया है"
विश्वास दत्ता नखवा, 48 वर्ष
बोदनी, रायगढ़ जिला, महाराष्ट्र
विश्वास नखवा ऐसे परिवार से हैं जिसकी गहरी जड़ें मछली पालन उद्योग में हैं. पकड़ी गई मछलियों को तरोताजा रखने के लिए उन्हें बर्फ की सख्त जरूरत पड़ती थी. लिहाजा उन्होंने इससे जुड़े एक और उद्यम में उतरने का फैसला किया. चार फिशिंग ट्रॉलर के मालिक नखवा कहते हैं, "मैंने बर्फ की फैक्टरी शुरू करने के विचार पर ध्यान लगाया." समुद्र के भीतर जाल में फंसने से लेकर थोक बाजार में बिक्री तक मछलियों की रक्षा के लिए एक ट्रॉलर को प्रति ट्रिप 15 टन बर्फ की जरूरत पड़ती थी. नावों को आम तौर पर पखवाड़े भर समुद्र में रहना होता था, इसलिए बर्फ की भरोसेमंद आपूर्ति बहुत जरूरी थी.
नखवा को महाराष्ट्र के मत्स्य पालन विभाग के अलीबाग दफ्तर में अधिकारियों से पीएमएमएसवाई का पता चला. उन्होंने पत्नी रोमा के नाम से सब्सिडी के लिए अर्जी लगाई. परियोजना की स्वीकृत लागत 1.5 करोड़ रु. का 60 फीसद यानी 90 लाख रु. उन्हें मिल गए. फैक्टरी पिछले साल शुरू हुई और इसकी उत्पादन क्षमता प्रति दिन 50 टन है.
अपने ट्रॉलरों के अलावा नखवा स्थानीय ट्रॉलरों और मछुआरों की कोऑपरेटिव सोसाइटी को भी बर्फ की आपूर्ति करते हैं. वे कहते हैं, "रायगढ़ में बर्फ के ज्यादा प्लांट नहीं हैं. पहले हमें मुंबई से बर्फ मंगाने में तीन से चार दिन लगते थे. अब मेरी फैक्टरी से बर्फ मिल जाती है." संयंत्र आठ कामगारों को रोजगार भी देता है. बर्फ की बाजार दरें प्रति टन 1,500 रु. से 1,600 रु. तक हैं. नखवा 1,200 रु. से 1,300 रु. की कम कीमत पर बर्फ देते हैं. वे कहते हैं, ''दिल को खुशी देने वाली बात यह भी है कि मैंने कुछ नया किया है.’’