● इस रेट्रोस्पेक्टिव का शीर्षक ऑफ वर्ल्ड्स विदिन वर्ल्ड्स (संसार के भीतर संसार)रखने का ख्याल कैसे आया?
मैं गुजरात के छोटे-से कस्बे में रहता था.1955 में बड़ौदा की फैकल्टी ऑफ फाइन आर्ट्स ज्वाइन करने के बाद एक दुनिया मेरे सामने खुली. 1963 में इंग्लैंड जाने पर एक तीसरा संसार खुला. कला के सारे बड़े काम मैंने देखे. फिर भारत भर की यात्रा की. घुमक्कड़ी शुरू से मेरे भीतर रही है. उस लिहाज से यह शीर्षक मौजूं लगा.
● नक्शे आपको क्यों आकर्षित करते हैं?
नक्शों में हमेशा से मेरी दिलचस्पी रही है लेकिन कभी वैसा नक्शा नहीं मिल पाया जिसे आधार बनाकर पर काम कर सकूं. 2001 या 2002 में एक ब्रिटिश म्यूजियम बुकशॉप में मुझे नक्शों की एक छोटी-सी किताब और एब्स्टॉर्फ मप्पा मुंडी (दुनिया का मध्यकालीन यूरोपीय नक्शा) नाम का एक वृत्ताकार नक्शा मिला. यह ईसाई नक्शा था. उसमें से वे संदर्भ हटाकर मैं अपने हिसाब से चीजें जोड़ता-घटाता रहा.
● मीडियम, फॉर्म और टेक्नोलॉजी के साथ आप प्रयोग जारी रखे हुए हैं.
नए माध्यमों को आजमाना मुझे पसंद है. किसी खास दौर में जिन चीजों से मुब्तिला हूं, उन पर ध्यान केंद्रित किए रखना मुझे पसंद है. यह चलता रहता है. मैं इसी तरह से आजमाता रहता हूं.
● आप अपने काम में दुनिया भर के समसामयिक मुद्दों को समेटते हैं. बतौर चित्रकार आप निराश होने से कैसे बच पाते हैं?
ज्यादातर चीजों में हमने उम्मीद छोड़ ही दी है. आपकी आंखों के सामने दुनिया जल रही है, चाहे वह रवांडा हो, यूक्रेन या गजा—कितना कुछ हो रहा है वहां और आम आदमी पूरी तरह से असहाय-निरुपाय. पर मेरा मानना है कि पेंटिंग या कला उम्मीदों का ही पर्याय हैं. वे जिंदगी का किस्सा कहती आई हैं और कहती रहेंगी.
—दीपाली धींगरा.