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क्या है सरकार की वो डिजिटल पहल जो दिला रही किसानों को फसल की बेहतर कीमत?

राष्ट्रीय ऑनलाइन बाजार ई-नाम अपनी उपज की कम कीमत मिलने से परेशान किसानों के लिए बना वरदान

गाजियाबाद (यूपी) में साहिबाबाद की ई-नाम सब्जी मंडी
गाजियाबाद (यूपी) में साहिबाबाद की ई-नाम सब्जी मंडी
अपडेटेड 12 फ़रवरी , 2025

थीं कितनी दुश्वारियां 

बाजार की कीमतों, मांग के रुझान और खरीदारों पर निर्भर कृषि आमदनी और वाजिब कीमत हासिल कर पाने की ताकत के अभाव में किसान बिचौलियों के रहमोकरम पर निर्भर रहते आए हैं. जिस बात से चीजें ज्यादा जटिल होती रही हैं वह यही कि किसानों को पारंपरिक एपीएमसी (कृषि उपज और पशुधन बाजार समिति) मंडियों में अपनी उपज नीलामी के लिए लानी पड़ती है. इसका मतलब है कि ढुलाई की लागत का बोझ उस पर अतिरिक्त पड़ता है. फिर उचित कीमत न मिलने पर किसान के पास पैदावार का भंडारण कर पाने की ताकत भी नहीं होती.

इन सभी वजहों से आपूर्ति शृंखला में बिचौलियों/व्यापारियों/मध्यस्थों का दबदबा कायम रहता है. वे ही पैदावार की कीमत तय करते रहे हैं, किसान नहीं. इन कारणों से कीमतों में उतार-चढ़ाव और नाजायज तौर-तरीकों का जोर बढ़ा. लिहाजा, अनाज की गुणवत्ता का सामने जांच कराने का दबाव भी बनाया गया. किसान तब शिकायत भी नहीं कर सकता, जब उसको भुगतान मिलने में देरी होती रही हो. इस जमीनी हकीकत ने ही मंडियों के डिजिटलीकरण और उनको आपस में जोड़ने की अवधारणा को जन्म दिया.

यूं आसान हुआ जीवन

कई पुरानी समस्याओं और चुनौतियों का हल ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार) पहल से हुई है. सबसे पहली बात तो यही कि इसके तहत एक अखिल भारतीय ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म बनाया गया, जिससे किसानों को देश भर के खरीदारों तक पहुंचने की सुविधा मिले और उन्हें बेहतर दाम मिल सके. इस समय ई-नाम 27 राज्यों की 1,389 (देश में कुल मिलाकर यही कोई 7,000 ) मंडियों को आपस में जोड़ता है. अगले पांच वर्षों में 1,500 और मंडियों को इस प्रणाली में शामिल किए जाने की संभावना है.

किसान अब वेयरहाउसिंग और इलेक्ट्रॉनिक नेगोशिएबल वेयरहाउस रसीद (ई-एनडब्ल्यूआर) प्राप्त कर सकते हैं जिन्हें बेचा जा सकता है. इन रसीदों के जरिए जिंसों को कहीं ले जाए बिना उनका मालिकाना हस्तांतरित करने की सुविधा है. ये रसीदें पंजीकृत गोदामों के माध्यम से ई-नाम प्लेटफॉर्म पर कारोबार करने के लिए एकमात्र साधन हैं.

यहां भी जटिलताएं हैं क्योंकि निजी क्षेत्र पर्याप्त गोदाम बनाने के लिए आगे नहीं आ रहा है और किसानों के पास अपनी उपज रखने के लिए साधन नहीं हैं. हालांकि वित्तीय संस्थान इन रसीदों को बतौर गारंटी मानने की व्यवस्था पर काम कर रहे हैं, जिससे किसानों को वित्तीय बाजारों का उपयोग करने और अपनी भंडारण क्षमताओं को बढ़ाने के लिए ज्यादा छूट मिल सके.

संघ परिवार से जुड़े भारतीय किसान संघ के महासचिव मोहिनी मोहन मिश्र कहते हैं, "किसानों की ताकत बढ़ाने के लिए ई-नाम एक अच्छी पहल है. इससे आसानी होती है. लेकिन इसे बड़े पैमाने पर बढ़ाने की जरूरत है. किसान को सशक्त बनाना होगा, जिससे वह अपनी उपज अधिक आजादी के साथ बेच सके."

ई-नाम के कई लाभ हैं, खासकर इसलिए कि किसान अब स्थानीय मंडियों के बाहर भी माल बेच सकते हैं और उन्हें अपनी उपज ढोकर ले जाने की जरूरत भी नहीं है. ऑनलाइन नीलामी में कीमत पारदर्शी तरीके से तय होती है. यह अनाज की गुणवत्ता और मांग पर आधारित है, जिससे किसानों को बाजार मूल्य प्राप्त करने का उचित अवसर मिलता है. वे ई-नाम पोर्टल और मोबाइल ऐप के जरिए जिंसों के लिए वास्तविक समय में कीमत की जानकारी भी हासिल कर सकते हैं.

डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर पूरा तैयार हो जाएगा तो कई दूसरे लाभ भी मिलने लगेंगे, जैसे कमोडिटी की ग्रेडिंग और मानकीकरण की प्रणाली. उचित और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के लिए समान गुणवत्ता मापदंड तय किए गए हैं. डिजिटल भुगतान और स्वामित्व (या अगर राज्य सरकार ने कानूनी प्रावधान कर रखे हैं तो अनुबंध) को अनिवार्य रूप से इससे जोड़ा गया ताकि यह तय हो सके कि पैसा सीधे किसानों को मिले. इससे लेन-देन की ऊंची लागत में कमी आती है और बिचौलियों के नाकारापन से भी छुटकारा मिलता है.

सबसे बड़ी बात तो यह कि डिजिटल और इंटरैक्टिव बाजार किसानों को खरीद-फरोख्त करने में दूर से भागीदारी करने की सुविधा देते हैं. इस तरह यह किसानों को बिक्री की पुष्टि होने तक माल की ढुलाई के बिना अपनी उपज बेचने में सक्षम बनाता है.

ऑनलाइन नीलामी में कीमतें पारदर्शी तरीके से तय की जाती हैं, इसलिए किसान को अपनी उपज का वाजिब बाजार मूल्य मिलने का अच्छा मौका मिलता है.

इसने कैसे बदली मेरी जिंदगी

"फसल लोड करने से पहले मुझे दूसरी मंडियों के भी भाव पता रहते हैं"

राम निवास यादव, 46 वर्ष
किसान, शाहपुर, गाजियाबाद

पिछले साल जुलाई में अपने साथी किसान प्रमोद त्यागी के साथ इत्तेफाकन हुई बातचीत के बाद राम निवास यादव ने ई-नाम को अपनाया. तीन भाइयों में सबसे बड़े यादव शाहपुर गांव में 10 एकड़ में फैले खेत पर सामूहिक खेती करते और सब्जियां उगाते हैं. अपनी उगाई फूलगोभी और गाजर वे ई-नाम के जरिए साहिबाबाद मंडी में बेचते हैं.

वे कहते हैं, "अपनी फसल की लदाई से पहले ही मैं दूसरी मंडी में चल रही कीमतों के बारे में पक्का पता कर लेता हूं. इससे न केवल बेहतर मुनाफा हासिल करने की मेरी क्षमता बढ़ती है बल्कि ढुलाई-लदाई की लागतें भी कम हो जाती हैं. हमारी यहां की थोक मंडी में फूलगोभी 2-3 रुपए किलो के भाव जा रही है, जबकि राजस्थान और कभी-कभी मध्य प्रदेश या महाराष्ट्र में भी काफी बेहतर कीमतें दिखाई देती हैं... मैंने त्यागी और उनके बेटों से ई-नाम के बारे में फटाफट बहुत सारी बातें सीख लीं. वे पहले ही इसका इस्तेमाल कर रहे थे और इसके जरिए ज्यादा पैसे कमा रहे थे."

यादव का कहना है कि इससे उनकी जिंदगी बड़ी आसान हो गई है क्योंकि उन्हें अपनी उपज स्थानीय मंडी में नहीं ले जानी पड़ती और न ही वहां के व्यापारियों की लगाई बोली पर पूरी तरह निर्भर रहना पड़ता है. वे आगे कहते हैं, "धीरे-धीरे समझ आ रहा है कि मैं अपनी फसल का मालिक हूं. किसान के लिए इससे बेहतर एहसास भला और क्या हो सकता है!"

ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार)
शुरुआत अप्रैल 2016 में
उपलब्धि 27 राज्यों में 1,389 मंडियों को जोड़ा गया. वित्त वर्ष 24 में 78,424 करोड़ रुपए की बिक्री दर्ज की गई

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