अरे नहीं...!’’ अगर आप शॉपिंग के शौकीन नहीं थे और कोई आपको शॉपिंग के लिए चलने को कहता था, तो क्या यही आपकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं होती थी? भीड़ भरे ट्रैफिक के बीच ड्राइव करने, पार्किंग की जगह के लिए जद्दोजहद, दुकान में धक्कामुक्की के बीच खरीदारी की चीजों के लिए हाथ-पांव मारने और फिर बिल चुकाने के लिए लंबी कतार में खड़े रहने से भला कौन नहीं डरता?
गर्मी, बारिश और सर्दी इस बुरे सपने को और डरावना बना देती थीं. और भगवान न करे आप किसी कस्बे या गांव में रहते हों, जहां ब्रांडेड कपड़े परायी दुनिया की चीजें हों, या आप कीमत को लेकर सजग ग्राहक हों. ब्रांडेड कपड़ों के लिए आपको नजदीकी शहर में जाना पड़ता. कई दुकानों के चक्कर लगाने के बाद सही कीमत पर सही चीज मिलती. शॉपिंग मॉल का भी घर बैठे खरीदारी करने की आरामतलबी से कोई मुकाबला नहीं था.
यूं आसान हुआ जीवन
बदलाव सबसे पहले भारतीय पुस्तक प्रेमियों के लिए आया जब बेंगलूरू स्थित अपने मुख्यालय से संचालित फ्लिपकार्ट (बाद में जिसे वॉलमार्ट ने खरीद लिया) ने 2007 में किताबों की ऑनलाइन बिक्री शुरू की. गुरुग्राम स्थित स्नैपडील भी तीन साल बाद मैदान में आ गई और उसने कूपन, छूट और विशेष ऑफर की पेशकश की. अमेजन 2013 में भारत आया, वह भी बुकसेलर के रूप में. उस वक्त तक भारतीय ई-कॉमर्स बाजार 12.6 अरब डॉलर का आंका जाता था, जो 2009 के 3.9 अरब डॉलर के मुकाबले तिगुने से ज्यादा बढ़ चुका था. किताबों के बाद ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म मोबाइल फोन बेचने का मुकम्मल बाजार बन गए.
मैनेजमेंट कंसल्टिंग फर्म रेडसीयर के एसोसिएट पार्टनर कुशल भटनागर कहते हैं, ''ऐसा इसलिए क्योंकि मोबाइल फोन मानकीकृत उत्पाद थे और ऑनलाइन रिव्यू पढ़ना और कीमतों की तुलना करना आसान था.’’ देखते ही देखते ई-कॉमर्स की दुनिया हर चीज की पेशकश करने लगी—परिधान, सौंदर्य प्रसाधन, बड़े एप्लाएंस, घर की सजावट की चीजें, खिलौने...
स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल और इंटरनेट ने ऑनलाइन खरीद में दिन दूना रात चौगुना इजाफा किया.
वॉइस सर्च, लोकल लैंग्वेज ऑप्शन, डील और डिस्काउंट, कैश ऑन डिलिवरी के साथ तुरत-फुरत व्यापार, आसान रिटर्न और रिफंड—सबने क्रांति में चार चांद लगा दिए. फिलहाल खुदरा बाजार में ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी महज सात फीसद है और ऐसे में इसकी क्षमता और संभावनाओं की बस कल्पना ही कर सकते हैं.
नए बाजार तक पहुंचने के लिए, ऑनलाइन रिटेलर्स अब वॉइस सर्च, स्थानीय भाषा विकल्पों और ऐप्स के लाइट वर्जन का उपयोग कर रहे हैं.
‘‘चीजों का घर पर डिलिवर होना बहुत सुविधाजनक है’’
मार्केटिंग प्रोफेशनल दीप्ति कदम सिन्हा को याद भी नहीं कि पिछली बार उन्होंने बाजार में कब कदम रखा था. कामकाजी महिला और दो बच्चों की मां होने के नाते समय की उनके लिए बहुत ज्यादा कीमत है, जो उन्हें कम ही मिलता है. ऐसे में बहुत सारी ई-कॉमर्स वेबसाइट उनके लिए राहत की तरह आईं. उनके परिधानों की जरूरतों के लिए अमेजन और कैजुअल वीयर के लिए मिंत्रा, या दफ्तर के कपड़ों के लिए एचऐंडएम और मार्क्स ऐंड स्पेंसर हैं. बच्चों के लिए खिलौनों, बेबी प्रोडक्ट और कपड़ों के लिए वे फर्स्टसिटी और बेबीहब पर जाना पसंद करती हैं.
हाल में स्विगी के इंस्टामार्ट पर घर की सजावट की कई चीजें पाकर उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ और उन्होंने फटाफट ताजे फूलों, सजावटी फूलदानों और सुगंधित मोमबत्तियों के ऑर्डर दे डाले. उन्हें अमेजन की तरफ से कई तरह की चीजों पर दिए जाने वाले 20-30 फीसद के डिस्काउंट भी बहुत कारगर लगते हैं और डायपर, रसोई की जरूरी चीजों और पर्सनल केयर की चीजों सरीखे उत्पादों के लिए वे उनका लाभ उठाती हैं.
दीप्ति कहती हैं, ''चूंकि मेरे दो बच्चे हैं, इसलिए घर पर चीजें डिलिवर होना मेरे लिए बहुत सुविधाजनक हो गया है. चीजें खरीदने के लिए कतारों में खड़े होने या सफर करने का धैर्य और समय अब मेरे पास नहीं है.’’ महीने भर में लौटाने की नीति भी उनके लिए खासी कारगर है, जिससे उन्हें विभिन्न प्रोडक्टस को आजमाने का वन्न्त मिल जाता है.