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कैसे धीरे-धीरे आखिरी छोर तक जाने के लिए पसंदीदा सवारी बन गया ई-रिक्शा?

ई-रिक्शा बिना किसी शोर-शराबे के स्थानीय परिवहन का सबसे बड़ा साधन बन गया है. इससे आवाजाही में आसानी हुई और लाखों लोगों को रोजगार मिला

75 Years of the Republic-E-rickshaw  
हाथ में बागडोर अमृतसर में 11 नवंबर, 2024 की धुंध भरी सुबह में ई-रिक्शे पर बैठकर घोड़े को ले जाता मालिक 
अपडेटेड 10 फ़रवरी , 2025

नई दिल्ली स्टेशन पर पहाड़गंज की तरफ से करीब 3 किलोमीटर दूर संसद मार्ग पर जंतर मंतर जाने के लिए ऑटो रिक्शे वाला आपसे 50 रुपए लेगा जबकि इतनी ही दूरी पर स्थित सदर बाजार तक ई-रिक्शे वाला 10 रुपए में पहुंचा देगा. फासला वही, किराया अलग-अलग. कनॉट प्लेस में ई-रिक्शे नहीं चलते इसलिए ज्यादा खर्च करना मजबूरी है.

दिल्ली-एनसीआर में जब ई रिक्शे प्रचलित नहीं हुए थे तब मेट्रो स्टेशनों और बस स्टॉप से एक-डेढ़ किलोमीटर दूर तक जाने में भी लोगों को ऑटोवालों या साइकिल रिक्शे वालों के मुंहबोले दाम देने पड़ते थे या दूसरा विकल्प ठसाठस भरे टेंपो होते थे. इससे लोगों को बहुत परेशानी होती थी. स्थानीय परिवहन का यह संकट पूरे देश में था.

यूं आसान हुआ जीवन
अब ई-रिक्शा वाले गलियों के मुहाने तक लोगों को 10 से 20 रुपए में पहुंचा रहे हैं. देश की राजधानी और दूसरे महानगरों से लेकर दूरदराज के गांवों तक में ई-रिक्शा आवाजाही का भरोसेमंद साधन बन गया है. इसके बूते लास्ट माइल कनेक्टिविटी का विचार सही मायनों में जमीन पर उतर आया है.

ई-रिक्शे का सफर मुख्य रूप से दिल्ली में ही शुरू हुआ जब 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों से कुछ पहले हरित ऊर्जा चालित इस वाहन को सड़क पर उतारा गया. इससे पहले ई-रिक्शा गोल्फ कार्ट के रूप में प्रगति मैदान और अन्य जगहों पर ही दिखता था. सस्ता और सुलभ होने के कारण यह तेजी से लोकप्रिय हुआ और इसकी संख्या भी बढ़ती चली गई.

वर्ष 2014 में दिल्ली हाइकोर्ट ने सुरक्षा चिंताओं और मनमाने तौर-तरीकों की वजह से ई-रिक्शे पर रोक लगा दी थी. लेकिन केंद्र सरकार ने इसके लिए मोटर वहिकल ऐक्ट में संशोधन कर नए नियम-कानून बनाए और उसके दायरे में ई-रिक्शा संचालन की मंजूरी दी. इसमें वाहन का रजिस्ट्रेशन, बीमा, चालक के लिए लाइसेंस आदि शामिल हैं.

इनके लिए सुरक्षा मानक और इनकी लंबाई, चौड़ाई, रफ्तार (25 किमी प्रति घंटा) तक तय कर दी गई. नई व्यवस्था के बाद तब परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मीडिया से कहा था कि ''मोटराइज्ड ई-रिक्शे चलने से मानव शोषण समाप्त हुआ है.’’ ई-रिक्शे से पहले के वक्त में साइकिल रिक्शे वाले दिल्ली के पंचकुइयां रोड के फर्नीचर मार्केट से नोएडा तक सोफे, बेड आदि 500 रुपए में लेकर जाते थे. सोफे से लदे साइकिल रिक्शे को करीब 20 किलोमीटर पैडल मारते हुए ले जाना बेहद श्रमसाध्य था.

अब स्थिति बदल गई है. सवारी के साथ ही चलाने वाले के लिए भी ई-रिक्शा वरदान है क्योंकि यह सस्ता है, इसकी रिपेयरिंग आसान है, ईंधन के लिए बिजली कनेक्शन की जरूरत पड़ती है. इसी वजह से बड़ी संख्या में महिलाएं ई-रिक्शा चला रही हैं. यानी यह रोजगार का भी एक बड़ा साधन बन चुका है. वैसे अभी भी साइकिल रिक्शे चल रहे हैं पर उनकी संख्या तेजी से कम होती जा रही है. तंग और भीड़ भरी गलियों में आखिरी ठिकाने तक पहुंचने के लिए ई-रिक्शा पसंदीदा सवारी है. सबसे बढ़कर चलाने वाले व्यक्ति को इंसानों को बैठाकर खींचना नहीं पड़ता, जिससे दोनों की गरिमा बनी रहती है.

कानूनी मान्यता मिलने के बाद 2015 से ई-रिक्शों का रजिस्ट्रेशन शुरू हुआ. सवारी साइकिल रिक्शा और ढुलाई का काम करने वालों ने इसे अपनाया. फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (एफएडीए) के 2024 के आखिरी तीन महीने के आंकड़ों को मानें तो पता चलता है कि हर महीने 40 से 45 हजार ई-रिक्शों का रजिस्ट्रेशन होता है.

देश में अभी करीब 20 लाख ई-रिक्शे दौड़ रहे हैं. एफएडीए या फाडा के सीईओ सहर्ष दमानी कहते हैं, ''भारत में उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा ई-रिक्शे हैं. देश के ई-रिक्शों में यूपी की हिस्सेदारी 41 फीसद है और इसके बाद 12.5 फीसद के साथ बिहार का नंबर आता है. नोएडा, लखनऊ और गाजियाबाद में परिवहन और माल ढुलाई के साधन के तौर पर ई-रिक्शों का जबरदस्त ढंग से उपयोग हो रहा है. लास्ट माइल कनेक्टिविटी सचमुच इसी से आई है.’’

ईवी टू व्हीलर और थ्री व्हीलर बनाने वाली कंपनी ओपीजी फ्यूचर मोबिलिटी (ओकाया ईवी प्राइवेट लिमिटेड) के प्रबंध निदेशक अंशुल गुप्ता कहते हैं, ''थ्री व्हीलर ईवी के पैसेंजर और कार्गो दोनों सेगमेंट बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं. उत्तर प्रदेश और नार्थ ईस्ट में इनकी मजबूत मौजूदगी के बाद अन्य राज्यों में भी तेजी से इनकी बिक्री बढ़ रही है.

पैसेंजर और कार्गो थ्री व्हीलर वर्टिकल अपने दम पर खड़ा हुआ है जिसका सवारी के साथ चालक को भी लाभ मिल रहा है.’’ यह सवारी को सहूलियत और चलाने वाले को रोजगार दे रहा है. आर्थिक सशक्तीकरण और टिकाऊ परिवहन में ई-रिक्शा भविष्य में भी अहम योगदान करेगा.

ईवी के भविष्य को केंद्र की मोदी सरकार भी समझ रही है और इसी वजह से 2024 में वह पीएम ई-ड्राइव योजना लाई है. स्वच्छ भारत की तरह स्वच्छ वाहन के विचार के साथ लाई गई इस योजना में अन्य वाहनों के अलावा ई-रिक्शा के लिए भी सब्सिडी का इंतजाम किया गया है. बहरहाल, ई-रिक्शा छोटी दूरी के लिए सबसे सुविधाजनक साधन बना हुआ है.ठ्ठ

देश में अभी करीब 20 लाख ई-रिक्शे दौड़ रहे हैं. भारत में उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 41 फीसद ई-रिक्शे हैं और इसके बाद 12.5 फीसद के साथ बिहार का नंबर आता है. दिल्ली के मंडावली में रहने वाली 20 साल की महक बताती हैं कि वह नोएडा फिल्म सिटी के एक इंस्टीट्यूट से एनिमेशन का कोर्स कर रही हैं. उनका कहना है, ''मेट्रो की सवारी करते हुए भी हमारे लिए पब्लिक कन्वेंस से नोएडा फिल्म सिटी जाना थोड़ा मुश्किल होगा अगर इस सफर से ई-रिक्शे को हटा दिया जाए.’’ अभी वे अपने घर के एकदम बगल से ई-रिक्शे से निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन तक 10 रुपए देकर जाती हैं.

नोएडा सेक्टर 16 मेट्रो स्टेशन पर उतरकर फिर ई-रिक्शे से 15 रुपए में अपने इंस्टीट्यूट के गेट तक पहुंच जाती हैं. एकाध बार ऑटोरिक्शे से गईं लेकिन वह काफी महंगा है. वे बताती हैं, ''ऑटो वाला हमेशा कम से कम 50 रुपए मांगता है. ई-रिक्शा मेरे लिए पॉकेट फ्रेंड्ली और सुविधाजनक है. इसकी कनेक्टिविटी मेरे लिए लगभग डोर-टु-डोर है.’’

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