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लागत से चौगुना फायदा; ड्रिप सिंचाई अभियान से कैसे बदल रही किसानों की किस्मत?

भारत जलसंकट से ग्रस्त देश बनता जा रहा है. ऐसे में ड्रिप सिंचाई अभियान किसानों के लिए भरपूर फायदे लेकर आया जिससे उपज और आमदनी दोनों बढ़ी

गुजरात में गांधीनगर के खोराज गांव में अपने ड्रिप सिंचाई नेटवर्क के पास भीखाभाई मोरे
गुजरात में गांधीनगर के खोराज गांव में अपने ड्रिप सिंचाई नेटवर्क के पास भीखाभाई मोरे
अपडेटेड 11 फ़रवरी , 2025

भारत में कृषि क्षेत्र लगातार चुनौतियों से भरा रहा है और इसकी मुख्य वजह है पानी को लेकर अनिश्चितता. ज्यादातर इलाकों में जहां पानी है भी लेकिन खराब प्रबंधन से उसका लाभ ज्यादा नहीं मिल पाता.

भारत में खेती-किसानी आम तौर पर बाढ़ सिंचाई पद्धति से की जाती है, जिसमें पानी को या तो पूरे खेत में खुला बहने के लिए छोड़ दिया जाता है या हाथ से विभिन्न उपायों से उलीचा जाता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि उसमें सिर्फ 50 फीसद पानी फसलों के काम आता है, बाकी बहने, उड़ने या मिट्टी में रिसने की वजह से बर्बाद हो जाता है. इसलिए इसका विकल्प जरूरी था.

देश में सिंचाई के लिए पानी का मुख्य स्रोत नलकूपों से उलीचा गया भूमिगत जल (45 फीसद) है. उसके बाद नहर सिंचाई पद्धति से लाया गया बड़ी नदियों और उनकी सहायक नदियों का पानी (26 फीसद) आता है. दोनों ही मामलों में पानी की बहुत ज्यादा बर्बादी होती है.

भूमिगत जल को निकालने में बिजली की जो लागत आती है, सो अलग. अप्रत्याशित मौसम इन दुश्वारियों को और बढ़ा देता है, जिससे खेती-किसानी भारत में बहुत जोखिम भरा पेशा बन गई है. भूमिगत जल पर आधारित सिंचाई पर्यावरण के लिए भी घातक है क्योंकि जल स्तर खतरनाक स्तर तक गिर रहा है.

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सूक्ष्म सिंचाई से जुड़ी केंद्र-प्रायोजित योजना पहली बार जनवरी 2006 में शुरू की गई थी मगर अप्रैल 2015 में उसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) के तहत लाने और राज्यों को लक्ष्य दिए जाने के बाद ही असल में यह योजना परवान चढ़ने लगी. कृषि और किसान कल्याण विभाग की ओर से जुलाई 2015 में इसे नया नाम पीएमकेएसवाई: पर ड्रॉप मोर क्रॉप (पीडीएमसी) दिया गया.

यह योजना खेतों में ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणालियां स्थापित करके सूक्ष्म सिंचाई के जरिए पानी के इस्तेमाल की दक्षता में इजाफा करती है, जिससे पानी का इस्तेमाल अपने आप 50 फीसद कम हो जाता है. सरकार लघु सिंचाई प्रणालियां स्थापित करने की शुरुआती लागत का 45 से 50 फीसद हिस्सा खुद वहन करती है, और राज्य सरकार के प्रोत्साहन लाभों के साथ मिलकर, इसमें सब्सिडी 70 फीसद तक पहुंच जाती है. लघु सिंचाई प्रणाली स्थापित करने की औसत लागत प्रति एकड़ करीब 50,000 रुपए है.

दरअसल, स्रोत पर पानी की उपलब्धता की प्राथमिक चिंता से निबटने के लिए वर्षा जल के दोहन, दक्षतापूर्ण जल परिवहन, और पानी को जमीन से खींचने वाले यंत्रों की लागत को अधिकतम बढ़ाकर पीडीएमसी बहुत छोटे स्तर के वाटर स्टोरेज के निर्माण में भी मदद करती है. सरकार गांव में छोटे-छोटे वैकल्पिक जलाशय, या पोखर-तालाब बनाने के खर्च का 60 फीसद हिस्सा वहन करती है.

दरअसल, पीडीएमसी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे मौसम के उतार-चढ़ावों पर निर्भरता और इसलिए खेती-किसानी से जुड़ी अनिश्चितता कम हो जाती है. इसका नतीजा बेहतर योजना, फसलों में ज्यादा विविधता, मिट्टी की बेहतर सेहत, ज्यादा रकबे और इस तरह ज्यादा मुनाफे के रूप में सामने आता है. यही नहीं, ड्रिप सिंचाई प्रणाली के माध्यम से खाद भी दी जाती है. इससे मजदूरी का खर्च भी आधे से कम हो गया, जो कृषि में सबसे ज्यादा लागत वाले घटकों में से एक है.

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ललित पटेल, नवानगर गांव, साबरकांठा, गुजरात

उत्तर गुजरात में साबरकांठा जिले के किसान ललित पटेल साल में बस एक कपास की फसल उगाया करते थे. मगर बीते 15 साल से वे तीन अलग-अलग फसलें उगा रहे हैं और उनकी आमदनी प्रति सीजन प्रति हेक्टेयर 25,000 रुपए से बढ़कर प्रति हेक्टेयर 1,25,000 रुपए हो गई है. यह खुशहाली बेहतर जल प्रबंधन और राज्य की प्रति बूंद ज्यादा फसल (पीडीएमसी) योजना की बदौलत आई है.

गुजरात सरकार ने यह सूक्ष्म सिंचाई योजना सबसे पहले साल 2005 में शुरू की थी और पटेल इससे जुड़ने वाले बिल्कुल शुरुआती किसानों में से थे, जिन्होंने अपने 15 एकड़ के खेत में ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर प्रणालियां स्थापित कीं. साल 2010 आते-आते 100 परिवारों के उनके गांव के कुल 460 हेक्टेयर में फैले खेतों में से हरेक ने सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली स्थापित कर ली.

पटेल कहते हैं, ''अब अक्तूबर-नवंबर में कपास की फसल की कटाई के बाद हम सर्दियों के तीन महीने खरबूजा उगाते हैं. उसके बाद हम या तो फूलगोभी, टमाटर, बैंगन, आलू सरीखी सब्जियां उगाते हैं या फिर मूंगफली, सौंफ या अरंडी.''

उनकी किस्मत सिर्फ इसलिए नहीं पलटी कि वे ज्यादा फसल उगा सकते हैं, बल्कि इसलिए भी कि उनके खर्च प्रति एकड़ एक-चौथाई रह गए हैं. पटेल कहते हैं, ''भूमिगत जल का स्तर इतनी तेजी से छीज रहा था कि 550 फुट के बाद ही पानी मिल पाता था. हम बिजली पर 17,000 रुपए महीने तक खर्च करते थे. अब हम स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई प्रणालियों के लिए 5 एचपी की मोटर का इस्तेमाल करते हैं और इसकी लागत महज 2,000 रुपए प्रति माह है.''

फायदे इससे भी बढ़कर हैं. नवानगर के करीब 300 किसानों ने जल सहकारी समिति, बीज और उर्वरक सहकारी समिति, तथा इसके अलावा किसान उपज संगठन (एफपीओ) का गठन किया है. इनके जरिए वे कमोडिटी व्यापारियों के सीधे संपर्क में रहते हैं, जिससे बिचौलिए खत्म हो गए और मुनाफा अधिकतम हो गया है.

सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों ने पानी के उपयोग को 50 फीसदी तक घटा दिया है. इसके अलावा अब किसानों को भी मौसम की मेहरबानी पर उतना निर्भर नहीं रहना पड़ता.

पर ड्रॉप मोर क्रॉप (पीडीएमसी)

शुरुआत: 2015 में

उपलब्धि मार्च 2024 तक करीब 89.7 लाख हेक्टयेर खेत कवर किए गए.

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