
यह फटा नोट नहीं चलेगा. कितनी बार बस इस एक बात की वजह से कोई सौदा नहीं हो पाया, भले ही आपने सोचा हो कि आपके दिए नोटों के बंडल में दुकानदार ने इस पर ध्यान नहीं दिया होगा. या जब आप अपने दोस्तों को किसी रेस्तरां में ले गए तो आपने देखा कि आपके पास कैश कम है. और सबसे पास का एटीएम भी खाली है.
और क्या आप उन लोगों में से थे जिन्होंने 500 और 2,000 रुपए के नोट बुरे वक्त के लिए बचाकर रखे थे, मगर 2016 में वे बंद हो गए? या जो कोविड-19 के दौरान घर में ही फंसे थे और ऑनलाइन पेमेंट के लाभ खोज रहे थे? मार्च 2021 में डिजिटल पेमेंट की हिस्सेदारी 14 से 19 फीसद के बीच थी जो मार्च 2024 में दोगुनी से भी ज्यादा होकर 40 से 48 फीसद के बीच हो गई. और उन पेमेंट में 70 फीसद हिस्सा यूनाइटेड पेमेंट्स इंटरफेस या यूपीआई का है.
यूं आसान हुआ जीवन
भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम ने यूपीआई को विकसित किया. यूपीआई मोबाइल फोन के जरिए एक बैंक से दूसरे बैंक तक लेनदेन की सुविधा के लिए तत्काल भुगतान प्रणाली है. 2013 में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के तत्कालीन अध्यक्ष नंदन नीलेकणि, खुदरा भुगतान और निबटान प्रणाली का संचालन करने वाली सरकारी कंपनी एनपीसीआई के तब के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी दिलीप असबे और यूआईडीएआई के तत्कालीन सलाहकार डॉ. प्रमोद वर्मा बेंगलूरू के एक कमरे में मिले.
उन्होंने भुगतान प्रणाली के ऐसे एक नए तरीके पर विचार-विमर्श किया जो हर जगह उपलब्ध हो, जिसकी लागत शून्य हो और व्हाट्सऐप संदेश की रफ्तार से पैसे इधर-उधर भेज सके. 11 अप्रैल, 2016 को आरबीआई के तब के गवर्नर रघुराम राजन के हाथों एनपीसीआई ने यूपीआई का एक पायलट कार्यक्रम शुरू कराया. उस साल अगस्त तक बैंकों ने अपने यूपीआई-सक्षम ऐप को गूगल प्लेस्टोर पर अपलोड करना शुरू कर दिया.
यूपीआई ने ग्रामीण क्षेत्रों में पैठ बनाते हुए न सिर्फ अरबों की संख्या में छोटे लेन-देन को सक्षम किया बल्कि इसके कारण ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स में तेज उछाल आई है. वित्त वर्ष 18 में यूपीआई लेन-देन की संख्या 92 करोड़ थी जो 129 फीसद की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ते हुए वित्त वर्ष 24 में 1,300 करोड़ से ज्यादा हो गई. भारत में अब यूपीआई के 35 करोड़ यूजर्स हैं और व्यापारिक स्थानों पर 34 करोड़ क्यूआर कोड लगे हैं.
यूपीआई भारत की सीमाओं को पार कर रहा है और सात देशों में इसकी सुविधा उपलब्ध है जिनमें यूएई, सिंगापुर, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, फ्रांस, मॉरिशस जैसे प्रमुख बाजार शामिल हैं. प्रोसेस किए गए लेनदेन की संख्या में इसने पेपाल, चीन के अलीपे और ब्राजील के पिक्स को पीछे छोड़ दिया है. अगला कदम इसे इसके 35 करोड़ यूजर्स से आगे बढ़ाना और इसे अधिक समावेशी बनाना है. जल्द ही हिंदी और स्थानीय भाषाओं में वॉयस-आधारित भुगतान की उम्मीद आप कर सकते हैं.
इसने कैसे बदली मेरी जिंदगी

संजीवनी पिछले 30 साल से बांस और फाइबर की रस्सी से बनी टोकरियां तथा फूलों के गमले बेच रही हैं. उनका 12 लोगों का संयुक्त परिवार है जिसमें सभी वयस्क टोकरियां बनाने के परिवार के पारंपरिक पेशे में जुड़े हुए हैं. वे पास के जंगल से बांस तथा बारामती और सतारा से फाइबर लाते हैं जो अलीबाग से लगभग 245 किलोमीटर दूर है. हर दिन वे अपने गांव से 30 मिनट पैदल चलकर पोयनाड बाजार या अलीबाग तक के हाईवे के किनारे पहुंचते हैं.
अलीबाग 16वीं और 17वीं शताब्दी के अपने किलों और समुद्र तट के कारण पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है. संजीवनी हर दिन 500-600 रुपए कमाती थीं और ज्यादातर भुगतान नकद में लिया जाता था. हालांकि एक साल पहले उन्होंने अपने बैंक से मिले क्यूआर कोड के जरिए यूपीआई भुगतान लेना शुरू कर दिया.
वे कहती हैं, ''मेरा अधिकांश कारोबार अब यूपीआई के माध्यम से होता है. यह मेरे ग्राहकों के लिए सुविधाजनक है जिनमें से ज्यादातर अलीबाग जाने वाले पर्यटक होते हैं.'' इससे चिल्लर की समस्या भी हल हो जाती है. अपने लेन-देन के तौर-तरीके में पूरी तरह बदलाव कर चुकीं संजीवनी अपने सप्लायरों को भी यूपीआई के जरिए ही भुगतान करती हैं. उनके शब्दों में, ''अब कौन अपने पास नकदी रखना चाहता है? गांव में ज्यादातर लोग यूपीआई का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए अब लेन-देन आसान हो गया है.''
यूनाइटेड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई)
शुरुआत - 11 अप्रैल, 2016 को
उपलब्धि - वित्त वर्ष 2018 में 92 करोड़ यूपीआई लेन-देन 129 फीसद की वार्षिक चक्रवृद्धि दर के साथ बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में 1,300 करोड़ से अधिक हो गया.