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ई-गवर्नेंस ने कैसे सरकारी सेवाओं के इस्तेमाल को बनाया आसान?

ई-गवर्नेंस क्रांति ने ग्रामीण और शहरी भारत के बीच डिजिटल विभाजन पाट दिया है. इसने नागरिकों के लिए कहीं भी और कभी भी सरकारी सेवाओं को सुलभ बना दिया.

75 Years of the Republic rural service delivery
ड्योढ़ी पर प्रशासन सरकारी पोर्टल के माध्यम से कर का भुगतान करते हुए एक दिल्लीवासी
अपडेटेड 11 फ़रवरी , 2025

भारत में बात चाहे सरकारी शुल्क/करके भुगतान की हो, दस्तावेज या प्रमाणपत्र हासिल करने या फिर कल्याणकारी योजनाओं के लिए पंजीकरण कराने की, दशकों से सरकार और नागरिकों के बीच संपर्क तो अकुशलता, पारदर्शिता के अभाव और सेवाओं तक पहुंच न होने का ही पर्याय रहा है. प्रक्रियाओं पर अत्यधिक निर्भरता के कारण नागरिकों के लिए सरकारी सेवाओं तक पहुंच चुनौतीपूर्ण रही है.

कोई भी काम कराने में लंबा समय लगना, बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटना लोगों की मजबूरी होती थी क्योंकि फाइलें तो कछुए की चाल से भी एक मेज से दूसरी मेज पर नहीं पहुंच पाती थीं. भ्रष्टाचार की वजह से जगह-जगह घूस खिलाना भी मजबूरी बन जाता था. सरकारी विभागों के बीच कोई समन्वय न होने से सेवा वितरण और भी ज्यादा बाधित होता था. योजनाओं और सेवाओं के बारे में जागरूकता की भी कमी थी. नतीजा, समय तो लगता ही था और उत्पादकता भी बहुत कम थी.

यूं आसान हुआ जीवन 
सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल और डिजिटलीकरण के निरंतर तीव्र विकास पर आधारित इलेक्ट्रॉनिक शासन या ई-गवर्नेंस को धीरे-धीरे अपनाने से तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. भारत में ई-गवर्नेंस पहल और डिजिटल प्लेटफॉर्म की तरफ से हर क्षेत्र में बदलाव की एक नई इबारत लिखी जा रही है. शहरों के बाद तेजी से ग्रामीण भारत में भी सरकारी सेवाएं प्रदान करने के मामले में नागरिक-केंद्रित उपायों के लिए प्रौद्योगिकी को अपनाया जा रहा है.

2015 में शुरू डिजिटल इंडिया पहल ग्रामीण और शहरी भारत के बीच डिजिटल विभाजन को पाटने और ई-गवर्नेंस को बढ़ाने में काफी कारगर रही है. सरकारी सेवाएं मुहैया कराने के लिए कॉमन सर्विस सेंटर के माध्यम से 6,00,000 गांवों को डिजिटल स्तर पर जोड़ने के अलावा भारतनेट 2,50,000 ग्राम पंचायतों को हाइ-स्पीड इंटरनेट से भी जोड़ रहा है. ई-गवर्नेंस और विभिन्न सेवाओं के उपयोग के लिए आधार संख्या बेहद जरूरी है.

ऑनलाइन बिल्डिंग परमिशन सिस्टम (ओबीपीएस) इस दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है. इस सिंगल-विंडो प्लेटफॉर्म ने भवन संबंधी परमिट लेने की प्रक्रिया दुरुस्त कर दी है. पहले आवेदकों को विभिन्न स्तर पर मंजूरी के लिए विभिन्न एजेंसियों के चक्कर लगाने पड़ते थे. दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में इस प्रणाली ने सभी संबंधित विभागों, मसलन अग्नि सुरक्षा, जलापूर्ति, बिजली बोर्ड आदि को एक ही डिजिटल मंच पर ला दिया है.

मौजूदा समय में 2,530 से ज्यादा स्थानीय शहरी निकाय इस मॉडल को अपना चुके हैं. इसी तरह, सुरक्षित ऑनलाइन भुगतान गेटवे के माध्यम से लोगों और कारोबारियों के लिए नगरपालिका कर और अन्य शुल्कों का भुगतान करना बेहद आसान हो गया है. भूमि संबंधी लेखा-जोखा अक्सर अस्पष्ट होने को लेकर सवालों के घेरे में रहता था लेकिन डिजिटलीकरण से इसमें भी काफी बदलाव आया है. भूखंडों को दर्शाने वाले कैडस्ट्रल मानचित्र और संपत्ति लेन-देन संबंधी रिकॉर्ड डिजिटल करके शहरी निकायों ने संपत्ति की खरीद और बिक्री को ज्यादा पारदर्शी बनाया है.

ई-गवर्नेंस में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाला एक और पहलू है, शिकायत निवारण प्लेटफॉर्म. आज, शहरी निकाय ऑनलाइन शिकायत पोर्टल प्रदान करते हैं जिसमें नागरिक अपनी दिक्कतें दर्ज कर सकते हैं और चुटकियों में यह पता लगा सकते हैं कि उनके आवेदन की क्या स्थिति है. जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र, व्यापार लाइसेंस या पानी के कनेक्शन जैसी सेवाओं के लिए आवेदन करने वाले नागरिकों के लिए ऑनलाइन आवेदन ट्रैकिंग सिस्टम एक और मील का पत्थर है.

शहरी निकायों के मोबाइल ऐप आने से आवश्यक सेवाएं ज्यादा सुलभ हो गई हैं. मसलन मुंबई का बीएमसी मोबाइल ऐप नागरिकों को संपत्ति कर भुगतान, शिकायत दर्ज कराने और नगरपालिका की विभिन्न सेवाओं तक विस्तृत पहुंच मुहैया कराता है. दिल्ली का नगर निगम पोर्टल भी इसी तरह की सेवाएं देता है, वहीं बृहत बेंगलूरू महानगर पालिका ने एक नागरिक सहभागिता मंच पेश किया है, जिसमें आम लोग भी निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते हैं और अपनी राय दे सकते हैं. असल में, पारदर्शिता डिजिटल सुधारों की पहचान बन चुकी है. नगर पालिकाएं अब ऑनलाइन पारदर्शिता पोर्टल संचालित करती हैं जो नागरिकों को बजट, व्यय और परियोजना संबंधी जानकारी पर हर अपडेट प्रदान करती हैं.

ई-गवर्नेंस सेवाएं न केवल जीवन की गुणवत्ता को बढ़ा रही हैं, बल्कि स्मार्ट शहर बनाने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के भारत के बड़े लक्ष्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं, ''ई-गवर्नेंस सुलभ, प्रभावी और किफायती व्यवस्था है. यह पर्यावरण के अनुकूल भी है. कागज रहित दफ्तर पर्यावरण को लाभ पहुंचाएंगे.’’ जैसे-जैसे ये पहलकदमियां आगे बढ़ती जा रही हैं, भारत में ई-गवर्नेंस का भविष्य उज्ज्वल नजर आता है.

ऑनलाइन शिकायत निवारण पोर्टल पारदर्शिता बढ़ाते हैं, जबकि शहरी निकायों के मोबाइल ऐप सेवाओं को अधिक सुलभ बनाते हैं.

‘‘ऑनलाइन भवन निर्माण अनुमति ने बढ़ाई पारदर्शिता’’

एडवोकेट विकास गुप्ता ने हाल में दिल्ली में अपने पुश्तैनी घर का पुनर्निर्माण किया. उन्होंने 2019 में दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) की तरफ से शुरू की गई ऑनलाइन बिल्डिंग परमिशन सिस्टम (ओबीपीएस) के बारे में जानने से पहले लोगों से सिर्फ यही सुना था कि नागरिक निकायों से अनुमति लेने में पसीने छूट जाते हैं. गुप्ता ने ओबीपीएस की वेबसाइट पर अपना अकाउंट बनाया, आवेदन पत्र भरा, दस्तावेज अपलोड किए और शुल्क का भुगतान किया.

सिस्टम ने उनके आवेदन और दस्तावेजों को सत्यापित किया और उन्हें एक पावती रसीद मिल गई. 10 दिनों के भीतर गुप्ता को एक ई-मेल मिला जिसमें बताया गया कि उन्हें भवन पुनर्निर्माण की मंजूरी मिल गई है. उन्होंने ओबीपीएस की वेबसाइट से परमिट डाउनलोड किया और निर्माण कार्य शुरू करा दिया. गुप्ता कहते हैं, ''ओबीपीएस ने बिल्डिंग परमिट पाने की प्रक्रिया बदल दी है. एक कुशल और नागरिक अनुकूल मंच प्रदान करके ओबीपीएस ने आवेदन प्रोसेस होने में लगने वाला समय घटा दिया. इसने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता भी बढ़ाई है.’’
 

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