बरखा बोलो बरखा, बरका नहीं.’’ अगले महीने 53 साल के होने जा रहे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के दिग्गज उस्ताद राशिद खान फेसबुक लाइव में शिष्यों की गलतियां इसी तरह पकड़ते-सुधारते चल रहे हैं. कभी तानपुरा बढ़वा लेना, और कभी तबले का साउंड मन मुताबिक मांगना. बीच-बीच में वे शिष्यों को सचेत भी करते हैं:
''तुम लोग सुस्त मत हो जाओ. हर तरह के सुनने वाले होते हैं. उनसे कनेक्ट होना है. खुल कर गाना बजाना करो.’’ आगे भी वे इसी तरह से गुर दिए जाते हैं: ''यही मान लो कि सामने बैठे हैं. तय कर लो, महीने में एक बार वर्चुअली हम मिलते रहेंगे. तुम्हें जो अच्छा लगता है वही करो. समय मिला है तो जमकर रियाज मारो. लॉकडाउन का फायदा लो.’’
लंबे लॉकडाउन के चलते कोलकाता के अपने ठिकाने से उनका भी कहीं आना-जाना बंद ही है. ऐसे में वे अपनी राशिद खां अकादमी: द फिफ्थ नोट ग्लोबल सेंटर ऑफ एक्सिलेंस के फेसबुक पेज के जरिए पिछले हफ्ते शिष्यों की तैयारी की खोजखबर भी ले रहे थे. शिष्य घरों में होते हुए भी गुरु के सामने थे. सम्मिलित विद्यार्थियों की क्लास रूम वाली रंजकता शुरू हो चुकी थी. आपस में चुहलबाजी भी चल रही थी. घंटे भर से कुछ अधिक चले संवाद में शिष्य गद्द थे तो गुरु भी तरोताजा नजर आए.
रामपुर सहसवान घराने के राशिद खान यानी आवाज और अंदाज से खयाल गायिकी में मिजाजदारी का नया रंग भरने वाली देश की बड़ी उस्ताद हस्ती. कोरोना काल में वे संगीत की बड़ी हस्तियों में बिरले ही हैं जो शिष्यों की सुध लेते दिखे. इस माध्यम के लिए उन्होंने खुद को भी ट्यून किया है.
इसका अंदाजा उनकी सहज लाइव शैली से भी लगा. कानों में ईयर फोन, काली टी शर्ट! पहचानना कठिन कि स्वाधीनता के बाद पैदा हुई पीढ़ी से निकला यही वह दिग्गज गवैया है जिसकी उस्तादाना गायिकी ने संगीतप्रेमियों को दीवाना बना रखा है. लाइव आने वाले तो अपनी सुदर्शनता को लेकर अकारण चौकस मिलते हैं. लेकिन वे बेतकल्लुफ, शुद्ध गुरु की भूमिका में.
यह लाइव कायदे से था तो अपने ही शिष्यों के लिए. लेकिन सधे हुए उत्तर दूसरों के लिए भी कुंजी हैं. जैसे: ‘‘गाना सीख लेने से ही कुछ नहीं होता. तुम्हें चौमुखा होना पड़ेगा.’’ दुराव-छिपाव से बेखबर वे खयाल में उतरने की चाबी दिए जा रहे थे वे. उन्हीं के शब्दों में, ''अकादमी की यह सोच थी कि वर्चुअल चौपाल के सहारे ही गुरु शिष्य की आपसदारी हो.’’
व्यस्त श्रेणी वाले बड़े गवैये अगर महफिलों में न हों तो अमूमन उनकी बहुरंगी व्यस्तताएं होती है. फिर राशिद खान तो वह शख्सियत हैं जिनके नाम पर टिकट आसानी से बिकते हैं. संगीत का या कोई भी सांस्कृतिक समारोह हो, जिस दिन उनकी पेशकश रहे, उस रोज की गहमागहमी का आलम कह देता है कि आज कुछ खास है!
स्टार दर्जा भले 21 वीं शताब्दी में मिला हो लेकिन उनकी आवाज और रागों के साथ गले से किया जाने वाला ट्रीटमेंट देखकर जानकार उनके नाम पर ठिठक जाते रहे हैं. वे घटनाओं और ताजा हालात से अपडेट रहने वाले कलाकारों में हैं.
उन्हें कोलकाता फोन करने पर उस्ताद तुरंत पूछते हैं कि ‘‘कोलकाता तो फिलहाल पूरी तरह बंद है पर रायपुर के हाल कैसे हैं?’’ आइटीसी के संयोजन में करीब डेढ़ दशक पहले वे रायपुर आए थे. उन्हें उसकी याद थी. इतने लंबे फासले को लेकर उन्होंने इसरार भी किया और कहा कि ''बताइए! 15 साल हो गए होंगे मुझे आए हुए. इसे (शास्त्रीय संगीत को) बढ़ावा नहीं मिलना अच्छी बात नहीं. आप लोग क्यों नहीं बात उठाते?’’
खैर. शिष्यों के साथ उनके लाइव का, उन्हीं के शब्दों में, निचोड़ था: ‘‘रियाज अलग है, परफॉर्मेंस अलग.’’
आइए, अब उनसे संगीत के कुछ दूसरे पहलुओं पर हुई बातचीत का रस लें.
आप उनमें से हैं जिनके नाम के आगे के उस्ताद श्रोताओं ने इतने कम समय में स्वीकार कर लिया. आप अपनी गायिकी से उस्ताद हैं ही, ये अलग बात है.
इस प्यार पर क्या कहूं. लेकिन मैं अपने आप को हमेशा सिखाने की कोशिश करता हूँ! हर महफिल मेरे लिए एक चैलेंज बन कर आती है और वही राग मुझे अगली बार फिर चुनौती देता हुआ दिखता है.
परिवार में कौन है आपकी विरासत को आगे ले जाने वाला?
बेटा है अरमान (खान), कोशिश कर रहा है. मैं अपने शिष्यों और परिवार में कोई फर्क नहीं देखता. सभी को एक नजर से देखता हूं. सभी हमारे बच्चे जैसे हैं. समान रूप से सीखते हैं. वही सबक बाकियों को भी मिलता है जो बेटा गाता है. इसमें तो जो करेगा वही पाएगा. मिजाज सबका अलग होता है. कोई तैयारी पसंद करता है कोई स्वभावत: सुरीला बना हुआ आता है.
आज खयाल गायिकी के नाम पर गलेबाजी सुनाई जाती है. गला कंप्यूटर की तरह तो चलता है लेकिन गहराई, सुकून गायब है. ताज्जुब है कि जानकार परिवार के गायक भी ऐसी भूल करते हैं. अजीब नहीं है?
गले को कंप्यूटर? सही है [हंसते हैं वे]. देखो दौड़-भाग से गाना नहीं आता. तैयारी का मुकाम कहां तक हो और सुरों का मजा लेकर गाना, दोनों अलग हैं. उम्र भी एक कारण है. नौजवानी में कभी मैं भी गले की फिरत में खो जाता था! बच्चे हैं, ऊपरवाला चाहेगा तो आस्ते—आस्ते उनमें भी रूहदारी आ जाएगी. लेकिन बिना चैनदारी के गाना असर नहीं करता, इसमें जरा भी शक नहीं. आप जितना चाहे गले का सर्कस दिखाते रहिए.
इलेक्ट्रॉनिक तानपुरा आपको पसंद है?
देखिए, 1998 तक मैं जहां भी जाता था, बड़े तानपुरे पैक होकर साथ जाते थे. लोग उसे ताबूत मानकर देखते थे. दिक्कत उसकी सुरक्षा है. सफर में कितना संभालें. इलेक्ट्रॉनिक भी अच्छे हैं. जिन लोगों ने यह तकनीक ईजाद की उनका शुक्रिया. लेकिन मैनुअल का मुकाबला हो नहीं सकता. उसके गूंज की बात ही नायाब है. दो तानपुरों के मध्य बैठा गवैया, (यह) कितना असर करता है इसको पहचानने वाला समय अब पीछे छूटता जा रहा है.
इसे आप क्या ठीक मानते हैं कि आकाशवाणी में तो कलाकार सुबह, दोपहर और रात के राग एक बैठक में बजा—गा देते हैं. लेकिन महफिल में फरमाइश उठे तो वहां नियमों का हवाला देते हैं कि अभी इस राग का समय कहां?
असल में सुबह, दोपहर और शाम अलग-अलग जाकर गाना व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं. सिद्ध कलाकार आकाशवाणी स्टुडियो में अपना टेंपरामेंट बनाकर उस समय में प्रवेश कर लेते हैं, इसीलिए वो नतीजा मिलता है.
लेकिन सुबह और दोपहर के समारोह होते भी कहां हैं! तो इन पहर के रागों को नई पीढ़ी याद कैसे रखेगी?
मैं मानता हूं दिन के या दोपहर के राग सुनाई नहीं आते. कामकाजी युग है. इसमें दोनों ओर से हाथ उठना चाहिए. ऐसी महफिलें करवाने वाले भी आएं और सुनने वाले भी. चलिए, मैं आप से पूछता हूं, आप आएंगे अपना काम छोड़कर?
'सुरमंडल’ कम लोगों को सूट होता है. बड़े गुलाम अली के बाद पंडित जगदीश ने जिस तरह इसे बरता वो मिसाल बना. अब आपके हाथों में यह खिलता है. किसी शिष्य ने इस बारे में कोई सवाल किया?
किसी ने नहीं पूछा. बड़े गुलाम अली इसे इंडियन क्लासिकल में लाए, यह उनकी बड़ी सोच थी. और जगदीश प्रसाद जी तो यकीनन इसके साथ न्याय करते थे. असल में इसे लेना इतना आसान नहीं. एक-एक सुर की बढ़त सीखनी पड़ती है. इससे एक मजा, मिजाज तो बनता है. जबकि लोग इसे ऐसा छेड़ते हैं कि सुरमंडल खुद दुखी हो जाता है.
‘‘मैं मानता हूं कि दोपहर के राग सुनाई नहीं आते. यह कामकाजी युग है. ऐसी महफिलें करवाने वाले भी तो आगे आएं और सुनने वाले भी. आपसे पूछता हूं, आप आएंगे अपना काम छोड़कर?’’