
कहते हैं उपनिषदों का ज्वलंत ज्ञान सबके लिए नहीं है. वजह: यह बुद्धि मात्र की यानी सिर्फ बौद्धिक उपलब्धि नहीं बल्कि शरीर पर उसके निरंतर गहन अभ्यास से आप वहां तक पहुंचते हैं. लेकिन संगम में स्नान के लिए वे विभूतियां भी आती हैं जो तमाम सांसारिक आकर्षणों से दूर हो चुकी हैं. यही वह संगमस्थल है जहां दोनों मिलते हैं. एक तरफ मोह-माया के अंधकार में घिरे, रोजमर्रा की फिक्र में घुलते करोड़ों हिंदुस्तानी, तन से सटे तन इतनी तादाद में कि कोई दबकर ही मर जाए. और दूसरी तरफ अपनी पुरानी काया को त्याग चुके, भस्म-भभूत और भगवा लपेटे रहस्यमयी साधु.
तंबुओं के भीतर उनका ठिकाना है. उनमें हर तरह के तपस्वी हैं. कोई ध्यानमुद्रा में मग्न तो कोई जोशोखरोश के साथ लोक - परलोक की वार्ता में खोया हुआ. ताजी रोटियों की महक और अगरबत्ती तथा चिलम का धुआं पूरे परिवेश में एकमेक होता हुआ. हरेक का अपना बेजोड़ व्यक्तित्व. सोशल मीडिया पर चर्चित हुए 2025 के तपस्वियों को एक नया मुहावरा मिला है. वे वायरल होने के साथ-साथ पूज्य बन रहे हैं. तो क्या यह महज एक कौतुक है? केवल उनके लिए जो इसमें एक तरह की जुगुप्सा तलाशेंगे. ये वे प्राणी हैं जिन्होंने देह के माध्यम से ही देह से परे जाने का रास्ता खोज लिया है. हरेक की अपनी अलग और अनूठी कहानी है
महंत राजगिरि जी उर्फ 'एंबेसडर बाबा'
उनका चार पहियों का रथ चलते-फिरते देवस्थल से कम नहीं. इसमें घंटियों और झांझ के अलावा शनि, शिव, गणेश व पार्वती की मूर्तियां सवारियों की तरह बैठी हैं. एक माइक, रेडियो और मच्छरदानी भी रथ की शोभा बढ़ा रहे हैं. आधुनिक दवाओं से भी असाध्य बने एक गंभीर चर्म रोगी ने चंगा कर देने पर कोई 35 साल पहले यह रथ उन्हें भेंट किया था—इसी ने उन्हें सोशल मीडिया पर यह नाम दिया.
मां-बाप ने बचपन में ही उन्हें जूना अखाड़े को दे दिया था. उनका लालन-पालन तपश्चर्या के कठोर नियमों के बीच हुआ. करीब 14 साल की उम्र में उन्होंने नागा साधु का बाना लिया. जब वे इंदौर में अपनी कुटिया में नहीं होते, तो पहियों पर चलते-फिरते इस आश्रम में बैठकर भारत भर में घूम रहे होते हैं. वे इसे कभी किसी और को ड्राइव नहीं करने देते. इसकी मरम्मत को वे बहुत अहमियत देते हैं. वे मुस्कराते हुए कहते हैं, ''भक्त आते-जाते रहते हैं पर इसने कभी मुझे धोखा नहीं दिया. कभी-कभी तो यह अपने आप स्टार्ट हो जाती है!''
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भूपेंद्र गिरि उर्फ मिनी महादेव

इस नश्वर मनुष्य लोक और उसके परे के संसार के बीच जीवों का एक और तबका मौजूद है: वह है साधुओं का. और जिस तबके के साधुओं के दर्शन मात्र से भक्तों में श्रद्धा और विस्मय की भावना उमड़ पड़ती है, उनमें निरंजनी अखाड़े के 6'5'' के इस महंत से ज्यादा राजसी कोई नहीं. मूलत: सिख इस नागा साधु की नफासत वाली अंग्रेजी उनकी ठोस तालीम की खबर देती है.
उन्होंने 1989 में संन्यास लिया था और 1998 में वे नागा साधु हो गए. यहां संगम के स्फटिक जल पर उनकी बाघंबरी काया मिथकीय प्रेतछाया की तरह मंडराती है. यहां उनका किसी स्टार की तरह आकर्षण है: आखिरकार सेल्फी की खातिर भटकते लोगों के लिए खुद शिव सरीखे फ्रेम के साथ खुद को क्लिक करने से बेहतर भला क्या मिल सकता है उन्हें!
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दिगंबर हरिबंस गिरि (वहां ऊपर आसमान में)

दिगंबर हरिबंस गिरि की उलझी जटाएं सीधी की जाएं तो शायद जमैका तक पहुंच जाएं पर उन्हें आकाश की आकांक्षा नहीं. काल के आगे बहुत पहले समर्पण कर चुके गिरि ने अपना बायां हाथ पांच साल से उठा रखा है, जिसकी अंगुलियां मुड़कर सख्त हो गई हैं और टेढ़े-मेढ़े नाखून उनके व्यक्तित्व को और भी रहस्यमय बनाते हैं. 57 वर्ष की अवस्था में उनकी जटाएं पिछले 15 वर्षों से नहीं कटी हैं.
यह सब स्वेच्छा से वैराग्य अपनाकर तपस्वी जीवन के प्रति समर्पित हो जाने का परिचायक है. महज 12 वर्ष की उम्र में संन्यासी जीवन की राह चुनने वाले हरिबंस ने 24 वर्ष की अवस्था में नागा बिरादरी के कड़े दीक्षा संस्कार लिए. अटल अखाड़े में दीक्षित हैं. कभी वे खड़े ही रहते थे. सोते भी झूले पर थे. इस तरह 12 वर्ष तक ऐसे ही खड़े रहे, फिर नया संकल्प लिया कि अपना बायां हाथ कभी नीचे नहीं करेंगे. वे कहते हैं, ''पहले तो असहनीय दर्द हुआ. हाथ सूज गया और मांसपेशियां भी अकड़ गईं. लेकिन शरीर धीरे-धीरे इसका आदी हो गया.''
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योगिराज गौतम गिरि (सांसें भी मुट्ठी में)

उनकी मौजूदगी ही हलचल मचा देने के लिए काफी है. चीनी युद्धकला शाओलिन में प्रवीण भिक्षु-सा सख्त शरीर और करिश्माई चेहरा. व्यवहार उतना ही शांत. उम्र महज 32 वर्ष, कपाल साधना में पारंगत, एकांतप्रिय. बर्फीले हिमालय में साधना और 12 वर्ष सिर्फ चाय पर रहे. वह तन-मन की इच्छाओं को नियंत्रित करने के लिए वार्षिक योग साधना अभियान था.
नतीजे सामने हैं: वे लंबे समय तक सांस रोककर रह सकते हैं. शिष्य एक गड्ढा खोदते हैं. योगिराज जटाएं बांध धरती के अंधेरे गर्भ में सिर धंसा देते है. एक मिनट...दो मिनट...तीन मिनट. पांचवें मिनट में लोगों में फुसफुसाहट. उनसे बाहर आने को कहा जाता है. वे धूल झाड़ निकलते हैं. यह सांसों पर नियंत्रण का जादू है. उनके शब्दों में, ''शरीर को समझो, विश्वास रखो, वह सब कर सकते हो जो असंभव लगता है.''
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अजीत गिरि महाराज (इंद्रियों पर नियंत्रण)

एक छोटा-सा लाल-पीला तंबू. भीतर एक नग्न आकृति पालथी मारकर बैठी है. पूरे शरीर पर भस्म रमाए. आग की लौ में दमकता चेहरा 25 वर्ष से ज्यादा का नहीं लगता. पर अजीत गिरि 2003 में इस उम्र के थे, जब उन्होंने कौशांबी स्थित अपना घर छोड़ा. खुद अपना पिंड-दान करने के बाद एक दशक नागा संप्रदाय के कठोर नियम-कायदों का पालन करने में बिताया.
घर-बार और नाते-रिश्ते नहीं बल्कि सारी सांसरिक चीजें त्याग दीं. उनके शरीर पर इसका प्रतीक भी है. सात वर्ष से उन्होंने अपने अंडकोश को छेदकर 250 ग्राम का लोहे का ताला डाल रखा है. वे बताते हैं, ''दर्द से उबरने में पांच-छह महीने लगे पर अब मुझे इसका एहसास भी नहीं होता. नागा साधु अटल योग के कई तरीके अपनाते हैं, मैंने इसे चुना.''
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बाबा अमरजीत मारकुंडी (जटा जौ वाले बाबा)

तमाम विस्मयकारी साधु-संतों के इस मेले में जटा जौ वाले बाबा अमरजीत मारकुंडी सबसे अलग हैं. 50 वर्षीय बाबा किसी अखाड़े से नहीं जुड़े, न उनके पास कोई तंबू-बंबू है. मेले की हलचलों से दूर एक शांत-से कोने में उन्होंने डेरा डाल रखा है. 2017 से उन्होंने अपने शरीर पर जीवन को पोषित करने को ही साधना का हिस्सा बना रखा है. वे सिर पर कई तरह की फसल उगाते हैं. उनकी दिनचर्या का हर पहलू इस जीवंत मुकुट से तय होता है. सोने के लिए लेट नहीं सकते, बस पेड़ या दीवार के सहारे आराम करते हैं.
धूल और सीधी धूप से बचते हैं ताकि उनकी जटाओं में फल-फूल रही फसल, जिन्हें वे अपनी 'संतान' बताते हैं, मुरझाए नहीं. उनकी इस खेती का सीधा-सा तरीका है, पहले दो दिन सिर पर दही का लेप लगाते हैं, फिर काली मिट्टी को कपड़े से लपेटकर रखा जाता है. वे इस जैविक इन्क्यूबेटर में जौ, चना, पालक, चावल, गेहूं, भांग के बीज लगाते हैं और इसे बालों से ढककर रखते हैं. वे कहते हैं, ''जब फसल तैयार हो जाएगी तो इसे प्रसाद रूप में बांट दूंगा.'' यह धर्म एकांतवास में नहीं बल्कि प्रकृति से नजदीकी के साथ निभाया जा रहा है.