
बाकी के रूटीनी मेलों से कितना अलग होता है किताबों और थिएटर के उत्सव-जलसों का मिजाज! जरूरत की या लग्जरी चीजों को खरीदने-बेचने के हड़बोंग से हटकर यहां दिखती है अपने भीतरी सॉफ्टवेयर को अपडेट करने की बेचैनी (संदर्भ: प्रगति मैदान में दिल्ली विश्व पुस्तक मेला; राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में भारंगम). थोड़ा सजग रहें तो कई गुदगुदाते वाकयों से भी आप गुजरते हैं.
अब देखिए जरा! छह साल की कलाकार, जबलपुर की आरना जैन 5 फरवरी को अपने ग्रुप रंग समागम के साथ भूमि नाटक के लिए आई हैं. दोपहर में श्रीराम सेंटर में बाकी आर्टिस्ट बोरियों में मिट्टी और फूल स्टेज पर ले जा रहे हैं पर ग्रीनरूम में आरना नाटक की निर्देशक और अपनी मौसी स्वाति दुबे से उलझ रही हैं.
किसी सह-कलाकार ने मजे लेने के लिए उकसा दिया कि आज उनका रोल कट जाएगा. ''अगर मेरा रोल काट ही देना था तो इतनी दूर लाई क्यों हो?" स्वाति और नाटककार आशीष पाठक हंसते हुए बताते हैं कि 'इसके लिए अब नाटकों में जगह बनानी पड़ रही है क्योंकि शो के दौरान ये मैडम स्टेज पर घुसने की ताक में रहती हैं.'
एनएसडी में भारतीय रंगमंच के नटसम्राट डॉ. श्रीराम लागू की मराठी में छपी आत्मकथा लमाण के हिंदी संस्करण के विमोचन का मौका है. अनुवादक प्रतिमा डिके और एनएसडी के पूर्व निदेशक वामन केंद्रे कुछ और लोगों के साथ निदेशक के कमरे में ब्लैक कॉफी के साथ अनौपचारिक बातों में मसरूफ हैं. तभी अभिनेता पंकज त्रिपाठी दरवाजा खोलकर दाखिल होते हैं.

'प्रणाम सर', 'अरे! यकायक!' वे बुक फेयर में आए थे, फिर इधर घूम पड़े. अनियोजित रूप से वे भी विमोचन का हिस्सा बनने चल पड़े और बारी आने पर 'एकाएक आगमन' के बारे में बोले, ''भोजपुरी में एक कहावत है: चोरवा के मन बसे ककड़ी के खेत में. हम कहीं भी रहें, हमारा भी मन एनएसडी के आसपास ही घूमता है. बुक फेयर आए थे. उधर से निबटते ही इधर घूम पड़े. ई तो अपना घर जैसा है."
अभिनेता दानिश इकबाल ने थिएटर अप्रीसिएशन कोर्स के पचासेक प्रतिभागियों के बीच कथाकार कुणाल, एक किशोर के भीतर अखुआते प्रेम की कहानी साइकिल को 45-50 मिनट में सोलो इनैक्ट करते हैं. सवाल आते हैं: ''सर इसे क्या कहेंगे, कहानी का रंगमंच, किस्सागोई, ड्रामा रीडिंग या क्या?" जवाब: "आपको कहानी कम्युनिकेट हुई, मजा आया! बस. यह इंपॉर्टेंट है. वैसे, मुझे भी नहीं पता, इसे कहें क्या, पहली बार इसी मंच पर यह प्रयोग कर रहा हूं."
पुस्तक मेले के एक स्टॉल पर प्रकाशक वक्ता से कहता है कि लोकार्पण वक्तव्य पांच की बजाए दो मिनट में निबटाने की कोशिश करें. 'सांकेतिक भाषा में ही बोल दें?' जवाब पर ठहाके गूंज उठते हैं. किसी और स्टॉल पर एक किशोरी साथी को समझा रही है: ''विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ना है तो दीवार में एक खिड़की रहती थी से शुरू करो. थोड़ी फिलॉसफी के साथ साहित्य है...मानव कौल! उनकी पहले कोई भी एक पढ़के देख लो. स्टाइल पसंद आए तभी दूसरी लेना."

और कॉरिडोर में टंगे बैनर को देखिए: बुक्स फ्रॉम रशिया. जैसे कह रहा हो कि रूस अपने सूचना-साहित्य के प्रसार को लेकर फिर आक्रामक हो रहा है. प्रफुल्लित चेहरों के साथ बाल मंडप में घुसते छात्र-छात्राओं और सिर पर टोपी ठीक से टिकाते 2-3 पुलिसकर्मियों के बीच से एक बुजुर्ग विशुद्ध मनुस्मृति का बंडल लेकर थोड़ा लचकते कदमों से स्टॉल की ओर जाता है.
वसंत की खुली, कम खिलती धूप और 300 से ऊपर एक्यूआई के बीच हरे चबूतरे पर बैठा एक कवि-सा अधेड़ दरख्तों और आसमान को निहारता है. उधर से स्टील की छत पर बैठे कबूतर और तैरती चीलें बताती हैं कि वह भी नजर में है.

इन जलसों में भी जान तो नौजवान ही जान डाल रहे हैं. श्रीराम लागू अपनी आत्मकथा में बताते हैं कि अशोक कुमार ने उन्हें सुझाया, ''भूमिकाएं जैसी भी मिलें, करते रहना. मना करने की भूल मत करना. 49 बकवास फिल्में करोगे तब एक ढंग की भूमिका मिलेगी. तुम्हारा चेहरा दिखते रहना जरूरी है." नौजवान भी शायद जानते हैं कि रोल हो, किताबें या साथी. खोजते-परखते रहने से ही मिलेंगे. यकीन न हो तो पंकज त्रिपाठी से पूछ लें.