प्रलापों के समुच्चय से घिरे इस कविता संग्रह को पढ़कर पहले तो लगा कि यह कहीं अतिरेक तो नहीं. क्योंकि यह समय अतिरेकों का है. लेकिन फिर अपनी कवि-परंपरा के ही कवि स्मरण हो आए, जिन्होंने सदियों पहले लिखाः ''दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै.''
कवि के हिस्से में ही दुख, चिंताएं, पश्चाताप और विलाप/प्रलाप लिखे हैं. शिरीष कुमार मौर्य के संग्रह सांसों के प्राचीन ग्रामोफोन सरीखे इस बाजे पर की कविताएं दुख के इसी निमज्जित अंतःकरण का पाठ हैं.
प्रलाप में आदमी बड़बड़ाता है क्योंकि वह मौजूदा तंत्र में निरुपाय महसूस करता है. प्रलापों के इस महाविस्तार में ये कविताएं निरुपायता और प्रतिरोध की खामोश इबारत की तरह हैं. प्रलाप की पुनरुक्ति के बावजूद हर कविता पीड़ा के किसी नए पहलू की याद दिलाती है और कवि के ही शब्दों में, ''जीवन सभी का पुनरुक्तियों से बना है/पुनरुक्ति सबमें दोष नहीं होती/कभी वह प्रकाश भी होती है.''
बरसों पहले कैलाश वाजपेयी ने लिखा थाः भविष्य घट रहा है. इस अस्तित्ववादी कवि की परंपरा में ही शिरीष की पहली कविता इसे फिर से रेखांकित करती है—मृतकों का संसार बढ़ता ही जा रहा है. अनुभव और प्रतीति की गहराई वही है. उन्होंने कहा था, दिक्काल की भूख कवि को रुलाती है.
इन कविताओं में पराजय और हताशा का बोध दिखता है जो संभवतः इस नतीजे पर पहुंचने में कवि की मदद करता है कि यह जीवन सतत छटपटाहटों का सिलसिला है. ये सारी कविताएं पीड़ा के विभिन्न रंगों को शब्द देने की ही कोशिश का प्रतिफल हैं.
ऊपर से अस्तित्ववादी दिखते इस कवि में सब कुछ हताशा और प्रलाप की पुनरुक्ति में ही नहीं समा गया है. वह इत्मीनान से यह कहता है, भूस्खलन के एक तरफ मेरा बिछौना है, दूसरी तरफ नींद और अंतिम आराम. यह पहाड़ में पहाड़-सा जीवन काटते व्यक्ति का अपना अनुभव ही है क्योंकि वह भूस्खलनों के बीच ही जीता, मरता है.
यायावरी की तफरीह उसके हिस्से में कहां. हमारा आज का समय जिस राजनीतिक ध्रुवीकरण के चलते मनुष्य को धर्म, जाति, वर्ण और संकीर्णताओं में बांटने की मुहिम चला रहा है; पूंजी ने जिस तरह आम आदमी के अस्तित्व को निष्प्रभ कर दिया है और जीवन को हाशिए पर फेंक दिया है, हर वाजिब प्रतिरोध की हवा निकाली जा रही है तथा एक झूठ को ढकने के लिए अनेक विभ्रमों का निर्माण किया जा रहा है—कवि का अनुभव गलत नहीं कहता कि जीवन को भीतर से जीना और बाहर से देखना पड़ता है.
वह तो बल्कि इस क्षोभ से ही घिरा रहता है कि एक मेहनतकश जीवन के लिए बच न सके/कुछ भी तो रच न सके. जिन्होंने मनुष्य के उच्चादर्श रचे, उनका भी हश्र गांधी जैसा हुआ.
शिरीष अपने कवि कर्म पर प्रकाश डालते हुए कविता में पनपते कलावाद पर भी तंज करते हैं और एक कलावादी कवि की कलम के बदले एक जनवादी कवि की अठहत्तर-अस्सी के जमाने की कमीज लेना बेहतर मानते हैं; लेकिन कुल मिलाकर इन कविताओं के भीतर का अंधेरा और प्रलाप इतने प्रभावी हैं कि वे रोशनी के नाम खत लिखना तक भूल जाते हैं; यह भी कि कविता कभी भी कला से अविच्छिन्न नहीं होती.
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